प्रकाशक मनत्री, सर्व-सेवा-सघ-प्रका दान, राजघाट, वाराणसी

प्रथम सस्करण 3 २,०००

दिसस्वर, १९६३ भल्य : एक रुपया पचास नये पैसे

भुद्रक - नरेन्द्र भागेव, भाव भूपण प्रेस, वाराणसी

उपोद्घात

९. प्रास्ताविक

नामघोषा का सक्षिप्त रचनातर, जो असमिया मे प्रकाशित किया गया था, उसका यह नागरी सस्करण, मैत्री-आश्रम के प्रकाशन के तौर पर, सर्वे- सेवा-सघ की ओर से, प्रकाशित किया जा रहा है, यह खुशी की बात है। वह असम के वाहर, और असम में भी, लोक-भोग्य होगा, ऐसी में आजा करता हूँ।

भारत की सब प्रातीय भाषाओं का अध्ययन करने की जरूरत मुझे पडी और प्रेमपूर्वक मेने उनका अध्ययन किया उससे मुझे बहुत आनद हुआ, और छाम भी हुआ भूदान के काम को भी उससे गति मिली लेकिन उसके लिए अनेक लिपियाँ पढने की तकलीफ आँख को हुई | वह कृतंब्य-मावना से सहन की गयी अगर ये सब भाषाएँ नागरी लिपि में होती, तो बहुत कम समय में, और बिना तकलीफ के, मेरा काम हो जाता इसलिए मेरा आग्रह रहा है, कि ये भाषाएँ नागरी मे भी लिखी जायेँ। में “भी” कह रहा हूँ, “ही” नहीं क्योकि उन्त-उन लिपियो का अपना इतिहास है शायद अपना अरूग सस्कार भी है। और ममत्व तो है ही इसलिए उनका जपना स्थान कायम रखकर उनके साथ नागरी भी चले, तो भारत की एकता के लिए वह लाभदायी होगा

हमारी पदयात्रा में जापान के एक भिक्षु श्री इमाइ कुछ महीने रहे थे उनके पास जापानी सीखने का भी मुझे मौका मिला था। मेने देखा, कि जापानी के लिए नागरी बहुत अच्छी तरह चल सकती है और इन दिनो,

शाति-निकेतन के प्रोफेसर श्री नारायण सेन के साथ चीनी भाषा की पाठ्य- पुस्तक हिन्दी में वनाने की कोशिग की | तब प्रोफेसर राहव को महसूस हुआ, कि चीनी शब्दों का ठीक उच्चारण नागरी में लिखा जा सकता है। चीनी और जापानी का यह अनुभव, यहाँ में इसलिए बता रहा हूँ, कि वे दोनो भाषाएँ एक सुवोव लिपि की तलाश मे है अगर भारतभर में नागरी चले, तो वह भारत के बाहर भी काम दे सकती है, इसका हमें ख्याल जाय खेर, वह तो भविष्य के गर्भ में है, और उसकी मुझे कोई आसक्ति नही |

इस सस्करण में असमिया व्याकरण की रूपरेखा थोडे में दी गयी है। अत कठिन दब्दो का अर्थ भी दिया है। दोनों की मदद से, हिंदी जाननेवालो को यह पुस्तक, पढने में, लगभग हिंदी जैसी ही मालूम होगी माघवदेव की भाषा पर ब्रज भापा का असर रहा है, ऐसा असमिया के विद्वानो का मत है

पुस्तक के रचनाक्रम के विपय में, असमिया आवृत्ति की प्रस्तावना में विवरण आया है। वह प्रस्तावना इस पुस्तक में दी गयी है। इसलिए, उस विषय में और कुछ खास कहने का रहता नही

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नह श््‌ २. अंतरंग निरीक्षण

अब हम ग्रथ के अतरग को देखेंगे। प्रथम ही ध्यान खीचता है “मुक्तित निस्पृह जिटो”। मुक्ति के विषय में निरभिकापता। भारतीय भक्ति-धारा का यह एक सर्वमान्य विचार है। “मैतान्‌ विहाय क्ृपणान्‌ विमुमुक्ष एक “-“दीनजनो को छोडकर, में अकेला मुक्त नही होना चाहता” यह प्रल्लाद का वचन सुप्रसिद्ध है लेकिन, नामघोषा के आरभ में ही इस विचार को पाकर चित्त सहज ही आक्ृष्ट होता है पर इसका अर्थ यह नहीं, कि मानव जीवन के अतिम लक्ष्य के तौर पर मुक्ति अमान्य है (३४४)

१. मुक्ति-नि स्पूहता

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जहाँ मुक्तित के विपय में भी नि स्पृहता आयी, वहाँ अन्य सव आशाओ का परित्याग अपेक्षित ही है (जड-६९) भगवान्‌ स्वय “निराशा” के ईब्वर है (२०१)

(तिराणा” शब्द से रसहीनता समझी जाय। प्रयम पद्य में ही “रसमय” भक्ति की माँग है और ग्रथ की समाप्ति “एहु रस मावव मूरुसमति गावे” (५००) इस वचन से होती हे। इस तरह ग्रथ की रचना रसादि-रसान्त हे।

“र्समय” भक्ति तो सभी वैष्णवो ने मानी है। लेकिन उस रस में वे

ऐसे वह जाते हे, कि भक्ति को वैषयिक शृगार का रूप आता है। नामघोपा इस दोप से सर्वेधा मुक्त है। यहाँ का सारा वातावरण अत्यन्त निर्मल है। हर सावन निर्मल होना चाहिए, इसीकी यहाँ चिता है। निर्मल रति (६५, १३३), निर्मल आनद (२८४), निर्मल घर्म (३९७), निर्मल भक्ति (१३६), निर्मल ज्ञान (६७), इस तरह अनेक स्थानो में निर्मलता पर जोर दिया है जैसे शरत्‌- काल पानी को निर्मल वनाता है, वैसे हरि-नाम, चित्त मे प्रवेश करके,उसको निर्मल बनाता है (१९०) चित्त-नर्मल्य के लिए ही भक्ति का विधान है (२६७) अगर भक्ति के मिप से चित्त विपयासक्त हो जाय, तो भक्ति ने आत्महत्या ही कर ली।

रसरूमय भवित

नेर्मल्य

जैसे भक्ति-मार्यी, रस-कल्पना-ग्रस्त होकर, एक वाज वह जाते हे, वैसे समाज-सुवारक, लोगो के दुराचारों के खडन में पडकर, दूसरी तरफ वह सौन्‍्य रीति “पं हैं तमोगुण के तीत्र खडन मे भी, तमोगण

जाता है। दुराचारों का खडन जरूर होना चाहिए

लेकिन वह, सौम्य, और सानुकप, होना चाहिए माववदेवने जहाँ भी खडन किया है, सौम्य रीति से किया है। जिसे मे “उपहार” पद्धति कहता हें उनका दर्जन यहाँ होता है “प्रहार” एकाब प्रसग में ही हुआ है (२२४) एक जगह दुरजेन को “सज्जन” ही कहा है (२९७)

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भव्िति-मार्ग अत्यन्त सुलूम है। नाम-स्मरण में तो कोई प्रयास ही किसीने माना नहीं (३५९) समसार-व्याधि के लिए नाम महोपब है (२१९) लेकिन उसके साथ माधवदेव ने एक पथ्य वताया- कि हमारे हाथ से किसी पर अन्याय हो। “दण्डघारी” भगवान्‌, हृदय मे विराजमान है, इसका रयाल रखा जाय (२४२) अन्याय से बचना, खास करके जब कि समाज-रचना की बुनियाद में ही उच्च-नीचता, वैपम्य, और नाना प्रकार के भेद पढ़े हो, मामूली वात नहीं इसके लिए परम यत्न करना होगा (३६०) माववदेव हमसे आगाह कर रहे है, कि यद्यपि हरिनाम सर्व-पाप-मोचक है, तथापि, अगर हम “देह-बन-जन-अर्थ-लोभे” अन्यायमूलक जीवन विताते जाये, और उबर नाम भी लिया करे, तो वह नाम “तारिते शीघ्र नपारे” (४६४) नाम-स्मरण के साथ जब अन्याय-निवृत्ति का कार्यक्रम जुड जाता है, तब भवित-मार्ग का एक विद्याल, व्यापक, विश्वस्पन्या हमारे सामने खडा होता है। इसलिए माववदेव, भकत-लक्षण में वर्णन करते हं--“वह लोक-हित की निरतर चिता करता है। उसका चित्त करुणा रस से भरा हुआ है। परिणाम की चिंता किये विना, वह अपने ही गुण में तुष्ट है। और वह सर्वथा अहकार-मुक्त है ।” (४७२) अन्याय-विमोचन, और लोकहित-चिंतन मे लगे हुए हरिदास को नम्नता की आवश्यकता होगी, यह तो स्पष्ट ही है (२११)। और उसके साथ-साथ उसको निर्भय रहना पडेगा। यहाँ तक कि नन्नता और “मृत्यु के मुख में प्रवेश करने पर भी वृत्ति निर्भयता निष्कम्प रहे”, ऐसी तैयारी करनी होगी। इसके लिए, चित्त में नाम प्रविप्ट होना चाहिए (३४५) नाम- स्मरण की निष्पत्तियाँ बताते हुए, सब निष्पत्तियों में, निर्भयता का प्रथम निर्देश करते है (खण्ड १९८) गीता में जहाँ दैवी-सपत्ति का वर्णन माया, वहाँ निर्भयता को नेतृत्व-स्थान देकर, अन्त में “नातिमानिता", यानी “नम्नता”, कही गयी है, जो सव देवी गुणो की रक्षक है।

५. अन्यायमोचन

नाम-स्मरणादि भक्ति-भार्ग, सवके लिए खुला है। “गारो भोट यवन' हरि-ताम ले सकते हे अन्त्य-जन हरिनाम से मुक्त होते हे (२९७) राम-नाम से “मिरि आासम कछारी” तरते है (४४४) यहाँ से जनो के लिए मुक्त-द्वार है। यह घर्म कुछ जास पाथिको के लिए होकर, पृथ्वी के सब मानवो के लिए है। अर्थात्‌ वह मानव-वर्म है (४१८) इससे भी आगे जाकर कहना चाहिए, कि इस पर सव प्राणियो का अधिकार है (३९७) इस विपय मे गजेन्दध- मोक्ष जादि कथाएँ, मगहूर ही है (९९, २६२)

सुम्तद्वार

केवल भक्ति से ही उद्धार सभव है। भक्ति स्वतत्र और स्वयपूर्ण सावन है। यह भक्तिमार्गे की निष्ठा है। “भगति स्वतत्र, अवलूबव आना”, यह ठुलूसीदासजी का वचन सव जानते हे भक्ति-च्वतत्र नामघोपा में भी यही विश्वास दीखता है (२२९, ओर स्वयंपर्णा. २३०) भक्‍त के लिए इस प्रकार का विश्वास स्वाभाविक ही नही, अनिवायें है। अन्यथा भक्त

अपनी भक्ति को ही खडित करेगा।

इसका अथ्थे यह नही कि ज्ञान को भक्ति में स्थान ही हो “साधन- सोपान” का विवरण करते हुए माववदेव कहते हे, “भक्ति चित्त को शुद्ध करती है सहज ही उसमें से वराग्य, और बोध का भक्ति में लाभ होता है, जिसमे परम-पद की प्राप्ति होती है” ज्ञान का स्थान (४६८) लेकिन वह वोब भकक्‍त को भगवत्‌-प्रसाद से मिलता है, ऐसी भक्‍तो की मान्यता है (३३०) तदनुभमार, एक जगह, भगवान्‌ से उन्होने विज्ञान-प्रदीप की माँग भी की हैं (१६८) “विज्ञान” यानी अनुभव-न्ञान, जिसके लिए “बोध” या “प्रवोध” शब्द श्रयुक्त है (२०८) ज्ञान ताकिक भी हो सकता है। ताक्कि ज्ञान से कोई लाभ नहीं (२१४) लेकिन सत्त्व-निष्ठ वृद्धि से लब्ब हुए ज्ञान का महत्व, भविति-मार्ग में सुरक्षित है।

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इस सिलसिले में सण्ड ९६ ध्यान खीचे बिना नहीं रहता। एकागी भवित-मार्मी, बुद्धि को बहुत ही गौण स्थान देते हे वैसा माववदेव ने नही किया है, वल्कि उस खण्ड में शास्त्र, गुरु, और थिप्य, तीनो की रक्षा, शिष्य- प्रगा पर निर्भर है, यहाँ तक वे कह गये हे “शिप्याप राधे गुरोरद/ड /, ऐसा मानने का रिवाज पड गया है। लेकिन यह सण्ड बोल रहा है /शिष्यापराधे शिष्यस्थैव दण्ड” (२५५)

भवित, ज्ञान-निरपेक्ष कही जाती है, वैसे वह कर्म-निरपेक्ष भी है।

मूढ कर्म-श्रद्धा तो, भवित-विरोधी भी हो जाती है (१८२) लेकिन कर्म

अगर भक्त के अग के तीर पर किया जाता है, तो उस

१०. भक्ति में कर्म को सेवा का रूप जाता है। उसको नामघोपा

कर्स का स्थान में, सिर्फ मान्यता दी है, बल्कि उसको 'सेवा-रस"

नाम दे दिया है (५) नामधोपा का यह विश्येप गब्द

मानना चाहिए। गाघीजी, जो इस जमाने के वर्ड कर्मयोगी थे, अपने करमे-योग को 'सिवा” ही नाम देते थे

नामधोपा में भक्ति का स्वरूप “ईइवर-शरणता” है। भगवद्गीता

का यही निचोड है। पैगम्वर ने भी इसी पर जोर

११. भक्ति फा दिया था। इसलाम” जब्द का अर्थ ही ईइवर-

स्वरूप - शरणता है। इच्छा-स्वातत्र्य, जो मनुप्य के पुरुपार्थ

हरिशरणता का मूलाबार है, ईव्वर-शरण भक्त को अपराव-्सा माल्म होता है (१३०-१३२)

ईश्वर के स्वरूप के विपय में भी भक्त की अपनी एक रुचि होती है !

वह जानता है कि ईइ्वर नित्य-शुद्ध-बुद्ध है (३३, १५७)। फिर भी भक्‍त के लिए वह करुणामय है। सिर्फ वह करुणा का सागर है,

१२- ईदवर- बल्कि करुणा की वहती हुई नदी भी है (१३९ )। स्सलन- फदणासय तेछू मानवता के लिए (६२) परमेश्वर का करुणामय होना, एक व्यावहारिक आवश्यकता है। अद्गैत की गर्जना करनेवाले,

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इकराचार्य को भी, “नारायण करुणामय शरण करवाणि तावकोी चरणौ”, कहना पडा है। और “रहमानुर्‌ रहीम” के विशेषणो से अल्ला पहचाना जाता है, इसका यही कारण है | हमारे सहस्न-सहस्र अपराधों के लिए, हम प्रभु से क्षमा तो माँगते ही है (२०)। लेकिन उसके मदिर में प्रवेश करने के लिए हम पर विन्र-प्रहार” हुआ तो भी, उसको हम भाग्य मातेगे। प्रभु हमारे अपराधों के लिए दण्ड देना पसंद करेगे, तो उनकी हम पर वह कृपा ही होगी (३७) हमको क्षमा करना, या हमे दण्ड देता, हम उन्ही पर सौपते हे और उनसे इतनी ही प्रार्थना करते हे, कि “करियो कृपा जेन उचित हय” (१७८) ईइवर की करुणा दर्शाने के लिए, नामघोषा मे ईश्वर को पिता, गुरु, आदि का स्थान दिया है (७९, १५१, २७६ ३०) मातृस्थान कम पाया जाता है। दक्षिण भारत के भक्‍तो ने ईश्वर १३ दाक्षिणात्यो को मातृ-रूप में देखा है, परल्तु उत्तर भारत मे वेसा का विशेष- नही दीखता। शक्ति के उपासक मातृ-उपासना करते हे, सातृभाव वह अलग वात है। लेकिन ईरवर को स्वय मातृ-रूप मानकर, सहल्नो पद्यों में ईश्वर का स्तवन, दक्षिण भारत में मिलता है, वह वहाँ की एक खास चीज है रवीन्द्रनाथ ने “जननी तोमार करुण चरणखानी” इत्यादि पद्य लिखे हे, तथापि “तुमि आमादेर पिता” यही मुख्य ध्वनि है। वाइविल मे भी ईश्वर को “फादर के रूप में देखा है। वेद की प्रार्थेना “पिता नोउसि पिता नो वोधि” प्रसिद्ध ही है--यद्यपि वेद में “त्व माता शतक्रतो वभूविथ”, ऐसे भी वचन आये हे। मातृ-भावना के अभाव की पूति, नामघोषा में दो स्थानों मे, धेनुवत्स-दृष्टात से की है (१२८, ४२५) नामधोषा कोई दाशंनिक ग्रथ नही है वह भविति और प्रार्थना की पुस्तक है। लेकिन तत्त्वज्ञान का जो आनुषगिक दर्शन उसमें आया है, वह अपने में परिपूर्ण है

ईइवर सगृण या निर्गुण ? इसका उत्तर दिया है, “निर्गुण सगुण और गुणनियता” ( १४८ )। इससे वेहतर उत्तर नही हो सकता। जीव और ईरवर का सवध /आमिओ अजय तोमार” (७५) ईश्वर ही एकमात्र सत्य, वाकी सव “चराचर मायार कल्पित”, केवल विनोदरूप (२४)। अनात्मा में आत्मबबुद्धि, दुख का कारण (१५४) “इद्रियगण भृत प्राण बुद्धि मन” यह सव जडराथि है (१९२) फिर भी जड और चेतन के वीच रहने का नाटक, मन कर सकता है। जिसका मन जिस पक्ष में पडेगा, वैसा हौ उसका जीवन बनेगा। (२३२) नरूतनु महान्‌ पुण्य से प्राप्त हुई है, जिसमे मुक्ति की शक्‍्यता है (१०३) | लेकिन गलत काम करके, कई दफा, हम वह स्रो चुके हे (१६१) और आगे भी, भक्तिहीन जीवन जीयेगे तो, खो सकते हें, यहाँ तक कि “तृण तरु शिल्ला/ भी वन सकते हैं (२९९) यह है माघवदेव का तत्त्वज्ञान | और उसको उन्होने “शुद्ध-मत” नाम दिया है (२२१) मैं इससे “भकित-प्रधान, एकेडवर-निष्ठ, अद्वेत” समझा हूँ यहाँ पर एक वात ध्यान में लेने की है, कि यद्यपि भक्ति-प्रवान होने के नाते, माधवदेव विधि-मुक्ति चाहनेवाले हे (४०६), तथापि वेद-मर्यादा का उल्लंघन वे सहन करनेवाले नहीं (३३३) 00 जेक पा कहते हे, “जो श्रृति-स्मृति की आज्ञा का उल्लघन करेगा, वह चाहे भगवान्‌ का भक्त भी हो, वेष्णव नही कहा जा सकता” (३५१) श्रुति-जननी के पद-पथ पर हम चल रहे हे, ऐसा उन्होने दावा किया है (३४८) लेकिन उत्कट भक्ति, ओर परम वैराग्य में, विधि-मर्यादाएँ टिक नहीं सकती, यह भी वे कह देते हे (३३६-३३७) एक प्रइन और उठता है। मूर्तिपूजा के विपय में नामघोपा का क्‍या रुख है ? असम प्रदेश में, हर गाँव में 'नामघर” होता है और उसमे 5६ ममता मूर्ति नही रखी जाती, बल्कि ग्रथ रखा जाता है हर रामानुज, मध्व, वललभ, चैतन्य, आदि, सब मूर्ति को माननेवाले है यहाँ तक कि, निर्गुण ब्रह्मवादी होते हुए भी, शकराचाये ने,

१४ तत्त्वज्ञान

विखरे हुए पथों के समन्वय के लिए ही क्यो हो, पचायतन-पूजा चलायी। उस लिहाज से, नामघरो में मूरतति का होना, एक विशेष सुधार माना जायगा | लेकिन जहाँ तक नाम-घोषा का ताल्लुक है, उसमे मृतिपूजा का निपेघ या अनादर नही है, वल्कि आदर ही सूचित हे (२२) | भगवान्‌ की जैसे “मूत्तिशून्य” कहा है (१८१), वैसे ही “मधुर-मूरति” भी कहा है (४८३) यही ठीक है। भगवान्‌ अमूर्त ही हे, ऐसा हम आगह रखेगे, तो वह एकागिता होगी। ”द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे म्रत चेव अमूरत च” (बृहदारण्यक २२१)। इस तरह, ब्रह्म के दो रूप, उपनिपदो ने भी कहे हे मूर्त में जो अमूर्त छिपा हुआ है, उसका रयाल करते हुए, अगर मूर्ति की पूजा की जायगी, तो वह जड-पूजा होगी। और जड-पूजा का निपेघ अवश्य करना चाहिए (२१६) | मूर्ति-पूजा को “द्वापर-युगीन घर्मं” कहा गया है। और “कलियुग! के लिए नाम-सकीर्तव साधन बताया है (४३५) इसका अर्थ इतना ही है, कि पूजा के लिए, वाह्य साधन-सामग्री की, और पूजा- विधि के ज्ञान की, अपेक्षा रहती है ऐसी कठिनाई हरिकीौतंत में नही है इसलिए हरिकीतंन छोडकर, अगर कोई पूजा आदि मे लगेगा, तो उसका वह श्रम-मात्र होगा (४३६ )। नाम-सकीतंन की यह महिमा नि सशय है। और उसमे जो तन्‍्मय होगा, उसको पूजा आदि की जरूरत नही रहेगी, यह भी स्पष्ट है। हिन्दू-धर्म में पूजा, लाज़िमी या अनिवार्य नही मानी है। वैसे उसका अनादर भी नही है। “मूर्ति' नावजानाति”, यह हिन्दू-धर्म की वृत्ति है। वैसी ही नामघोषा की है एक सामाजिक सुधार की बात, जिसके लिए हमे महा-पुरुपार्थ करना पडेगा, माधवदेव ने नामघोषा में सुझायी है। १७ धकपा को मास, मत्स्य, आदि के सेवन से, समाज मुक्त हो, इसकी एक दिशा 'डेपन, उनके हृदय मे थी। इसका दर्शन घोषा ३५५ में मिलता है। यह घोषा तो भर्तृहरि के एक इलोक का तर्जुमा है। उसका नामघोपषा के प्रतिपाद्य विपयय के साथ, सीघा

सवध नही है। फिर भी, इसको नामघोपा में स्थान देकर, उन्होंने अपना विद्येप मनोभाव प्रकट किया है। “आहारशुद्धी सत्त्वगुद्धि ञ, यह भारत- भूमि का अपना विचार है। इस विपय में अनेक प्रयोग, प्राचीन- काल से आज तक, भारत मे किये गये हे लेकिन अभी बहुत कुछ करना वाकी है। उसके लिए “दवि दुग्ध घृत मवु” (१८५), यह उपाय भी नामघोपा में सूचित है। और भी कई वैज्ञानिक खोजे करनी पढडेगी। देखना है, भारत यह कब कर सकता है !

जिनको भारत के भव्िति-साहित्य का परिचय है, उनको नामघोपा में, अपना चिर-परिचित वातावरण ही मिलेगा। पचास साल पहले, बचपन में, में महाराष्ट्र के सतो के भवक्ति-साहित्य में १८, परिचित निरतर निमग्न रहता था। पचास साल के वाद, जब वातावरण नामघोपा पढने लगा, तो मुझे भास हुआ, कि में मराठी ही पढ रहा हूँ। वे ही विचार, वे ही शब्द, और कभी-कभी तो वे ही वाक्य, दीख पडे मिसाल के तौर पर-- “हरि तैसे हरिचे दास” (तुकाराम) “हरि जेन आति कृपामय भक्त गुरुजनो सेहि नय” (४७२) “तुझ््या नामाचा महिमा। तुज कछ्े पुरुषोत्तमा (तुकाराम) “आपुन नामर महिमाक हरि आपुनि अन्त नपान्त” (४१५) सेवा-चोर पाया पाशी” (तुकाराम) “मइ मन्दमति भैलो सेवा-चोर” (१५१) यही सिवा-चोर” शब्द और भी दो जगह आया है (७५, १५६) नामघोपा है तो असमिया भापा में, लेकिन मेने कही-कही उसमे, मराठी ही पढ लिया | जैसे---

१०

“साधुसग अनुसरा श्रवण-कीर्तेन करा परिहरा पापण्ड-आचार” (२०५)

इसका मराठी में तर्जुमा करने के लिए कुछ भी बदल करने की जरूरत नही।

यह तो मराठी के साथ तुलना हुई | ऐसी ही तुलता अन्य भाषाओं के भक्ति-साहित्य के साथ भी हो सकेगी मिसाल के तौर पर---

तमिल भकक्‍त-शिरोमणि नम्माव्धवार ने, (जिनका नाम शठकोपन्‌ था), गाया है--- तोडर्‌ तोडर्‌ तोडर्‌ तोडन्‌ शठकोपन्‌ ।” इसका अनुवाद ही नीचे का वाक्य होगा--

“दासर दास तान दास भैलो आमि” (१०६) दोनो का मूल सस्क्ृत “दासदासानुदास” शीर्षक में दिया ही है

राम से भी “राम-ताम” बडा, यह तुलसीदासजी का विचार, राम-चरित-मानस के करोडो पाठको को परिचित और प्रिय है। राम-चरित-मानस के आरभ में, नाम-महिमा गाते हुए, रामायण के समान उन्होने एक “नामायन” ही लिख डाला है। उसीका थोड़े में दर्शन कर लीजिये-“अनत शकति तुमि राम * इत्यादि दो घोषाओं में (४४९, ४५०)

नामघोषा का यह अतरग-निरीक्षण मैं इतने में समाप्त करना चाहता

हूँ ग्रथ-प्रवेश के लिए वह पर्याप्त है।

माघवदेव का चरित्र जानने की इच्छा पाठकों को हो सकती है।

इसलिए, एक जति सक्षिप्त परिचय, अलग से दे दिया है। वास्तविक, जो ग्रथ, लोक-भानस में, आषे-वाणी (स्क्रिप्चर)-सा वन

१९. 2330 गया हो, वह व्यक्ति-विशेष के जीवन से सपृक्‍त नहीं कर रह सकता। फिर भी आधुनिकों को उस भ्रकार की जिज्ञासा रहती है, इसलिए दे दिया है। माधवदेव के जीवन का चित्र,

११

तामघोपा के एक पद्म में मिल जाता है--हरि-भक्ति के राजमार्ग में, हम आनदित होकर घूम रहे हे। गुरु-पद-नसचद्रिका का सौम्य प्रकाश, मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध है श्रुति जननी के पद-चिह्न दीख रहे हे गिरने का कोई सवाल नहीं” (३४८) यह चित्र असम की यात्रा में, सतत भेरी आँख के सामने रहा इसलिए, वहाँ के मेघाच्छन्न वातावरण में भी, कोई दिन, मुझे 'दुदित नही मालूम हुआ (२०७)। अत में, जिस घोषा का जिक्र मेने हमारे असम-प्रवेश के पहले दिन किया था, उसका यहाँ फिर से स्मरण करता हँ-- “अधमे केवले दोप लवय, मध्यमे गुण- २० गुणग्रहण दोप लबे करिया विचार उत्तमे केवले गुण लवय, उत्तमोत्तमे अल्प गुण करय विस्तार” (४००)

श्रीकृष्णापंगमस्तु भूदान-पदयात्रा हे बालगीर जिला ८7 हे 7/ पे ८4 (ओडिस7) १६-११-६३

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असमिया आवृत्ति की प्रस्तावना

हमारी पदन्यात्रा का 'मुख्य उत्पादन' है भूदान-प्रामदान | पर उसके साथ-साथ उसमे दूसरे अनेक गौण उत्पादन होते रहते हैँ। महापुरुष श्री माधवदेव के नामघोषा' की यह सक्षिप्त आवृत्ति, वैसा एक गौण उत्पादन है। पद-यात्रा के लिहाज से तो वह गौण है, लेकिन लोकोपयोग के स्याल से गौण नही | भारत के हृदय को जोडने का काम उससे अपेक्षित है।

दस साल की पदनयात्रा के वाद, मार्चे १९६१ के दिन, हमने रमणीय असम प्रदेश में प्रवेश किया। तव से अब सालूभर बीत गया। यहाँ के समाज के साथ एकरूप होने की दिहे मने प्राण हमने कोशिश की उसका एक जश्ञ था, असमिया के आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन

दो महापुरुषो को इस भूमि ने जन्म दिया, जिनका नाम यहाँ तो घर- घर चलता है, यद्यपि भारत के वहुत से लोगो को उनका पता नही इसमें किसीका दोष नहीं। ईश्वर की योजना में हर चीज' का एक मौका होता है। उसी मौके पर वह चीज बनती है। वह मोका अब आया दीखता है। महापुरुषों ने लोकहृदय-सम्पर्क के हेतु से प्रादेशिक भाषा में लिखा। लेकिन प्रादेशिक जभिमान उन्होने नहीं रखा था। भारत भूमित जनम लभिया' (घोषा“-२७८) भारत रत्नर द्वीप' (घोषा-४०७ ) इत्यादि अनेक वचन उनकी विशाल भावना के निदर्शंक हे। इतना ही नहीं, जिस तरह आजकल हम जय जगत्‌' कहते हे, वैसा ही वे कहते थे, अपवर्ग-योग्य नर-

* 'नामथोषा' के श्लोकी को 'घोपा? कहते हैं | श्३

तनु पाया पृथिवीत' (घोषा-१०३), ऐसी भाषा विव्वात्मा बनकर ही वे बोल सकते थे

असमिया के आध्यात्मिक साहित्य का मेरा जो बहुत ही थोडा अध्ययन हुआ है, उसमे 'नामघोपा' ने मुझे विशेष आकपित किया | उस पुस्तक को मेने अनेक वार पढा। उसके कई वचन मेरे कठ में बैठ गये उसकी सगति मे मुझे मित्र-सगति का आनन्द मिला। उसका मेने अपने लिए एक सक्षेप कर लिया, जो सब साधको के उपयोग के लिए प्रकाथित करने का सोचा गया।

मूल सहस्र पद्मयों में से इसमें ५५६ पद्म चुनें हें। सख्या-अकन दूसरे प्रकार से किया होने के कारण पद्य-सख्या ५०० हो गयी है। ३० अध्यायो में और २०० खण्डो में उसे विभाजित किया है। मुख्य तीन विभाग बनाये है --+( १) प्रार्थना (२) उपदेश (३) महिमा प्रथम विभाग में भगवत्‌-प्राथनाएँ, भक्तहृदय की व्याकुलता, आत्मनिरीक्षण आदि का समावेश किया है। दूसरा और तीसरा विभाग पूर्णतया विभक्‍त नही है। उपदेदय में महिमा मिलेगी, महिमा में उपदेश का भी अश मिलेगा। प्राधान्येन निर्देश ', इस नियमानुसार वे विभाग है। तकंशास्त्र में जिस तरह का विद्विलष्ट चिन्तन होता है, वैसा भक्ति में नही होता। भक्ति मे सबश्लिप्ट और समन्वित चिन्तन होता है। इसलिए ये विभाग अन्योन्य- मिश्र से हे--इच्ध-बनुष्य के रगो के समान !

विभाग, अध्याय, खण्ड आदि रचना में पद्मों का आज का क्रम स्वाभा- विक ही बदल गया है। बोतल में रखी हुई दवा पीने के पहले हिला करके पीनी चाहिए, ऐसा औपघोपचार का रिवाज ही है।

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साघवदेव ने वरगीत भी लिखे हे। हर वरगीत के अन्त में उनका नाम अकित है, जैसा कि ऐसे भजनो में हमेशा हुआ करता है। नामघोपा में उनका नाम चार दफा आता है। ग्रन्थ-समाप्ति मे एक दफा तो अपेक्षित ही है, पर और तीन दफा क्यो आया होगा नामधोषा को तीन विभागों में मेने विभाजित किया, उसको आशीर्वाद के तौर पर यह पूवे-योजना की गयी, ऐसा मेने मान लिया अध्यायो और खण्डो के नाम जो असमिया मे हे, स्पष्ट ही है कुछ नाम सस्क्ृत में दिये हे, जो पुराने ग्रथो से लिये गये हे। कुछ साकेतिक हे, जिनका अर्थ समझ लेने के लिए चिन्तन की जरूरत रहेगी। उदाहरणार्थ 'रल्लत्रय' (अध्याय-२४) बौद्ध, जैन आदियो ने अपने-अपने ढग से 'रत्न- न्रय' की कल्पना की है जैनो मे, 'रत्नत्रयघारी' ऐसा बच्चो का नाम भी रखते हू। नामघोषा मे “रत्नत्रय' एक विशिष्ट वेष्णव-सकेत है। (१) सर्वत्र गुणदशेत (खण्ड-१५९), (२) पुरुषार्थे-प्रेरणा (खण्ड-१६०) और (३) विधि-मुक्ति (खण्ड-१६१), ये भक्तिमार्गीय रत्नत्रय हैँ दूसरा उदाहरण 'विष्नत्रय/ (खण्ड-१४९) अन्तरनाद-श्रवण (घोषा-३८० ) में तीन विष्न आते हे--विविध पुण्यासक्ति (घोषा-३८१), विषय-वासना (घोषा-३८२ ), व्यर्थ-विचार (घोषा-३८३) इस तरह जहाँ साकेतिक नाम होगे, वहाँ पाठकों को चिन्तन से उनका खुलासा कर लेना चाहिए। इसमे लिये हुए पाठ अक्सर श्री नेओग की आवृत्ति में से है। अन्य प्रकाशनो में से भी कुछ लिये हे। एक जगह मेने अपनी ओर से, मूल सस्कृत पद्मानुसार, पाठ-सशोधन किया है (घोषा-३४० ) अध्यायो में गीता-निर्णयय नामक १८वाँ अध्याय पाठको का ध्यान खीचेगा। इसमें से अनेक पद्य नामघोषा में एक स्थान मे हे और कुछ अन्य

१५

स्थानों से एकच्ित किये गये है माधवदेव का गीता का निष्क्प श्रीघर- भाष्यानुसारी है (घोषा-३३०) गीता ही एकमात्र शास्त्र है! ऐसी अपनी निष्ठा ग्रथकार ने व्यक्त की है (घोषा-३०५)

नामघोपा के जो पद्च यहाँ लिये हैं, उनमें कम-से-कम आधे पद्म अन्यान्य सस्क्ृत ग्रन्थों से लिये गये हे वाकी के उनके हृदय के सहजोद्गार है। दोनो समीचीन और हृद्य हैं असमिया साहित्य में तो भायद नामघोपा अद्वितीय ही है। भारतीय भाषाओं में भी उसका अपना एक स्थान रहेगा।

भगवन्नाम-स्मरण को मुख्य केन्द्र बनाकर उसके इदे-गिर्दे अनेक जीवन-मूल्यों को माघवदेव ने सूचक ढग से भ्रथित किया है। उनका विवरण यहाँ देने की आवश्यकता में नहीं मानता मेरे कई भाषणों में इसके अनेक पद्यों का सहजभाव से विवरण हुआ है। उतने से में फिलहाल

सतोष करना चाहता हूँ श्रीकृष्णापंणमस्तु

भूदान-पदयात्रा, विनोबा का सुवर्ण क्री अचल जय जगत (असम) हे २२-२-६२

सहापुरुष श्री साधवदेव का अल्प जीवन-परिचय

असम के उत्तर लखीमपुर जिले में, महापुरुष श्री माघवदेव का जन्म सन्‌ १४८९ में हुआ उनके पिता का नाम गोविन्द था, और माता का नाम मनोरमा था, जो महापुरुष श्री जकरदेव की वहन थी

माववदेव का वचपन बहुत कप्ट में गुजरा वचपन में ही वे खेतीवाडी के काम में रूग गये पद्रह साल की उम्र मे, लगान वसूल करने के काम मे, मदद करने छगे। वर्तमान पाकिस्तान के रगपुर जिले में, उनका, सस्कृत, व्याकरण, न्याय, तकं, आदि ज्ञान्त्रों का, और पुराणो का, अव्ययन हुआ

पिता के देहात के वाद, उन्होने, सुपारी और पान का, व्यवसाय आरभ किया राज्य के पूरव से लेकर पश्चिम तक, वे नौका से कारोवार चलाने लगे। इन्ही दिनो में उनका, श्री शकरदेव से सवध आया। माघवदेव शाक्‍्त विचार के थे श्री शकरदेव के साथ चर्चा करने के वाद उन्होने, शकरदेव का शिष्यत्व पहण कर लिया। इस समय उनकी आयु ३२ वर्ष की थी, लौर शकरदेव की ७२।

जब माववदेव व्यवसाय छोडकर गुरु-सेवा में मग्त हो गये पाडित्य के साथ ही उनमें, काव्य-स्फूति भी थी। और वे सगीत-भास्त्र के भी ज्ञाता थे उनके सम्मिलित होने से, वैष्णव-सत्न (मठ), और असम प्रदेण, हरि-कीतेन की घ्वनि से गूंज उठा।

इससे आहोम राजा क्षुब् हो गये। क्रुद् पुरोहित-वर्ग ने भी, राजा को इस नव वैप्णव घर्मं के खिलाफ उभाडा | राजा ने उन्हें पकडने के लिए सेना भेजी सेना माबवदेव को, और शकरदेव के दामाद हरि भूज्या को, पकडकर ले गयी। हरि भूज्या की हत्या की गयी, और माबवदेव को मास कैद में रखा गया

सोलहवी सदी के आरम में, पव्चिम कामरूप में, कोच-राज्य का उदय हजा | कोचराजा नरनारायण, विद्यानुरागी और घर्मपरायण पुरुष थे कद से छूटने के वाद, माबवदेव आहोम-राज्य छोडकर, कोच-राज्य में चले

१७

गये। वहाँ वर्तमान वरपेटा के नजदीक सत्र की स्थापना करके, भक्ति- प्रचार करते रहे

माघवदेव प्राय अपने गुरु के साथ ही रहा करते थे। शकरदेव ११९ वर्ष का दीघे जीवन जीकर, सन्‌ १५६८ में कोच-राज्य की राजवानी कुचविहार में, वैकुठ पघारे उनके वाद २८ साहू तक माववदेव कार्य करते रहे वीच-बीच मे उन्हे राजकोप भी सहना पडा। सन्‌ १५९६ में १०७ वर्ष की अवस्था मे, कुचविहार में ही, उनका महाप्रयाण हुआ माचवदेव आजीवन ब्रह्माचारी रहे

प्रचार का कार्य मुख्यत माधवदेव ने ही किया एक प्राचीन कवि ने लिखा है

“शकरे भकत्ति प्रकाशिला मात्र साधवेसे प्रचारिला ।”

इसका सबूत असमभर फैले वैष्णवो के सन्न हें। उनमें से अधिकाश सत्रो की स्थापना, माधवदेव ने की है। भाद्रपद मास के वदी पचमी को, इस महाभागवत की, सारे असम में, श्रद्धा-भक्तिपूर्वक, पुण्यतिथि मनायी जाती है।

१८

नासघोदा-सार के व्याकरण की संक्षिप्त रूपरेखा

असमिया व्याकरण, हिन्दी मराठी गुजराती के जेसा जटिल नही इन भाषाओ मे, लिग-विचार के कारण जो तकलीफे होती हे, उनसे असमिया आदि पूर्वी भाषाएँ वरी हे नामघोषा तो और ही सरल है। क्योकि उसमे बहुत सारे शब्द, सस्क्ृत या सस्कृतोद्भव हें इनके अलावा दूसरे शब्द, घोषा-सार में बहुत ही थोडे हे

विभक्ति आदि के प्रत्यय जोडने मे भी, खास कठिनाई नहीं इसलिए यहाँ पर, विकरण की विधियो मे पडकर, जो रूप आये हे, उनकी वर्गी- क्ृत तालिकाएँ देकर, हमने समाघान माना है।

ग्रथ पढना शुरू करने के पहले, इन तालिकाओ पर सरसरी नजर डाली जाय, तो पढते-पढते आजय समझने में मुश्किल नही होगा कठिन शब्दों के अर्थो के लिए, आखिर में, कोश है ही 'विभक्ति-

महेश, मृत्युवे - पापमाने, पितुगणे

२, भकतक, जगतके, छेदिवाक उपदेश, कृपाये वेकुठरपरा, अधमेतो, देहार, देवकीत हन्ते, (अपेक्षा) मोत परे, ब्रह्मतो करि

नामर, गुणेर

मुक्तित, सेवातते, चरणे, शय्या माजे, पजर भितरे

नोद--प्रथमा में मान! और गण' लरूगाकर बहुवचन किया है। सर्वेताम-

मई के रूप : मइ, आमि, हामो, मोक, मोके, आम्हाक, आमाक ,

मोरे, मोत परे, मोर, मोहो र, मेरि, मोरे, आमार, आम्हार, हामारे, मोते, आम्हात

१९

ुर्मि के रूप तइ, वुमि, तोमाक, तोम्हात, तोक, तोर, तोमार,. तोमारे, तोम्हार, तोम्हारे, तजु, तुवा, तव, तोम्हात, तोमात, तोमाते

जि के रूप जि, जिटो, जेइ, जाक, जारा, जार, जाहार, जारे, जात

'ई के रूप इ, इटो, एहि, आक, आके, इहाक , आर, इहात, आत-

से के रूप सि, सिटो, सेइ, सेहि, तेहों, तारा, तारासवे, ताक, ताके, ताको, ताहाको, तार, ताहारो, तान्त, ताहान्त, तान, ताने, ताहान, ताहाने, तासवार, ताक, ताहाक,. ताहारासवारो, तात, ताते, ताहाते

आपुत्ति' के रू आपुनि, आपुन, आपुनो, आपुनाक, आपुनाके,

आपुनार प्रश्नार्थथः कौन - कोन, कोने, कोननो, काक क्या - किनो, कि, किवा

क्यो - केने

कैसा - कमन, कमने, केमने, केनमते, किमते, केने, केन, किनो, किना

कहाँ - केक

कितना - कत, कतनो, कतवा, कतो किसलिए - किवातरे, किसके

धातुरूप- वर्तमान उ० पु० - मागो, मागोहो, कहओ, रओ,|आाछि म० पु० - आछा, आछाहा, वोलय, मर, जानस, हुयाछ तृ० पु० - आछे, आछय, आसे, हय, होवे, भुजावे, मुहियाछे, सेवत, निगदति, जाय

२०

भूत

उठ0 पु० मस० पु० तृ० पु० भविष्य उ0त पु० म्‌० पु० तु० पु०

बन

भैठों, भैठोहो, पाउडो भैला, साहा, भैलि

रछे, करिठेफ, हराइठ, नियायरत , भेझा, करिया करिल, करिले, के रिवेफ, हुराइव, 3 उ, भा, वार ठा

करिवो, एराज्वो, हुब्बोहो पाइवा, पाइवि हैव, हैचे, हुवे, हैवेक, चुलिवेक

आज्ञा-पार्थना - कर, करा, करियो, करियोक, करिओ, करहु, करायो

(प्रे०) देसा, भिजाव

इच्छा-अनुज्ञा - होक, होक, हुयोक, आचरोक

विधि

नसकार

शदय

कऊदत-

- बुलिय, जानिवा, जानिवाहा, करिते उचित, करिते जुवाइ, क्षमिवे जुबाइ

- घातुरूप के जारभ में, न, नि, नु, ने, नो, लगाकर, जैसे-नकर, निविहिला, नुहे, नेदे, नोहय ३०

पार” इस णक्‍्यार्थी घातु के रूप लगाकर, जैसे-तारिते पारे, छेदिवाक नपारे, करिवे पारे

पूर्वकालवाचक- करि, करिया चतेमान कृदत- थाकत (ओ) भूत कृदत- लैले

शब्द के अन्त मे प्रयुक्त, 'से” का अर्थ “ही” होता है। जैसे-तोम्हारेसे, तेदेसे, भकतेसे इ०।

०५० ्ज

शब्द के अत में, “भी” के अर्थ में, “ओ”, कभी स्वतत्र रूप से लगता है, और कभी अन्त्य अकार में मिल जाता है। जैसे-लक्ष्मीओ, मुकुतिको इ०।

२१

अध्यायानुक्रमणिका

अध्याय नाम

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प्रार्थना शोघना विनय अनुनय आरति उद्वोधन काकूृति मिनति दैन्य कारुण्य

रहस्य साधना लोक-प्रवाह भक्ति

बुद्धियोग मूढजन-स्वभाव जन्म-साफल्य गीता-निर्णय पद-पनन्‍्थ

नीति

निगमन

कीतंन-भ्रवणादि

« निशरचय

रल्त्रय प्रभाव प्रेरणा योग-सार नामायन प्राप्ति

पूर्णाहुति

« खण्ड १२ प्रार्थना

८--११ १२--१४ १५--२ २२--२५ २६--३५ ३६---४ ४२--- ४७ ४८---५२ ५२--५६

२, उपदेश

५७--६८ ६९--७८ ७९---८८ ८९--९४ ९५--९८ ९९-१०२ १०३-१११ ११२-१२३ १५२४-१३ १३२-१३८ १३९-१४५

३. महिमा

१४६-१५२ १५३-१५८ १५९-१६३ १६४-१६८ १६९- १७३ १७४-१७५ १७६-१८६ १८७-१९३ ९४-- २००

इलोक

र्र १५ १३ ३०

१८

रउ घर

१६ १४ १७

१८ १५ १५ १९ २१ १४ १९ ३० १८

१८

१७

१७

१७ ५५

१३

श्२

२८

४७ ५१ प्डे फप्८ ष्र्‌

६६

छ४ ८० ८४ ८६

| ९६ ९८ १०० १५०३ १०७ १०८ १११ ११४

दढ॑ती नव +म 05

२० ११

जे

श्ढ

१५

: प्रार्यना अध्याय प्रार्यना

मज्नूलाचरण अन्तर्यामी-गुरु प्रा्येना साधन-श्रम परिद्यार भक्ति-प्रमाद भाया-निस्तार अपराघ-विनाशन क्षमापन

अध्याय + शोधना जनुनायना बात्म-सम्बोधन समुद्र-द्वय वेत्र-प्रहार

अध्याय विनय शरण

भजन नमस्कार

अव्याय . अनुनय

आातुर-प्रार्थना

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है. ००० मनन >जक ॥०7 *4*॥7६

नियिले नल समन रत

गोबादइए *

बपनस बन कल नी वन लनन>नम-+- 4

बयस गाबार + लमाय खाए

अध्याय ५. बारति

निपनन्‍्ता मायव अमूल्य भवित कमने भजियों हरि केणवादि नामावक्ति

अध्याय उद्बोधन

श्रेप्ठ-निरज्जन-सुन्दर- पावन पार-पार अम्यर्थना चेतना गजेन्द्र-मोक्ष कृप्ण-पञ्जर वानप्रस्थाश्नम खेद

निजगृह दासदासानुदास

४» ५»

8

जे

२४ २४८ २७

२६

२६ २६

२७

३६

३७ ३८ ३९ ४० ४१

४२ रे

४५,

४७

४९ ५० ५१ ५२

५३.

अध्याय काकूति

सत्ये सत्ये पशिलो शरण

भुवन-मोहन भकति-प्रदीप चाओ नजानो एत दिन काकृति-बाणी स्वातन्ब्यापराध

अध्याय * मिनति

शकतिर पति अविद्या-सागरे मजिलो करुणासागर-+- करुणासिन्धु

मने लैलो सार बाछि सच्चिदानन्द

निर्गुण गुणयाम

अध्याय * देन्‍्य

कि काम करिलो आमि

अनात्मनि आत्मबुद्धि प्राणप्रभु पीताम्वर मोर प्रभु नारायण दीनवन्धु दामोदर

अध्याय १० : कारुण्य

भाल भारसा पाया आछि

२८ २९५ २५ ३3०

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३३ ३३

३४

३५ ३३५

३६ ३७ ३७ शे८ ३९

४०

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५५ ५६

+ ५८ ५९ ६० ६१ दर ध्रे द्४ड द्५ ६६ ६७ ९८

६९ ७१ ७२ ७३ ७४ ७५

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दुगूटि अक्षर--

विज्ञानप्रदीप -- अनपायिनीभवित ४० अनादि-स्तोत्र डर करियो कृपा जेन

उचित हय डरे

. उपदेश

अध्याय ११ रहस्य

एफ़ान्त-भक्ति ४७ भक्ति-गौरव ४८ नार्थवाद ४८ महेंग-दृष्टान्त डेट पावन-मूति ४९ शरद्वत्‌ ४९ हेन महेग्वर विष्णु ४९ जडराशि-प्रवर्तक ४९ निगम-तत्त्व-सार ५०

निप्कामो वा सकामो वा ५० निज-यश -प्रिय प्रभु ५० नाम-सिंह ५०

अध्याय १२ साधना

आशा-परित्याग ५९ मुक्त-साधना ५१ मृत्युअ्जय ५्र्‌ सम्यजना श्रृणुत प्रे ग्राम्यकथा वि० हरिकथा ५२ वैराग्य-भाग्य ५३

लक्ष्मीनिरपेक्ष सेवानन्द ५३

छद६ छछ 3८

9९ -८० -<८र्‌ 7 ८४ <५्‌

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८९ ९० 5१२ डर

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53

चरणाधिकार नम्नता साक्षात्कार

ष्‌ उठ ण्ठे ण्रे

अध्याय १३ लोक-प्रवाह

जब्दशकिति-क्ुण्ठन तकंचास्त्र-महाव्या प्री जडपूजाघमावमा

हेन नाम एतिखणे हेला नामौपच

'कोवा कोदा'

दाम्भिक गुरु

वाचनिक भकक्‍त आगमादि-वाद भोगैरवर्य-मत्त

अध्याय १४ * भक्ति

नामापराधघ-विनागन केवल भक्ति

आदि मध्य अवसाने वासुदेवाय कृष्णाय वाघजालि नाम-अज्जनीया

अव्याय १५ वुढ्धियेग

मनोजय शास्त्र-गुरु-णिप्य वज्य-पञ्जर मानवजन्म-प्रयोजन

ण्ड फ्ड प्‌ ह.4 ण्प पक ण्ष ८ु ५७ ५७

५८ ण्‌ ५९ ६० 0

६१

घर ६३ घ्डि

इ्५

र५

अध्याय १६ मूढजन-स्वभाव

५९९ १५०० १०१

श्ण्र

भक्‍त-निन्‍्दा श्रोतृ-अवलक्षण व्यर्थ-पाण्डित्य गृहासक्ति

द्दि ६७ ६८

जध्याय १७ जनन्‍्म-साफल्य

१०३ १०४ १०५ १०६ १०७ १०८ १०९ ११० १११

हरि वोल हरि-गुरु-पद-सेवा भाविते भाविते राम नामे ताहाको नछाडे महोदय

आया नामे नदी माजे

विपयर आजा-भड्डे नाम-निन्‍्दक सज्जन तृण तरु गिला

६९ ७० ७१ ७१ ७२ ज्य्‌ ७२ ७३ ज्रे

अध्याय १८ : गीता-निर्णय

११२ ११३ ११४

्श् ११६ ११७ ११८ ११९ १२० १२१

प्र

१२३

हि

कृष्ण बन्दे जगद्गुरुम्‌ गीतागास्त्र शोक-मोह-महाप छू; माजे

आत्मोद्धार

त्रिविव नरकद्वार त्रिगुण-निस्तार

अपि चेत्‌ सुदुराचार मच्चित्ता मद्गतग्राणा पुरुपोत्तम-योग प्रमार्थ-तत्त्व अर्जुनोद्गार गीता-निर्णय

छ्ढं छ्ड

७५ प्‌ ७६

१२४ श्श्५ १२६ १२७ १२८ १२९५ १३० १३१

१३२

१३३ १३४

१३५ १३६

१३७ १३८

१३९ १४०

१४१ श्थ्र १४३

अध्याय १९ ; पद-पन्य

सन्तर कृपात सुवासना ८० महन्त-लक्षण ८० चमविृत-पाद ८०

अन्तस्त्यागी वहि सद्भी ८१

विरक्‍तो मद्भकतो वा ८१ हरिदास भले ८१ पब्न्चग्रन्थी ८२ भकक्‍त-विहार ८३

अध्याय २० ; नीति

अविरोघ-साघक

सहस्ननाम ्ट्डं आत्महा ८४ बेदवाह्य भक्ति आर भक्तिवाह्म वेद वुद्धदरशा ८५ सफाई विभाग <८फ्‌ अकारण वैरी <५ वैषम्य ८प्‌

अध्याय २१ « निगमन

पियो पियो पियो ८६ अप्रयासे आरु

परम जतने ८६ राम-तामखानि

फुरियो गाया ८७ कि कार्य मनुष्य

भैल पामर ८७

विचारि देखियो ८८

२६

१४४ १४५

कैतव तेजियो मुक्त-सम्मत

३: महिसा

८८ ८९

अध्याय २२ - कीर्तन-अ्वणादि

१४६ १४७ १४८ १४९ १५० १५१ १५२

१५३ १५४

१५५.

१५६

१५७.

१५८

१५५ १६० १६१ १६२ श्र

सत्स ज्ञे भवभज्ञः कीतेन-महानन्द अन्तरनाद-श्रवण विघ्नत्रय त्रयोदणी अप्टनाम मायव-नाम

अध्याय २३ : निदचय

आराष्य-निश्चय निर्मत्सरता चाण्डालो5षपि यज्ञाय नामतीर्थ

अन्तिम लक्ष्य समस्ते प्राणीर अधिकार

अध्याय २४ . रत्नन्नय

गुणग्रहण पुरुपार्थ विधि-मुक्ति भारत-रत्न रत्न-प्रकाश

९३

श्र

९४ ९४ ९४ ९्ड दर

९६ ९६ ९६ ९७

९७

अध्याय २५ * प्रभाव १६४ वह्लिव्वायुस्योग. १०० १६५ हरेरप्यगम्य १०१ १६६ धर्मोक्त धर्म १०१ १६७ रुद्रादि-सड्धूपंण श्ग्र १६८ घेनु-वत्स-न्याय १०२ अध्याय २६ * प्रेरणा १६९, कलि-भाग्य १०३ १७० नित्य-सन्ध्या श्ढ्ड १७१ गाम्मीर्य-ध्यान १०४ १७२ युग-घर्म श्ण्प्‌ १७३ जय जय टरड्भूर १०६

अध्याय २७ : योग-सार

१७४ राम वुलि तरे मिरि आसम कछारी १७५ जेइ नाम सेइ हरि

१०७ १०७

अध्याय २८ . नासायन

राम कपाट रामत करिया रामनाम चार कृष्णवित्‌ कृष्ण एव भवति १०८ क्ृ-कपा, प्ण-लज्जा १०९

१७६ १७७

२१०८

१०८ २१७८

२१७९

२७

१८०

१८१ १८२ १८३ १८४ १८५ १८६

१८७ १८८ १८९ १९० १९१ १९२ १९३

१९४

१९५ २९६ १९७ १९८ १९९ २००

पादमूले --

पुरुषार्थशिरसि १०९. अवतारहेतु १०९ उरुक्रम-पराक्रम १०९ भक्ति-सरोवरे ११० कथने-मथने ११० शुकानुभव ११०

तिनिरो उत्तम भक्ति ११०

अध्याय २९ प्राप्ति

नाम-प्रताप १११ तारिते शी क्रे नपारे १११ दिग्देश-प्रशसा श्१२ साघन-सोपान ११२ एकान्त-भक्‍त ११२ आदिसत्ययुगीन धर्म ११३ गुरु-गौरव ११३

अध्याय ३० : पूर्णाहुति

अनन्त-कोटि-ब्ह्माण्ड- नायक ११४ प्रकीर्ण घोषा ११५