प्रराध--

स्वामी भारकरेष्चरामत,

बण्श, थौंरामहृष्ण प्राप्रम, पन्तोडी, परागपु२७१६

गोरामहए्ण-शिवानरद-स्मृतिपर्शमाता पुण १३ दा (पोराप्ण आधम, बागपुर द्वारा रर्वाधिकार सगशिद) [१७० प्र ३९]

अवदूबर १६१४०

(4 तो धूल्प दे. ६.१० दो. हो, पी. रेशमुए इगए॑व मुष्णा5% अ्नसगग, बाप

परिच्छर. विषय

42 श्िदत शिपड डे कब बन सर

सज्जन ्जखछ

इं्बर-दर्धन के उपाय

मषि के प्रति उपदेश

ईदबर-दर्शव के लिए व्याकुछता .... ईश्वर ही एक मात्र सत्य हैं।. .- गृहस्थ तथा संत्याप्तियों के दियम ईदवरलाम हू जीवन क्षा उद्देश्प है। मपतारबाद आह्मददान के उपाय ससार में किस प्रकार रहता चाहिए सुरेन्द्र के घर में महोत्सव

निषध्काम मक्ति कि कलि में भक्तियोग & पण्डित वशधर को उपदेश 2२ साधना की आवश्यकता हि शरीरामड्ृष्ण तथा समस्‍्बय कीतेवानरू मे श्रीरामदृष्ण

प्रवृत्ति या निवृत्ति

साथदा तथा साघुततय

अन्यासयोग

चैेतत्यटीछा-दर्शन 5

पु

श् २० ३५ ड३ 3] ढड श्ण्द (९५ रे १६ रा १९५ श्र५ रे४रे २६१ ६८ २८९ ३०६ ३३५

परिच्छेर. विपद

8 रहे रो 527 रु २9 २८ 0] 3 रे रे

प्राषधानहल

मानृमाव ते साथना

शर्तों के काए शीर्वेरातन्द

ब्रोँुक़ी भक्ति

प्रोरामर्ष्ण दा करमेंकाष्ड जाल्ारुद में

त्ोओ ब्राह्मतमान में

दष्टा कार में शीरागर॒ष्य चीरामरषप्य हथा शाणाद मओएमक्प्ण तपा आगपोप

गओरामहूुपय तया थी वड़िययद

प्रहाद-बरिष्र दा इनितग-देशंत 'देदो चौवरातो' का पठव

३६६ $ ३९ ४१९ 8] 903 टू पा क्र ५१९ ५६० छ्रे

छत

परिच्छेद २१ भ्रीरामह्ष्प तब दर्मकाण्ड (१)

जितेद्धिय होने शा उपाए--मरहरतिनावन्तापण

आग श्ियार है। ११ बड़टूदर, १८८४ ६० धरीशमइण दक्षिपंशवर के काठोमम्दिर में छोटे तश्त पर लेटे हुए है। दिल के दो बे होगे उम्रोत पर मास्टर और प्रिय मर्जी बैठे है

मास्टर एक बजे स्कूछ छोड़कर दो बजे के लगभग दक्षिणे- प्र पाठीगदिर आ! पहुँवे है

धोशाक्ण-मं मु भप्ठिफ के पर गया था। जाते हो झमने पृद्धा--पाडी का किया झिता है ?' जब मेरे हाथवाहो ने बड़ा, तीत रपये दो आने, तवे उसने मुझे पूछ उधर उप्तपे शक आदमी में आई में दशीवाे से पृष्ठा उतने कताया--तीदे झपग्रे बार बाते [हत्र हेसते हैं ।) हर क्षिर हुए ोगों के पास रोग हुआ आया, पूछा, कया किराया पड़ा ?

“उसके पास दाल आया या। उद्तते बहु से कह, बड़ा बाजार में चार विस्ता जगह विक रही है, गया आप हेगे?! पु ने पृष्ठ, दाम क्या है ? दाम में कुछ पढायेगा या नही !! मैंने कह, वुम होगे नहीं, शिफ़े ढोग कर रहे हो।' हव भेरो ओर देशकर हँसते ठगे विषयी आदमियों का ऐश ही दूर है। पाँव आदमी बायेंगे, जायेंगे, बाजार में धूब शाम होगा।

“बहू अपर के पर गया या। मंत्े उससे कह, पुर अधर

ओरमकण देगा शंशाण बाहर

हे वहाँ रे वे, झठ़े अपर को बढ़ा आताद हथा यी। हे वह हूं! करने कया था, पृछा--या सचमुच एन्द्े बाद हुता है!

“पु दे यहाँ एक दृसरा मम्हिक जाया था, बह बड़ा चहुर और मठ है उत्रकी आंखें देशकर में समझ शया। भाँति की

और दैसकर पते कहा, हैक कफ इक होना बच्छा गहीं, हीश वृष दर होता है, परतु विष्ठा शाता है रहे मत देता, बे,

माया है। पढ़ को माँ ने आस्तर्मंचकित होकर कही, बाण) तुझे से माटूब हुमा कि इतके क8 नही है ?' में कोहरे मे समग्र गया था !/

नारायण क्षाये हुए है। वे को जसोद पर देठे हूँ

ब्रीरमहृष्ण-[ व्रियदाव है |-वयों औ, हुझझारा हैरि हो पडा बच्छा है।

प्िमाभ-ऐसा बच्चा क्या है--गरखु झा, छड़का है

गाराणप-अपरी स्त्री को एसने मा वढ्षा है|

श्रागमफ्रुणा-पह वया ! हे हो नहीं रह राजता और फ़ति मी कटा (मियवाय है) बात पहू है कि लड़का बड़ा शाला है, 'फ्िवर की कोर मेन है

भीरामकृण्ण दूसरी दात करने हंगे

श्रीरामग्रण्ण-सुरा हुपने, हैम क्या कहा था है वाहूराम पे एप बहा, इशिर ही एड माय हैं और स्व मिस्या। (सदे हँसते हैं।) मही वी, उसने आखरिक भार मे कहा था और मु्दे धर हे डाकर की युनाने के लिए कहा था, पराचु फिर हो नहीं सका गुता झहके बाद कहता छ--प॥ अगर होह- करता हूंगा हो आदगी दशा कहेंगे ?' दर गया हि कही आदमी काण्द हे कहें

20॥ ओरानइप्मददनामृत

“हरिपद घोषपाड़ा को एक स्त्री के फेर में एड गया है। छोडता नही ! कहता है, गोद में छेकर खिडाती है। मुनो, कहता है, उप्तका गोयाद-माव है। मेने तो दहुत सावधान कर दिया है। अहता तो बासत्यनाव है, पर उत्ती वात्सत्य ते फ़िर नीच भाष पेद्न होते हैं।

"वात यह है कि स्‍त्री से बहुत दूर रहदा पड़ता है, तद

- वही ईश्वर के दर्णन होते हैं। जिनदय दमिशर बुरा -है।उत सब सिप्रषों के पास का आावा-डाता दा उनके हाथ का दुछ झाना ' पहुत दुरा है। ये उत्त हरण करनेवाडों हे

“बड़ों प्तोदघासों से रहने पर तब दही भक्ति की रक्षा होती है भवनाथ, राखाल इन लोगो ने एक दिन अपने हाथ से भोजन पत्राया रूप के सद भोजन करने दैठे, उत्ती समय एक बाउछ उन शोणों की दांत में दैंठ गया और बोटा, में भो छाया मेने महा, फिर पूरा पड़ेगा अगर वच जायेगा तो तुम्हे दिया जादेगा परलु दह गुस्से में झाकर उठद्ार चच्ा गया वियया के दिन बाहे कोई भो आदमी अपने हाथ से पस्िल। अच्या नहीं है। शुद्धसत्त्त भक्त हो, तो उसके सकता है।

“क्लिप के पा बड़ो होशियारों छे रहता चाहिए गंशाल-

/ नाव है, इस्त तरह की दाहों पर विछवुछ ध्यान देवा ग्राहिए। | स्ट्रियों ने होनों लोक निगल रखे हैँ कितनी स्थयाँ ऐसी है जो उम्नछा लटका देखकर नया याल फैली हूँ इमोटिए

सर्द शोपाछ-माय है

“जिन्हें रुमार-मवस्या में हो वंराण्य होता है, थो बेद्पन से हो इंश्वर के लिए व्याजुल होकर घूमते है, उतको पेपों एक

श्रीरापकृष्ण तप करराणह हू

अहा है। मे घुद्ध-कुदीन हैं ! ठोक-ठोक वेराग्य के होने पर थे औरतों से पचास हाथ दूर रहते है, इस्तलिए कि कहों उनका भाव भंग ने हो दे अगर स्त्रियों के फेर में पड़ जायें, तो फिर शुद्ध बुछ्तीत नहीं रह जाते, भस्तभाव हो छाते हैं, फिर उनका स्थान मीचा हो जाता है ! जिनका विलदुछ कौमार-वैराग्य है, उवका . स्थान बहुत ऊँचा है, उनकी देह में एक भी दाग नहीं छगा। “जितैन्द्रिय कि तरह हुआ जाय ? अपने में स्त्री-भाव का आरोप करना पहता है। में बहुत दिदों तक सखीभाव में था औरतों जेंसे कपड़ें कौर आभूषण पहनता था, उस्ती तरह सारी देह भी छात्रा घा। नहीं वो स्त्रो (पत्ती) को आठ महीने तक प्राप्त रखा कैसे था --हम दोनों ही मां की सक्तियाँ थे रा "मेँ अपने को पु ( पुरुष ) नहीं कह सकता एक दिन में भाव में था, उसने [ श्रीराभकृष्ण को धर्मपली ने ) पृछ्धा--में तुफ्कारी कौन हूँ ?' मैने फहा--बानन्दमयी ! एक मत में है, विपके छम-स्थान में घुण्डी हो, वह स्त्री है। अर्जुन योर कृष्ण के ।घूण्डियाँ तु धी. + “गहबपूज्ञा का भाव जानते हो ? शिव्धित की पुजा गाजृ- स्थान ओर पिुत्यान की पूजा है। भक्त यह कहकर पूजा करता है--'भ्रगवानू, देखो, अब जैसे जन्म ने लेना पड़ें। शोणित,! शुक्र के भीतर गे मातृस्थान ते होकर अद जैसे ने बाबा हो ”!

(६) साधक कोर स्त्री

श्रीरामकृष्ण प्रकृतिभाव की दाठचीत कर रहे हैं। श्रौयृत प्रिय मुलजी, मास्टर तया और भी कुछ भक्त बैठे हुए हैं

शश्दू श्रोरामहृष्णबचनामत

समय ठाकुरों के यहाँ के एक शिक्षक ठाकुरों के कई लड़कों को ह/ लेकर आये।

'यीरामक्ृप्ण- (भक्तों के प्रति)-श्रीकृष्ण के प्तिर पर मोर- पंत्त रहता था, उप्तमें योनि-चिह्न होता है, इसका यह अर्थ है कि श्रीकृष्ण ने प्रकृति को सिर पर रखा था।

“कृष्ण रा्न-मण्डल में गये। परन्तु वहां खुद प्रकृति बन गये झीलिए देपों, शा्नाण्डह़ में उनका प्रकृति-वेश है। छग प्रकृतिभाव के बिना धारण किये कोई प्रकृति के संग का अधिकारी नही होता। प्रकृतिभाव के होने पर ही रात और सम्भोग होता है; * परल्तु साधक की अवस्था में बहुत सावधान रहना पढ़ता है। उप् समय स््रियों त्षे बहुत दृर रहना पड़ता हैं यहाँ तक कि भवित- मतो स्त्री होने (8 भी उसके पास अधिक जाना चाहिए | छत पर चढ़ते समय बहुत्त झूमना ने चाहिए, बयोकि इसरो गिरने की सम्भावना है जो कमजोर हैं, उन्हे दीवार के सह्षारे से पढ़ना पड़ता है। सिद्ध अवस्था की और बात है भगवाव के दर्शन फे बाद फ़िर अधिक भय नही रह जाता तब वहुत कुछ निर्मबंता हो णाती है छत पर एक बार चढ़ना हुआ तो बस, काम भ्विद्ध है छत्त पर घढ़कां फ़िर वहाँ चाहे कोई जितना नाचे और देखी जो कुछ छोड़कर छेत पर जाया जाता है, वहाँ फिर उप्तका त्याग नहीं करना पड़ता | छत्त भी इंट, चूने भौर मसाछे से वनी ओर सोढियाँ भी उन्ही चीजो से वदो हैं जिस स्त्री के निकट इतनी स्रावधादी रखनी पड़ती है, इदवर-दर्शन के पद्चात्‌ वहीं स्त्री पाक्षात्‌ भगवती जान पड़तो है। तब उसे मात्रा समझकर उसकी पूजा करो, फिर विशेष भय की थात ने रह जायेगी

“बात बहू हैँ कि पाल छूकर फिर जो चाहे, करो।

एमए हुए हर्महात ड४छ

बहिईसी अवस्था में आदमी खूछ देखता हैं। तद गन अप्रमग कोय में रहता है। इमके वाद है मूक धरीर--विंग शरीर तब मवोमय दौर विज्ञानमय कोप में मद रहता है इसके वाई है कारण शरीर जद इन शारण अपर में आता है, तव बाकद होता है, गये भातरदमय, कोपपय रहूता है।। यह चैतन्यदेव कौ अर्कह दशा पी पके बाद संत दोव हो जाता है। मत का नाश हो जाता है। महुकारण, में पत-का-बार होता.है। गत का सा हैं। जागे पर पिए कोई सर नही रुती यह बेतर्तंदेव की अलईश थी 'क्षरृंत अवस्था अप्ती है, डाकते हो? वयातादकते पहा था, 'धंदर बाओ, दखाजा गाद कर सो ।' बखर हुरएक वी पहुंच गद्दी होती "के दीपछ्षिदा १९ यह माव क्रारोषित करता था। इहकी ( यो कहता वा स्यूछ, उसके भीदर सफेद गाग को कह था सूप, और सत्र वे रीतर काठे हिस्से को रहता था बारणजरीर ।_ /ः "ध्यान होड़ ही रहा है इसके यई वष्ण हूं। एव महू है ) दि णह प्राद्मेकर पिर पर पक्षी दैंठ जाया करेंगे 'द्ेश्ष श्रेव को पैसे पहे आदितमाज में देवा था वेदी दर बाद बे हुए थे, दीच में उद्वव मेने देखा, काप्डदत्‌ बैठ हुआ था | तथ मेने रेजो बाद मे फहा--देखों, इससे बंसी का बाश गढसी दा रही है वह उतना ध्यादी था इसी के बह है और ईर की इच्छा ये उटने जो बुछ तोचा वह ही गया "जद सोढकर भी ध्याव होता है। बातचीत के बोद हूँ भी ध्याग होता है। दँसे, ऐोदो, किप्ती को दाद की दौमारी है,

रद सहाद के पाक

हाट शओरषसपस्पश्दवारत

इई हो रहा है।'

ठाइुदों के पिक्षक-डो ४ह दाह सूद (हल)

शीरामहष्प-[ हास्य )-हाँ जो, दांत को दोगारी अगर वित्ती को होतो है, ठो बह तब काम पो झुप्ता है, परदु मद उप्ड़ा दई पर रा रहता है। इस तरह घाव बाँस सोठकर भी होता है योर वाठचीत करते हुए भी होता है

पिश्षेग-उनझा बाग परतितषवद है--अहों हम टोसे बा भयेता है। दे दयामय हैं |

म्रौमहप्प-विक्खों ने मी कहा पा, वे दद्ामंय है। मैने पृष्ठ दे कंठे दयामय है ? उन्होने कहा, "क्यों महाराब, उन्होने हमारे तृष्दि को है, हमारे हिए इतदो दोजें हैदर को हैं, पं पा पर हमें विधि पे दबाते हे तड़ मेने कहा, 'वे हमें पैदा बरहे हमारी देयरेद कर रहे है, मिचाते-पिछाते है इदमें कीलमी बड़ी तारीफ की दात है? दुम्हारे अघर दच्चा हो तो व्या उत्तको पेसरेव कोई दृदरा भाकर *

तिक्षय-नी, डिद्ो क्षा छात्र उल्दों हो जात्म है और हितों वा हटी होता, इसका दया अर्प है?

धोरामड्रप्प-दाठ यह है दि बहुत बुछ वी पूर्वक झे सरतारों से होता है। मोर दोरते हें एचाएड हो रहा हूँ

"ड्विमी ने चुदह को पयाढ़े मर शराब प्रो यी। उतनें हो सै मतदाहा हो गया, मूमनें टण छोग बारचर्र करने हें वे सोचते एगे, यह पाये भर में हो इतना गतदारा ईसे हो रण ?

कहा, बरे घत भर इसने शराब पो होगी ४हनुनाव थे छोने की छंद जल्य दो। सोब आाइपर्म में

उमझी; हुई है।

धोरामकुष्ण ठया झर्पकाण्ड ६४५]

पड़े गये कि एक बस्दर ने कैसे यह सब जला दिया; परम्तु फ्रिए बहने ढगे, वास्तव में वात यह हैं कि सोठा को गरम साँस कौर: राम कै फोप से लंका जली है।

"और छालावाबू को देखों। इतना घन है, पू्व॑ज्ञाम के संस्कार के बिना बयां एकाएक कभी बैराग्य हो सकता था ? धोर रानी भवानी--सत्री होने पर भी उत्तमें कितनी शान भवित दी!

“अन्तिम वन्य में सतोगुण होता है। तभी ईएवर पर मत जाता है, उतके लिए विकलता होतो है, ओर तरह तरह के विपय-कर्मों से मद हृतता जाता है।

“कृष्यादास पाल आया था| भैदे देखा उप्तमे र्जोगृण था परन्तु हिंदू है, इसलिए जूते बाहर खोलकर रणे, कुछ बातचीत करके देखा, भीतर कुछ नही था। मेने पूछा, 'मनृष्य का करतव्य क्या है ?” उसने कहा-- संसार का उपकार करना ।' मेते कहा, 4व्यों जी, तुम हो कोच ? और उपकार भी क्या करोगे और संप्तार बया इतवा छोटा हैं कि तुम उसका उपकार कर सकोगे? /

नाशायण आये है। थीरामकृष्ण को वड़ा बाहन्द है। भाशयण को छोटी खाद पर अपनी वगल में बैटाया देह पर हाथ फेरते हुए सेह करने लगे खानें के लिए मिठाई दी और, सेहपूवंक पादी के लिए पृछा नारायण मास्टर के स्कूछ में पढ़ते हैं। श्रीरामकृष्ण के पास आते है, इसलिए घर में मारे जाते है। श्रीरामकृष्ण हँसते हुए स्तेहपूर्वक नारायण से कह रहे

तू एक चमड़े का कुर्ता पहना कर, तो कम छगेंगा ।”

फिर नारायण से कहने छंगे--“हरिपद की वह बनी हुई माँ आयी थी भैने हरिपद को खूब सावधान कर दिया है। ते के पोएजएडू के रब बाएे हैं ( येले सुपर पूछा या, चा तुम्हारे

लक 4

इपु० ओरशपह्रश्च्तापत

कोई 'आधय' है? उसने एक चकवर्दी शो बतताया ॥/

प्रीरमहए्ण-(शास्ठर स्े)-अहा ! उत्त दिने बोलकर आगा था ईैसा भाव है !--और एक दिन थाने के लिए वह गया है। गा सुवाबेगा आज उपर गाव हो झा है, जानो >-देखों व। (एमलाउ से) हेड नही है। (हण्टी देफकर) हण्दी भें तो नही है

(३) पुर्यप्रहुति-विवेक-योग राघा-हृष्णे कोन है?

शीशमकृष्ण टहुउ रहे है, कभी पर के भीतर, कप्ी घर के दक्षिण ओर के वारमदे में कमी घर के एश्चिम ओर के गोछ बरामद में खडे होकर गगा-दर्शव कर रहे है

कुछ देर दाद फिर छोटी पाट पर बैंे ! दिव के तीन बग घुके है। भस्तवण फिर जमीन पर बाकर दैठे थीरामह्प्ण छोी स्राट पर चुपचाप बेठे हैं। रहनहकर पर को दोबार फ्री ओर देस रहे हे दीवार पर बहुत से विश्र हैं। थीरामदृष्ण की बाई और ध्रीवीणापाणि का चित्र है। झा्े हुए दूर पर लिह्यानतद्द और ग्रौसग भश्तन्ममाज में क्षोतत कर रहे हूँ श्ीशामह्ण के सामने ध्रुय, प्रह्दाद बोर जग्माता काली भी भूति है, दाहिमी और दीवार पर शराबराजेंशवरी की मूहि है। पोछे ईसा की तह्वीर है--प्रिटा ढूबे जा रहे है और ईपा पाती मे विकाल रहे हैं। एक्ाएक श्ीरामहष्ण ने मास्टर ते यहा-देसो, घर में सापुझो मौर तन्यात्रियों का चित्र सना अच्छा है। सुबह उठकर दूसरे का मुंह देखने में पहे साधुओं और पंस्याविशों झा मूल देतकर उठना अच्छा है | दोवार पर अंग्रेजों तस्वीर--पती,

शोशप्रकुष्म तब! करमंशाण ड११

शाजा धर रानी की तस्वीरें--दानी- के जड़कों की वस्तरीरें-- साहब भौर मेश्र टहल रहे है, उनकी तस्‍्वीरें--इस परह भी तस्वीरें आदि रखना रजोगूणों के लक्षण हें !

“जिस तरह के संग में रहा जाता है, बेसा ही स्वध्षाद भी हो जाता है। इसीलिए तस्वीरों में भी दोप है। फिर मरृप्य जैसा है, दँसे ही संगी भी घोज़ता है। जो परमहुंस द्वोते हैँ, वे पॉप-छ: साल ये दो-धाद छड़वे सपने पास रफ तेते हें--चँहेँ पास बुराया करते हैं। उस अवस्था में वर्च्चों के चीच रहता शव सुहतता है। दच्चे तत्त्व, रण लोद तम किसी गुण के यश गहीं हैं।

“पेड़ देखवे एर तरीवत की याद आदी है, ऋषियों के तपस्या करते का भाव जाए जाता है ।!

सींती के ब्राह्मण कमरे में आये, श्रीरामक्ृष्ण को उद्होंने प्रभाम किया उ्हृर्ति काशी में वेदात्त पढ़ा था

औरामकण्ण-क्यों जी, तुम कंसे हो ? बहु दिन बाद आये

पष्डित-(सहात्य बी, पृहए्यी के काम से छुट्टी नहीं मिलती, भाष तो जानते ही हैं

पण्डितज़ी ने आतत प्रहंध किया उनसे दातचीत हो रही है !

ओरामकृष्ण-बनारप तो बहुत दिन रहे, क्या फक्‍्या देखा कुछ बाह्दो पो, कुछ दयानत्द की बाते बताओ

पष्डिद-दयातन्द से मुलाकात हुई पी आपने तो देखा ही था ?

श्रीरामक्ृष्ण-नों देखने के लिए गया था। त्तव उस तरफ के एक बगीचे में वह दिका हुआ था उत्त दिद केशव देव के आते को बात थी। वह चातक की तरह उनके लिए तरण रहा था | बढ़ा परिदद है दंधमाया को बोर्ड सापा दहता या। देवता की माषता था केशव बह मानता या दवातरद कहता

पर श्रीशगहच्यदचनाएूत

था, ईएवर ने इतनी चीजें यतायों और देवता पया नहीं यदा सकते पे? विराकारवादी है। पप्तान “राम राम कर रहा पा, उग़े पढ़ा इससे 'वर्फी दर्फी' पयों नही रट्ते ?

पर्दित-याश्ी में परण्डितों के शाप दयागाद या सूबे धास्त्रार्थ हुआ। सत्र एक तरफ थे कर बहू एक तरफ फ़िर दोगों ने उम्रे ऐस्ता बताया कि भागते वन पड़ी सब एया साय . झंडी आवाज से कहने शगे--'दयानस्देव यदुयत तझेयम्‌ ।/

#और प्नेछ थठयट फो भी मेने देसा था। थे छोग कहते हैं, महागमा भी है | बौर चद्धड़ोफ़, सूर्पझषोप, नक्षत्रद्ञोफ पे भी सब है मूथम घरीर उन सब स्थानों में जा सपता है--इस तरह की बहुतसी बातें कही अच्छा गहाराज, यह विचार आपको पंगा जान पढ़ता है ?/

श्रीरामहृष्ण-/भप्ित ही एकमात्र सार प्ल्तु है-शिर गे भषित वे बया भवित की सोज करते हैं ?--अगर ऐगा हो, तो अच्छा है। अगर ईश्वस्काम उनका उद्दष्य हो तो अच्छा है। चद्धकोक, पूर्वोक, नक्षप्रदोक और महात्मा फो ऐेवार ही क्षगर फोई रहे, तो ईयर की गोज इससे नहीं होती उनके पराद-प्धों में मश्ति होने के छिए साथना करनी चाहिए, व्यायुछ् होकर एस्हेँ पुकारना चाहिए अनेव बर्तुओं से मन को सीचकर उसमें छाना घाहिए ।” यह पहुकर भी यगहृष्ण रागप्रगाद के गीत गागे ढो--

॑पन ! अंपररे में पागल कौ तरह उनके तत्त्व का विभार हुम वा करते हो ? बह तो भाव का विषय है, गाष वे बिना अभाव के द्वारा कया यहू कभी म्रिए शगता है ? भाव है लिए बोगीजन युग-युगस्तर तक तपस्‍ा जिया कारे है। भाव, उदय होगे पर वहू मनुप्य फो उसी तरह पड़ता है जैसे हो ,

चोशमहष्ण हवा हमहाह ९३

को चुम्दक पत्वर ! “और भाहे शास्त्र कहो, चाहे दर्शन कहो, चाहे वेदारा 'किप्ती में वे हीं हूँ उनके दिए प्राों के विकझ हुए बिना कही कुछ होगा %दुड्दगंगन, निगमागम और तखसार से उसके दर्शन नहीं होते ये तो भक्ति-रस के रविक है, आनत्यपू्वक हृदयशूर में * विदशजमान हैं। “हूव व्याकुण होता चाहिए | एक गाते में है-राधिका के दर्शव सब को नहीं होते

अधतार भी प्ायना करते है--छोफशिक्षार्थ “दापता की पड़ी चझूरत है। एकाएक क्या कती ईिबर के दर्शन होते है

“पक ते पूछा, हुमें ईश्वर के दर्शन क्यों नहीं होते ? मेरे मा में एस समय यह वाद उठी --नैने कहा, बडी मछली पएकड़ना चाहते हो, वो उम्के लिए आयोजत फरो पहां प्रछली पड़ना नाहूते हो, वह मस्ताछ्रा डालो होरी-इंठौ छाथी | भसाे की ग्रद पाकर गहरे घछ मे मछछी उसके पाया आग्ेगी जब पायो हिंडने छगे, तब ठुम समझ जाओ कि बड़ी मछली आयी है।'

“थग्र मदफ़न सादे की इच्छा है तो 'हुंपर में मक्खन है, दूध में मददन है ऐसा कहने सें दशा होगा ? गेहुनत झुसती पद्ठठी है, एत्र गकद निकद्धता है। ईप्वर हूँ 'ईदवर है इस हर हू ' [वषते रहते से बा कभी ईश्वर के दर्शत हो सकते हैं ? ध्षापवा , वाहिए।

“वही ने स्वयं पश्वमृष्ठी आस पर बेबकर च्क्ता्‌

पड थीपनहप्परधनागृत

,की पी--छोकशिक्षा के लिए। श्रीकृष्ण साक्षात्‌ पूर्ण ब्रह्म हैं, परुनु उहोते भी तपस्या की थी, हव रापायल उड७ँ पढ़ा हुआ मिल गया था

“कृष्ण पुष्य है थोर या प्रति, चित्‌रपित बाधा* शब्ति है। राषा प्रकृति है--मिगृणमगी; इनके मीतर तत्व, एज बौर तम दीन गृण है जैसे प्याज का छिदझ् निकाहते जाबो, पहुंछे लाड और छाहा दोनो रब का मिज हुआ हिल्‍्सा विकटता है; फ़िर छाए निद्रता रहता है, फ्रिर सफ़ंद ) वैष्पव श्ा्त्रों में हिपा है-कामराबा, प्रेमराघा, नित्ययापा | कामगण पद्भावडी हैं, प्रेमराघा धीमी ग्रोपाछ को ग्रोद में लिए हुए वित्यापा को कद ने देखा पा

“थह बित-सस्ति और वेदाग्त का ब्रह्म दोतों बगेद हे। लए जढ बौर उसकी ह्मिशक्ति ! पाती की हिमशक्ति को सोचने में पानी को भी धोचता पद्ता है थोज़ पावों को धोचते से उत्तकी हिमएवित भी वा जाती है। ताप की हि्य॑द यति को सोचने रो साँप को भी होचना परदता है। ब्रह्म कब हते हैँ --जब वे तिष्तिय हैं या ढ्रार्य से लिछिप्त हैँ पुष्प जब फ़पदा पहुतता है, तब भी वहू पृर्प ही रहता है। १हुछे दियायर था, धद मास्वर द्वो यया है--किर दिगस्बर हो सकता हैं (पके भीतर जहर है, परन्तु सांप को दुपमे दुछ वहीं होता जिसे यह बाटता है, उसी के लिए जहरईआ दह्म धूय॑ निर्दिप्त है

“नाम ओर रुप वहां है, वही गहुति को ऐश्वर्ग है। गीता में हनृडरात में कहा था--+दास, एम नप में में ही राम हूँ कर एक तप पे मीता वनी हुई हं--एक रुप से में हैँ कौर एव एप से इद्ाणी हें->एक राय से ब्रह्मा हूँ बोर एक़ दए मे बक्यापी--एुक

ओराहइध्ण हश क्‍मकाध 4084

झुय से रद हे और एक रुप थे र्ागी। नामय जो कुछ है. सर अधि का ऐेहए है। ध्याद जोर घ्याता भी वित-जका के हो एलर्य में से हूँ। जय तक यह बोव है कि में ध्यात कर रहा हूँ, तब बक उन्हीं का इंठाक़ा है। ( मास्दद से ) इत सब की धारणा करो बेहें और पुराणों को सुतता चाहिए जोर वे जौ दुछ गहते है, उतकी घारणा करती भाहिए।

(पष्डित के) “कमी कमी हायुन्ंग वरदा अच्छा है। रोग हो भावी को गा ही हुआ है। सापु-संग ते उसका बहुत कुछ अप्मम होता है

“मे और मेंशा-पत्र यही अंशान है। 'हे शेयर ! सब कुछ हुम्झी कर रहे हो ओर मेरे अपने आदमी हुम्ही हो। यह ढव पर हार, परिवार, आत्ोम, बन्यु, सगूर्ण संसाद तुम्हारा हैं / शी का धाम है बयाएँ शत इसके विपरोत "में ही सब छुछ कर हा हूँ, कर्ता में, पर, द्वार, बृदुम्ब परिवार, रडके-बच्चे सद

इसका ताम है अज्ञान

/ध शिष्य को थे सब बालें समझा रहे थे कह रहे गे एड्गाव ईश्वर ही तुम्हारे जपने हैं, घोर कोई अपने गही शिष्य ने कहा, भहारार, माता ओर स्त्री ये क्ोग तो मेरी बड़ी छातिर कछते हैं, अगर पुरे नहीं देखते वो तमा्र मार में उसके लिए दुश् का अंबेरा बात़ा है, हो देखिये, वे मुझे कितगा पार की हूँ शुरु मे कहा, यह दुष्हारे मत की भूल है। म॑ हुम्हें दिफलाये देता हूँ कि तुम्हारा कोई नही है। दवा की ये गौफियाँ अपरे पात रखो, घर जाकर गोठियों को छागा बौर विस्तरे पर हेदे रहवा। ढोग समसेगे, तुम्हारी देह छूट गयी है से उम्री एगय पहुँच जाऊंगा ।'

४५६ थौद्यमहष्णववनामृत

“प्विष्य ने वैसा हों किया। घर जाकर उसने गोहियों को खा लिया।। थोड़ो देर में वह वेहोश हो गया | उसकी माँ, उसकी « स्‍त्री, सब रोगै गो | उसी समय गुर वैध के रूप में वहाँ पहुँच गये सव सुनकर उन्होने कहा, “अच्छा, इसकी एक दवा है--यहू ऐर पे थी सकता है। परन्तु एक बात है। यह दवा पहले आप में सै किसी को खानी चाहिए, फिर यह उसे दी जायेगी परु्तु इसका जो आत्मोय यह गोलो खायेगा, उसकी मृत्यु हो जायेगी और थहां तो इसको मां भी हैं ? ओर शायद स्त्री भो है, इनमें से कोई कोई अवश्य हो दवा खरा छेगी। इस तरह यह जी जायेगा ।' * “प्विप्य सब दुछ सुतर रहा था। वँद्ध ने पहले उकी माता को बुलाया माँ रोती हुई धूल मे छोट रही थी उसके आने पर कविराज ते कहा, “माँ, अब तुम्हें रोमा होगा | तुप्त यह दवा साथों तो छद़का अवश्य जी जायेगा, परम्तु तुम्हारो इससे, मृत्यु हो जायेगी ।' माँ दवा हाथ में लिये सोचते लगी बहुत फुछ प्रोच-विचार के पश्चात्‌ रोते हुए कहने दंगी--यावा, मेरे एक दूसरा छड़का और एक लड़की है, में अगर मर जाऊ़ंगी, तो फिर उनका क्या होगा ? यही सोच रही हूँ क्ौत उतको देस- रेख करेगा, कोद उन्हें पाने को देगा, यही सोच रही हैं ।' तब उम्की स्ट्री को बुढाकर दवा दी गयी उम्तकी स्त्री भी सूद रो रही थी। दवा हाथ में लेकर वह भी होचते छगी। उसने छुपा था, दवा छाने पर मृत्यु अनिवायं है। तव उसने रोते हुए रहा, “उन्हे जो होना या स्तोतो हो ही गया, अब मेरे बच्चों के लिए क्या होगा ? उतकी सेया करनेदाला कौत है ? फिर. . .मे झैसे दवा पाऊँ?! तब तक शिप्य पर जो नशा था, वहू झतर गया।

औरामहप्म एया करपपतट 2]

देह समझ यया कि कोई किसी की नही है तुस्त उस्कर वहू गुए के प्राय सक्त गया एए ने कहा, तुम्हारे अपने बेत्त एक ही आदमी हे-ईर

गजताएव उतके पादप्मों मरे लिससे भावित ह्ो->जिफ्से दे मेरे हैं, इस तरह के प्रम्दरद से थार हो, वही कला चाहिए मौर री अच्छा भी है। देखते हो, वंहार दं। दिन के लिए है! इसमे और रही कु कहीं है

7. परण्िद-(सहरण)-जी, जद यहाँ बहा है, जब उस दिउ पे बैराण हो जाता है। एन्छा होती है कि संतार का व्यय करने कहीं बढ़ा भा (

दौशग्रकृण्ण-नहीं, लाए का करना होशा | आप ढोए पद हें पाग का भात्र छोहये संधार में अवातक्त होकर रहिये!

'बुऱेद्र कमी करे आकर एहुते की एच्छा हे एक बिस्तर यहाँ था रखा या दोनुक दिन गाया भी था; पर उधकी बीदी ने रहा, 'दिर के पमय थाहे गहाँ जाकर रहो, शत को घर ते ने तिमेदेते पाजोगे तब पुरेद् क्या पहुतार ? अब राह के समा कहों रहने का उपाय नी सही पह गंगा

“और देशों, हिफ़ विचार कसते से क्यय होता है ? उनके हिए व्याकुरू होबो, रह प्यार काना सीयो ) शान और शिताए 4 3302 पृष्ठ है, इनकी पहुंच रप दखाजे एक है। शशि रत है. वह भहिर मे परी खती है। 2 मय

“इसी तरह के एक भाद छा बाध्य ेसा पढता हैल्‍-्तद फरष्य सदर को पाता है) सतकादि ऋषि शफ़ततभाव्र ऐेकर रक्षे थें। हनुदार दासभाव में ये | शरीदाय, सुदाम गरादि ब्रज के देखाहों का सस्यभाव था यशौदा का बरत्सत्थशाव घा-- देखिये

है पीयमहृष्णदशतापृद

पर उतफी पत्ताजबुद्धि यी। श्रीमती वा मपुरभाप पा। “है वर, तुप प्रभु हो, मे दा हूं, इस भाद का नाग है-- दाषभाव ग़ाषदा के लिए यह भाव बहुत अच्छा है।" परण्ठितन्जी हाँ

४) भतितोग और कर्मपोग ज्ञान का सक्षण

सीतौ के पण्ितजी लले गये है सलया हो गयी। का्तीं मदर में देवताओं शी आरती होने एगी। धोरामहृष्ण देवताओं वो प्रणाम कर रहे है छोटी खाट पर बैठे हुए हैं, मन ईए्बर विलय में है। कुछ भवत आकर मीन पर बैठ गये पर में पात्ति है।

एक पष्टा रात बीच चुकी है। ईशान गृफ़ौपाणाय पीर किश्षोरी आये वे ठोग श्रीरागइप्णदेय को प्रणाम फर बढ गये

'बरण आदि शासक गर्मों पर ईथान डा बढ़ा ही बनुणा है ये फ्रांयोगी है बंद श्रीरामृष्ण बातचीत पर रहे हैं

धीरापएृष्ण-कशाव ज्ञान पहने ही से दुछ थोड़े ही होता है ! ज्ञात के दो एधण हैं| पहला है थवुराग, कर्वात्‌ ईख़र फो धार मारना केवठ ज्ञाग का विचार कर रहे है, परणु ईश्यर पर अनुराग गह्ठी है, प्यार गद्दी है तो वहु मिथ्या है। एश और सशण है--ु९इछिती श्रवितत का जागना गुण्डडिनी यये तक सोही रहुती है; तम धव ज्ञाव यही होता बैठे हुए पुस्तने पड़ते जा रहे है, विचार वर रहे हैं। परुखु भीतर व्याजुरता नही है, वहू शत को दक्षण यही है गृठडिनी धुन के जाने पर भाव भवित' और प्रेम यह सद होता है। इसे ही भक्तियोग पढ़ते है )

भोराणहरण तथा दरेंडागट

“करमंरोग #बड़ा कठिन है, उससे कुछ शजित होती है, विभूतिय मिएती हूँ ।” है

ईशान-में हाजरा भहाद्ाय के पास जाता हूँ

सौरामहृप्ण थुप हैं | कुछ देर बाद ईशान फिर वमरे में बाग साय साथ हागरां भी हे भ्ौरामक्ृष्ण चुपचण बैठे हुए हैं कुछ देर बाद हाजरा ने ईशान से ख्रहा--वलिये, अभी ये ध्यान करेंगे ।” ईमान और हाजश बले गये

औरामक्ृष्ण चुपचाप बैठे हुए हूँ। कुछ समय में प्दमुष ध्याग फरने लगे उँगतियों पर तए कर रहे है। वही हाथ एक बार सिर पर रखा, किर एलाट एर/फिर कगश्न' कण्ठ, हृदम भर बापि पर।

अत्तों को जात पढ़ा, श्रीरामकृष्ण पदपओों में भादि-शवित का शान कर रहे है। शिवरसंहिता यादि दास्त्रों में जो योग की गाह़ें है, कया ये गद्दी है ?

(५) निवृत्तिसार्ष दासना का मूख--महामावा

ईशान हाजरा के साथ कारी-मखििर गये हुए थे। भी राफ़ण्ण घ्यात कर रहे थे राह के बाढ़े मात बजे का समय होगा। एसी परम अबर ये

कुछ देर चाद ओदाभकृष्ण काझे का दर्शद करते गये दर्शन कर ओर पादपत्ों का निर्मात्य लेक उन्होंते प्िर थारण किया। भात्वा को प्रधाम कर उहोंने पैदक्षिणां की भौर बमर हेकर स्यजद करते लगे प्लौरारकप्ण प्रेम में मतवाबे हो रहे हैं | बाहूर आते संगय उद्होने देखा, ईथान सस्थ्या कर रहे है

+ यहाँ दाम्रिक अनुष्दजों में मत्नव है

श्र थोरामइृष्णवघनामृत श्रोशमक्ृष्ण-(ईशाय सै]-सश तुम तब के आये हुए सख्यो# पात्तना ही कर रहे हो ? एक गाता सुवो

एंथान के पागे बैठकर श्रौरामकृष्ण मधुर स्वर से गाने छो- "दा, गया, प्रभाव, कागी, कॉची कोन चाहता है, अगर काछी फांदी महते हुए, यह अपनी देह त्याग सर | जिशरप्या फ्री बात लोग बहते है, परन्तु वह यह फुछ नही चाहता। प्न्ध्मा छुद उश्तकी खोज में फिरती है परततु कभी सग्धि नही पाती दया, द्त, दान आदि मदन को छुछ नहीं सुहाते, यहामग्री के घरण- फेम हो उसका बाए-यर है

"पर््या उतने ही दिनो के छिए है, जय तक उनके पापों में भतति ने हो--उसत्रा नाम छेते हुए आँखों में जब ता अँधू मे जा जायें और धरोर में रोमांच ने हो जाए।

“रामप्र्नाद के एक गाने में है-मेते युक्ति और मुत्िति सब बुछ प्रापा कर किया है, कयाकि काछो को ब्रह्म जाने मेने धर्मापर्म का त्याग कर दिया है !

(ट्िलिव फह होता है हव फू क्षड घाता है बढ भपित होती है, तब ईश्वर मिछते हैं--नाय सर्ब्यादि कर्म दूर हो जाते है)

“पुहृत्प की बहू के जब छड़का होनेवाद्य होता हैं, तब उसकी सास काम्र पथ देती हूँ नो महीने के गर्भ होगे पर फिर 'घर का फाम छूसे नहीं देती | फ़िर रमतान पंदा होने पर, बहू बच्चे को ही गोद में हिये रहती है और उसो की रोवा वरतो है। फ़िर उम्तके छिए क्षोई डाम्र वही रह जाता | इवरन्क्ति होने पर पम्ध्यादि कर्म छूट बाते हैं

ग्तुप इस तरह धीमा तिताठा बजाते रहोगे, तो हमे काम घ्ेश ? त्ीम्र बराग्य भाहिए। १५ मद्दीने बग एक शाह बगाओगे

ओरामशष्य हवा कर्मकाप्ड

दो क्या होगा ? बुम्हारे भीतर माहों वछ है ही नहीं--मानो जमे हुए बिठड़े के समान हो उठकर कमर कप्तो

“इसीलिए सुजले यह गाना नहीं अच्छा ढगता-हुरि सो ड्ापि रहो हे भाई। तेरी बसंत बनत वि जाई बनढ़ बन बनि जाई मुझ नही सुहाता ! ठोक वैराग्य चाहिए। हाजरा से भी में यही कहता हूँ

“बूहते हो, व्यों तीव बैराग्म नही होता ? इसमें रहस्य है। सौतर बापनाएँ और सब प्रवृत्तियाँ हे। यही में हाणत से कहता

हूँ। कामारपुकुर में सेठों में पानी छापा जाता है। छेंहों के चारों और मेड बेंधी रहती है, इसलिए कि कही पाती निकल ने जाग कीच की मेड़ पायी जातों है और मेड के बीच बीच में गाहियां कदी रहती है होग जफप्तय करते दो हूं, परस्तु उनके पीछे बासता

है। उसी वासना की सालियों से सब निकछ जाया करता है।

5३७० से मछली पकड़ी जाती है। बाँध तो तोधा ही होता है, १९ननु सिरे पर कुक हुआ इसलिए रहता हं कि उससे मछछी पकड़ी जाय वासना प्रछछी है) इसोडिए मन संसार में झुका हुआ है वासना के रहने पर मत की सहज ही ऊध्वंगति होती हुँ--इश्वर की बोर

“लोक जंते तराजू के कांटे कमितीआंपच का दयाव है, इसलिए कपर का कटा मीचे के काँटे की बरावरी १२ नहीं रहता, इसलिए छोग गोगभरष्य हो जाहे है तुमने दीपशिखा देखी है मं

/ जरा प्री हवा के छमने पर चंचल होती है योगावध््या दीपशिएा को तरहू है--जहाँ हृदा नही रुगती

"पन दितर-परितर हो रहा ई। बुछ परा गया है ढाका, मुछ दिल्ली भीद कुछ शूचविहार में है। उप मन को इशदुल

श्र थोराम[प्पशइवागूत

करना होगा इकट्ठा करके एक जगह रसना होगा तुम थंगर स्रोटह थाने का कपड़ा सरीदो, तो कपड़ेवाले को सोलह ओते तुम्हें देने पड़ेंगे या बहो ? कुछ विध्व के रहते १९ फ़िर योग नही हो सकता ठेंलोग्राफ के तार में अगर पही परा सा छेद हो जाप तो किर तार नही जा सकता

“परन्तु सस्तार में हो तो क्या हुआ ?ै सब कर्मों का फल ईश्वर को समपंथ करना चाहिए स्वयं किस्ती फछ की कामता ते करनी चाहिए

"वरम्तु एक बात हूँ भवित की काम्ता वागमनाओं में नहीं है भवित की कामता--मक्तित के लिए प्रांना कर सकते हो

“मकित का तमोंगुण छाओ्ो, माँ से जोर से कहीं। राम- प्रसाद के एड गाते में है-- बह माता और पृत्र का मुकदमा हूँ, बड़ी धूप मची हैं, जब में अपने को तेरी गोद में बैठा दूंगा, तेरा पिएट धोटगा !

“अंछोवप ने वहा था, जब म॑ ड्ुदुम्व में पंदा हुआ हूँ, तो मेरा हिस्सा जरूर है

"अरे वह दो तुम्हारी अपनी माँ हैं, कुछ बनी-बनायो गाँ थोड़े ही हैं ?--त छमं को माता हूँ अपना जोद उस पर ने घलेगा, तो कोर दिस पर च०गा ? वह्मे-'मँ, में अठमासा बच्चा थोड़े ही हूँ कि आस दिखाओगी तो डर जाऊंगा ? अवकी वार श्रीवाम के इजठाप् में मालिश बहुगा और एक ही सवाल पर डिगरी छूँगा ।/

“पत्नी मा हैं, घोर फ्रसोे। नित्रकी जित्तमें सत्ता होती हैं, उसका उस पर भाकपंण भी होता है। मां को हता हमारे भीवर है इप्तीहिए तो भा की ओर इतता आाकएंध होता है | झो ययापे

ऑरापकत्ण हुपा कंडाप श्१३

चैंव है, वह शिव की सत्ता भी पाता है कुछ कण ढप़के भीतर था जे हैं छो ययाय॑ वेप्णव हूं, दारायण की रुत्ता उ्के भीतर बाही हैँ! और मंद हो तुफ्हें विप्यक़र्म भी नहीं करता पता, भय कुछ दिग उह्हीं की चिता करो। रेस तो छिपा कि धंगार में कुछ गहीं

“और तुम विचयाई और मुखियाई यहू छत क्या किया कणों हो ? डैँते सवा है, तुम होगों के भगड़ों का ऐसला किया कस्ते हो--तुरहें लोग पर-पंच्र मारते हैं | गह तो बहुत दिन कर बुक़े | किन्‍्हें यह बंद करता हूँ, वे करें तुम इस समय उसके पादप्रों में अधिक मन छगाओ क्यों किस्तौकी बछ अपने शिर हेते हो ?

“पम्प ते कहा था, असताठ बोर दवासान बनवांगा। बहू भक्त था। इसोलिए मेने कहा, ईस्‍पर के दर्शन होगे पर कया इनसे अस्पततार और दवाताने चाहोगे ?

"कैशव पेन ने पूछा, ईश्वर के दर्शन बयों सही होते पेन कहा, छोफ-र्यादा, विधा यह दव खेकर तुम हो ने, इसी लिए नही होता दच्ला जब तक सिझौवा ढिये रहता हैं तब तक माँ नही अाती अुछ देर दाद छिडौता फ्रेंकगर पं वह चिहहाने एगता है, तब मा तवा उद्यरकर रौड़ती है |

“लुप्र भी भुस़ियाई कर रहे हो! माँ प्ोच रही है मेरा बच्चा मुखिया बनकर भरे “है, बच्छा रहे !”

ईशान मे थीरामद्ृष्ण का स्पर्श करके विदधपूर्वक बहा--में अफ्मी इच्छा ते यह सब नहों करा ।7

श्रीरामकृष्ण-यह में जानता हूँ। बह माता का ही सेछ है, उब्हीं की छोड़ा है ! मंपार में फपा रखगा, यह गहामाग की

डा थोरामहणददवामत

ही इच्छा हूँ थात बह हूँ कि द॑ंसार में कितनी ही नावें तंसती और इूवती रहती हैं। बोर झिवतों हो पहंगे उड़तो है, उबमें दो ही एक रटती हैं, ओर तव माँ हँसकर तालियां पीटती हैं छाझों में कहा दो-एक मुक्त होते हे। रहे-सहे सब्र माँ की इच्छा से बंधे हुए हूँ।

“चोस्चोर खेल तुमने देखा है या नहीं? टाई दो इच्छा है कि खेल होता रहे अगर सब हड़के दोटकर ढाई को छू लें, दी खेद ही बन्द हो जाय इसी हिए बूट्रिया टाई को इच्छा गही है दि सब लड़के उसे छू में

. “बौर देलो, बड़ी बड़ी दुकावों में ऊंची छत पके चा्रछ के बीरे भरे रहते है चावद्ध भी रहता है और दाह भो, परन्तु कही घूदे मे सा जाये, इसलिए बूदानदार कोएे के दरवाजे पर पूष में उतक्े लिए घान के छावे अछा रप्त देता है। उतमें कुछ गुड़ मिला रहता है। मे थाने में मीठे छगते है और गा सोंधो होती है; इसलिए सब चूहे सूप पर ही टूट दढ़ते हैं। अच्दर के बड़े बड़े कीठो की खोज नहीं करते। प्ोव क्षामिती-कांचन में मुग् रही है, ईश्वर को जबर नहीं पाते ।"

(६)

/ थ्रीरामहुष्प का सरपवाज्ना-त्याय फेडल भवितिन्कामना

प्रीरामइ्ृप्ण-वारद हि ने ढहा, तुम हमारे पार किसी बर की बाचना करो। कहा, राम ! मेरें छिए नव बाकी कया रह गया ? में दया वर मौरगू ? परन्तु अगर तुम्हें वर देता ही हैं, तो यद्दी वर दो, गिरसे तुम्हारे चरणकमलों में शुद्ध - भवित हो, फिर संतार को मोह छेनेवाण वुम्हारो इस माया में

शीरामकृष्ण तथा हमकाए्/ शहद

मुख्य होऊँ ।' राम ने कहा--नार्द, कोई दूधरा वर हो 7? गारद ते बहा--“राम ! में और गुछ नहीं चाहता यहो करो; जि हुम्हारे पादपक्नों में मेरी घुद्धा भक्ति हो

+क्षुने माँ से प्रार्थना की थी और कहां था--भौ, मे छोक- सम्मान नहीं चाहता, माँ, अप्दप्तिड्धियाँ हो वया, में एत धि्धियाँ भी तहीं चाहता, में देह-सुष्त मो नहीं पाहवा हूँ; दस यही करो हि तुम्हारे पायप्मों में शुद्धा भक्ति हो +

(“अध्यात्म रामायण में है कि लक्ष्मण मे राम हे पृछा-- *राम, तुप्र तो कितने ही रूपों और कितने ही भावों में रहा करते हो, फिर दिस तरह मे तुम्हे पहुचात पाठगा !” राम ने कहा-- आई, एक बात समझ रखो,--जहाँ ऊुजिता भक्त है,वहाँ में अब ही हैं ।' कमिका मस्त के होने गर भक्त हस्त है, सैता है, नासता है, गाता है अगर फिठ्ली में ऐप्ी मक्ति हो, तो मिशचय पाना, इर यहाँ गौजूद हैं चंतन्यदेव को ऐप्ाही हुआ था ॥9] ! भ्रयताण निर्वाद ही मुत रहे ६--देखवाणों को तरह इन सथ ब्रातों को मुन रहे हैं

श्रीरमक्ृष्ण कौ अमृतमयी दार्ता फिर होने लगी निवत्ति मां की बात हो रही है! पे

धीगमकृण्प- (ईशान से )-तुम खुशामदवाछी बातों में # आा जाना विषयी ऑदमियों को देखकर खुशामद करनेवाले श्राप उपस्थित हो जाते हैं * जा ह। “विपनी मादमियों में कुछ सार नहीं है। जैसे थोहर कौ ३०

शहर चीरामहण्णदतामृत

टोकरी सुशामद करतंवाड़े आकर कहेंगे, आप दाती हूँ, बह ज्ञानी है। इते दात पी वात ही मत समझो-सायमें इएं भी है। पहू कया है! कुछ संधारी बाह्मथ्रों और परिडतों को लेकर दिन-रात बैठे रहृग्न और उनकी खुशामद सुतना

श्ंत्ारी आदी तीन के गुहाम हू, फिर उनमें धार कंसे रह सकता है ? वे बीवी के गठाम हैं, रपये के गुलाम है और प्ाहिक के गछाम हैं। एक आदभी का वाम ने हूंगा, उसी शठ सो हपग्रे महीरक्ी ततस्वाह है। परत्तु वीवी का ऐप गुलाम है कि उसी के इश्चोरे पर उत्ता वैठता है !

“और मुध्ियाई और स्रपूंची आदि को कया जरुरत है?

दया, परोपकार?--यह सर तो पहत हिया यह सब छोग करते हैं, उन दूसरी ही भेगो है। तुम्हरि लिए भव तो यह है जि ईएवर के पादपग्ो मे मंत्र छगाओ। उर्हें पा छेने पर सब कुछ प्राप्त हो जाता है पहे वे हैं और दया, परोपकार, गंसार का उप्रकार वीवो क्षा उद्धार, का ल्‍ लेते के वाद है इत सब बातो की विदा से तुम्हे कया कई ! दूसरे को बहा अपने सिर वयों टादते ह्वी ! * “भुम्हदे वही हुआ है। कोई सर्वत्याती तुएहेँ यदि यह वरलाये कि ऐसा करो, वैसा करो, ऐो अच्छा हो संत्तारियों की सहाह है पूरा कहो पहने का, वह वह ब्राह्मण पण्डित हो या और कोई

"बाग हो झाओोे--विवर के प्रेम में पायछ हो जाओ।। लोग अगर यह ५०) हैँ कि ईशात 'इस समय पायछ हो गया है, झत्र यहू सब क्राम नही बट फिर वे तुम्हारे प्रात सरपंच बनाने के छिए जारगेऐे पष्कीवण्ये उठाकर फ्रैंक दो, अपना

ओरामकृप्ण तथा कर्मकाप्ड 2.3

इशान नाम सार्थक करो 7

'माँ, मुझे पागल कर दे, ज्ञान-विचार की अब कोई जहूरत शही है।' इंस भाव के गाने का एक पद ईशान ने कहा

श्रीरामक्ृष्ण-पागछ है या अच्छे दिमागवाल्ा ? शिवनाथ ने कहा था, ईश्मर क्री अधिक विम्ता करने पर आदमी पागछ हो जाता है मेनें कहा, स्या! चेतन की चिन्ता करके कया कमी कोई | शुचेतन हो जाता है ? दे नित्य हैं, शुद्ध और वोषकप हैं | उन्हीं के ज्ञात से छोगों में शान है, उन्हीं की चेतना से स्व चेतन हो रहा है।' उसने कहा, 'पाहवों को ऐसा हुआ था, अधिक ईश्वर- बिस्ता करते वे पागल हो गये थे हो सकता है वे ऐहिक पदार्थ की बिता करते रहे होंगे भावे ते भरठ तनु, हरल शान इसमें जिस ज्ञान के हरने की बात है, वह बाह्य शाव है।

ईशान श्रीरामकृष्ण के पेर पड़े हुए ढंठे हैं और ध्रव बातें सुम रहे हैं। ये रहु-रहकर मन्दिर के भीतर कालीमूरति को थोर देख रहे हैं। प्रदीप के आलोक में माता हँस रही हैं

ईशान--(श्रीरामक्ृष्ण प्े)-आप जो बातें कह रहे ई, बे सब वहाँ से (देवी की ओर हाथ उठाकर) आतो हूँ

प्रीरामकृष्ण-मे यल्त्र हूँ वे यस्त्री है, में गृह हूं वे गृहिणी, में रथ हू वे रथी; वे जेसा चलाही हें, मे वेग्रा ही लछता हूँ; जैता कहती हैं, बैसा ही कहता हूँ

"कल्िकाल में दूसरी तरह की देववाणी नहीं होती, पर्तु 'वातक या पागल के महू से देववाणी होती है--देवता बोलते है।

“आदमी कभी गुर नहीं हो सकते ईश्वर क्री इच्छा से ही संब हो रहा है महापातक, बहुत दिनों के पाठक, बहुत दिलों

* शिवजों का एक नाम

भ्द्ट पौरामहश्णरदनामृत॑

का अभाव, सब उसकी हृष्ा होने पर क्षण मर में मिट जाता है।

“हुआर छाल के वंपेरे कमरे में अगर एकाएक उपाजा हो तो वहू हार साठ वा बेंधेया झर जरा मा हटता हैं या एफ प्ताम ही पा जाता है ?

“आदमी यही कर सकता हैं. कि वह बहुहसी बाते बेतद़ा सता है; अग्त में पद ईश्वर के हो हाथ है बढ़ी बद्धता है, मुझे जो हु करना था, मेंतें कर दिया अब स्थायाबीश के हाथ

,शीवात हू

“ब्रह्म विक्रिप्य है। वे सृष्टि, स्थिति, प्रढुय भादि सब हाय दारते हैं, वव उन्हे बादिातित गहते है! उसी भायागरित यो प्रसध्न करता पढ़ता है। घण्टी में है, शनते हो