# उपक्रमणिका! भ्रावन्त की पकादशों दै।आकाश में इधर उधर बरसने हायक पएरकाध छोटे छोटे बादल दिखाई दे जाते हैं | एकादशी के चन्द्र अपनी फीकी चाँदनी फेल! रहे है नीचे चन्द्र की चाँदली से जगमगाती हुई गंगा की धारा वही जा रही है। चषो के पानी , से उंचला गंगा का पानो मटमैछा हो गया है किन्तु फिर भी भरोयूरी गंगा की जल फरीड़ा बड़ी ही मनोहर है फीकी चाँदनी मे दिखाई दे रहा है कि गंगा का पक्र किनारातो भूमि में मसमाना फेला पढ़ा है, दुसरे फिसारे पर ऊंचे ऊँचे पहाड़ हैं जिनसे टकराती हुई कल करू शब्द करती हुई धारा वह रही ऐै। बीच दीच में मद्दो की हुई ओर पत्थर की चद्दानें खिसक खिसककर धर्माफे फे साथ गिरती हैं जिससे गंगा का पानी ओर गर गंदला हो जाता है ४४%

चिन्धथ्याक्षेत्र से एक छोटी होगी वन्ारस की ओर व्रद्दी चली

रदी है। इस नाव में छः सात युवक सवार हैं। ध्रायणी एफादशी के समय जगज्लननो विन्ध्यदासित्तो के दशन फे लिये पहुत भीट जमा दोदी है। भारत के घहतेरे शहर्रा से इस पृण्य समए में फिनने दे छिन्‍्द देवो का दशंन कर अपने को पचिक् यनाने आते एं। एमारी इस साथ याप्री लोग भी दर्शन के लिये गये घे। कुछ पुण्प लेने नहों--एकादशी फे ध्यगार पे दिय भीष्ठ पा तमाशा देखने गये थे | शाऊ घदटलोग एिन्प्यादरछ

अधपघ:पतत'

से बनारस अपने एक मित्र के घर चले रहे हैं। वन्तारस पहुँचने के बाद छोग अपने अपने घर जायँगे

नाथ में तरद्द तरद्द की बातें ओर युवकों जेसी हँसी-द्व्छिगी चल रही है इन युवर्कों मै केषघल एक युवक चुपचाप बैठा है |

पक्र युवक ने कहा,--'"आज बहुत बच्चे, चलने के समय जब आँधी आई, तभी मेरी जान सूख गई थी | इसके बाद जब

मल्लाहों ने कहा कि नाव सँमालना मुशकिल है, तब तो में

अपने को निरा मुदों ही समझने लग गया था। सोचने लगा, कि स्त्री फे मत में कष्ट पहुँचा चले आने का यही फड़ है। तुम छोर्गों को क्‍या ? तुप्र लोग तो वरना जानते हो मरने के लिये हम ओर राजेश्वर दो ही थे ।”

और एक ने कहा,--'बहुत ठाक ! किन्तु हम छोग बचते तो तुम दोनों को भी बचाते द्वी, तुम छोगों को यों द्वी छोड़ जाते ।!

“क्षदत्ता जितना सहज है, काम करना उतना सहज नहीं तथ सोचते कि-+आत्मानंसततं रप्तेत्‌ ।?

दुसरे बोले,--जाने भी दो; जब मरे ही नहों, तो बदस कैसी कुछ तुम्दार स्त्री विधवा तो हुई नद्ीं; तब इन बातों से कया घास्ता ? अब यद्द बताओ, तुम अपनी स्त्री को फेसा मनोकष्ट दे आये हो ।”

एक ने कद्दा,--“वबाद्द यार | तू सचमुच पक्का वकील होगा इसनी बातें हो गई, पर असल बात भूलने पाई

दूसरे ने कहा,--“तेरी समक पर तो पत्थर पढ़े हैं अरे

उपफ्रमणिका

इनको स्त्री ने मिलते हुए जाने की आज्ञा दी थी, सो तुम्त लोगों के मारे मुलाकात मी होने पाई |”

तीसरे ने पूछा,--'तुम्दारी स्त्री कहाँ है १”

“ऐसा वेबकूफ तो मैंने देखा ही नहीं | अरे मेरे घर होती तो में मिल के दी आया होता ! इस समय मेरी स्त्री अपने पिता के घर अर्धात्‌ असार खलु संसार के सार सखुर मन्दिर में है ।”

एसी समय पक्र ने ऊदा,-- चुप चुप; जरा सुनो तो खट्दी ।”

इस छोटी नाथ के पास एक वडा वज़रा पहुँचा था। शायद कोई शोकीन चरित्रहीन धनी कुछ वेश्याओं के साथ विन्ध्यक्षेत्र से लोट रहे थे। उस बजरे से मधुर स्वरम किसी रमणी गले से निकला संगीत उस सक्नाट में स्वर का साप्राम्य बाँध रद्दा था। सारदड्ी रसणी हे स्घर से अपना स्थ॒र मिला रह्दी थी, तथछा घीरे घीरे टमफ रहा था। गाना हो रदा था |

गान समाप्त होते ही इस छोटी डोगी से एक युवक रछूलकार उठा,--

“वही तथला सारज्जी जो पहले थी वो अब सी है।

चद्दो रफ्तार बठद्गी जो पदले थीचो अब सी है ॥ए

अन्यान्य नवयुवर्कों से घहुत घत्‌ चुत पे डसे शुप कराया। किन्तु इस बतुझे ओर चतालेपन को शायद चज़रे घर ने खुम लिया। गानेवाऊ अपना आधा ही गाना गाकर प्॒प दो रहे, यज्रे में बठे मद छोग दहन युवरझखों फी छेड पर हंस

पट़े पुरषों फी सग्भीर हलो और स्तियों क्री कोमछ खल- शिएाएट साफ खाई दी |

अधःपतन (2

इसके बाद फिर सारह्ली ने स्वर मिलाया ओर गाना होने लगा | अबकी किसी दूसरी ञ्री ने गाना शुरू किया, जिसकी आवाज़ पहली से भी अच्छी थी

युवकों में एक ने मह्छाह से कद्वा--'ज्र/ जददी जबरो नाथ बढ़ाये चल ।”

किन्तु देखने देखते धारा मे पाल के सहारे जामेवाली वह बड़ी नाय र्‌र निकछ गई ! गाने का स्वर धोरे धोरे गायब होने लगा। अन्त में बह स्वर गंगा. को छूदरों के साथ दूर चिकल गया केचल जल का कछ-कर दब्द ओर डॉडो का छप छप बाकी रहा

प्र यच॒क वहुत ही गम्भीर साव से नाव के एक्र किनारे बैठा था ; वह बहुत हो चिदकर अपने साथियों की ओर देख रहा था। एफ ने उससे कहा,-- क्यों राजेइवर ! बिलकुल उढल्दू की तरह लुपचाप बेठे हो !”

युवक ने उत्तर द्या,--“यदि में जानता, कि तुम छोग ऐसा बन्दर पनर करोगे, तो कभी साथ ने आता ।”

“कया हुआ क्या /

“उस नाव के गाने की सुनकर दि्व्कगी उड़ाने की कया जरूरत थी ? चर्त्रिदोनाओ के साथ दिल्‍लगी करना भी

पाप है ।”?! “यह तो हमने पहले ही कह दिया कि दारका प्रसाद ने

लुरा काम फिया ।” द्वारका प्रसाद ने घोरे से अपने बगल में बेठे एक्र युवक से

कद्ा,--'कैसी मुशक्िल है ! नाव भी इनके जान प्रार्थना-मन्दिर

उपक्रमणिका

सभी बातो में पवित्रता की जरूरत है। इसी से तो में इसके साथ कहां जाता नहीं

दाग्क्राप्रसाद की चगल में वेठे युवक ने कहा,--उस्रका नाम छो वृढा द्वा चला, तब भी विवाह नहीं करता उसके लिये सव घान बाईस पलेरी है। आज्ञ कल कलियुग में धर्म्म के तीन पैर रह गये हैं, यदि सब छोग धर्म करने लग, तो अधर्म बचारा फहाँज्ञाय ? हम में से कोई वकील हे, फोई रोज्ञगारी है, उसके जेला धर्म दम छोग कैसे बना सकते हैं ? जय तक राज़ेश्वर विवाह करेगा, तव तक इसके सिर से पचित्रता का भूत उतरेगा |”

इसके बाद उसने राज़ेश्वर क्री ओर देख कर कहा,--'क्यों राजे | अब घिदाद करके ग्ृहस्थ कब वनोगे १!

“एस देश में घिचाह १”

“क्यों, यद देश किससे खराब है ?'

"एस देश के विवाह भे इब्हा-दल्हन को राय नहीं लो जाती रस देश में वाल्य-घिवाह, शिशु-विवाद का रिवाज है। एस देश में सत्र शिक्षा पाप माना जाता है, इस दे स्त्री पी स्वाधीदनता पे नाम पएर लोग कांप उठते हैँ, इस देश मे पिधवा-दियाह मना पर मद छोग आछाश फे तारों का तरद अनगिनती पियाद् फर सतने हैं, ऐसे टेश के मनप्य सो दाहों

मगुप्प ऐो सदाते है !

'पूस देश पे मनुष्य, मनुप्प नहीं तो ८पर फणा हैं

“मनुष्प रोते हो दात्प-पिदषाद फा रियाज्ञ जाने कथ

अधः।पतन

बन्द्‌ हो गया दोता | मनुष्य होते तो स्त्री शिक्षा का प्रचार करते; स्थ्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देते मनुष्य होते तो दुर्दे-इल्हन की राय लेकर विवाह करते। मनुष्य होते, वो विधवा के ममभेदी विलाप को कभी बरद्वाश्त करते ।” कहते कहते राजेश्वर की आँखों में आँसू गये राजेश्वर को बाते सुन द्वारका प्रसाद हंसते हँसते अपने बगछ के साथो पर गिर पड़े साथी ने धीरे से हाथ दवा उसे चुप रहने का इशारा किया राजेइवर ने इन दोनो के काम पर ध्यात्र नहीं दिया। एकले राजेश्वर से पूछा,-- अब तुम क्या करना चाहते हो ?”' राओेश्वर ने फहा,--'मैं समाज फा संश्कार चाहता हैँ ।”

“इससे कया होगा ?”

८“ इसले देश में स्व तरह की उन्नति होगी।”

ओर पक्र ने कहा,--“अच्छा, अम्ी सही, फभी होगा ही। अब जरा देशी भाषा में बोलो; सच बताओ कि विघाद्द करोगे या नहीं ?!

“मेँ बा।दय-विवाह करूँगा यदि कभी किसी विधवा का दुःख दूर कर सक्ू, यदि में समभू कि घह मुझे चाहती है, स्पे मैं उसी से विवाह करूँगा | नहीं तो मेरे घियाह करने करने में सन्देह है ।””

द्वारका प्रसाद ने धीरे से अपने बगह मे बेठे युवक से कहा, “चावय-घिवाह का क्या मतलब ? राजेच्चर की उच्न तो तीस वर्ष के करीब है,--फ्या अभी यद्द बारूक ही है ?

है|

उपफ्रमणिका

और एक कुछ कहना चाद्ृता था, ऐेसे समय नाव किनारे लग गई एक मरलादह ने कद्दा,-- पहुँच गये, उतरिये ।”!

दव सब लोग अपने अपने जूते खो जने लगे

इन युवका फे पास कोई विशेष सामान नहीं था। फेवल कई छोटे छोट चेग थे जिसे दो आदमियाों ने उठा छिया। इस मे वाद अपने अपने छाते ओर छड़ी लेकर सब छोग सीखे उतरे | मस्लाद को किराया देकर सब लोग शहर की ओर चले।

सोढियाँ तय कर युवक्न छोग सड़क पर पहुँचे। राह में फूडे के ऊपर एक कुष्ता सोया था, एक युवक की छड़ी की घोर से पद चिदलाता छुआ भागा | सब हंस पड़े उस सक्ताटे में इन सब फी एँसी भूतां फी हँसी जान पड़ी

केवल राजेप्न्नर ने फदा,--'ठस ज्ञीप को कए देने से फ्या फल मिला ?”!

इस पात पर किसी ने ध्यात भी नहीं दिया। युवक गण

तंजी फे साथ एफ भोर चल दिये; फिसी ने फिसी से दात भी रद्यों दी |

अधपतन प्रथम परिच्छेद

वर भोर कन्या

डपफ्रमणिफा में लिखी एुई घटना के बाद दो वर्ष दीत गये ससार में नित्य नई घटनाये हुआ करतो हैं; इन दो घर्षा के भीनर भी वहुतेरी घटनाय दो गई हैं, उन नोकायाज्नी युवर्कों के जीपन में सो घह्ुत षुःछ देर फेर हो गया है; फाम में फेंस सबफे सप देश विदेश में छिटक पढ़े हैं

सम्ध्या पा समय है, पनारस फी एक गछोी मे राजेश्चर के याया फऐै घर पक्ष कमरे में दो युवक बैठे हुए हैं, इनमें एक राजे- ध्यः ओर दुसरा दाण्फा प्रसाद है। अप्ती कुल चीस दिन हुए राजेश्यर फा विवाद हुआ दे | यद विधवा-विदयाह नहीं, कुमारी गियाद है इस पियाए में राज़दवर समाज की उन्नति या विधया पा दू पा दूर कर नह सफे। दिनन्‍तु लड़की देख कर विवाह छिपा है एस दिपाद दी कटद्दानो पा है--

फानपुर से लोगने पर एक घर्ष घाद राजेद्वर के बड़े भाई क। रस्यु हो ग६। राजश्यर पी मा के हृदय में यह बहुत कड़ो पोट पएँयी उनझ्ा मन पएलाने के लिये राजेध्वर उन्हें ले तीर

घाद्या को निषुछ गये दिसी तीघ में और एक भले घराने से फेक है

अधःपतत्त २०

उनकी भेंट हो गईं; यह घराने का घराना तीर्थयात्रा के लिए निकला था। इसी में एक कन्या भी थी। कन्या उम्र में कुछ बड़ी थी; देखने भें वैसी खूबसूरत नद्दी तो बहुत भद्दी भी थी। असल बात यह कि कवाँरे राजेश्वर की निगाह में यह लड़को अच्छी द्वी जँची कन्या के माता पिता को कन्या आप ही भारी हो रद्दी थो; उन दोनों ने राजेश्वर की माता से विवाह के बारे में बांत चीत की | विवाह बन गया अपने एक पुत्र की सतत्यु के बाद से ही राजेश्वर को माता विवाह के लिए बहुत जोर दे रही थी आखिर माता के आँखओं ने राजेश्वर के मन को मोम घना दिया। लड़की भी राजेश्वर को वद्सूरत नहीं जान पड़ी आखिर चोदद घधष की कन्या के पेरों पर राजेश्वर समाज संस्कार की इच्छा ओर विधवा के दुःख दरून की कामना अर्पण कर देने के लिए तैयार हो गये

तीर्थयात्रा से छोटने के बाद कन्या के पिता ने राजेश्वर के चाचा से इस विवाह फे बारे में बात छेड़ दी विवाह ठीक हो गया | इसके बाद एक दिन राजेश्वर अपने चाचा के घर से मोर पहन कर चले ओर दूसरे दिन नथ पहने हुईं एक दुर्द्न को लेकर लछोट आये |

दुल्हन को लेकर राजेश्वर बड़ी प्रसन्‍नता के साथ घर लोटे; मानों बड़े कष्ट से शाहज्ञादी को लेकर अलादीन अपने

घर आया दो

8 (22 दछ ५9

११ : ध्रथम परिच्छेद

दारका प्रसाद ने कद्ां,--''अब कया कद्दते हो ? विवाह के वद्‌ का जीवन कैसा जान पड़ता है ?”

राजेश्वर ने कहा,--“बहुत अच्छा जान पड़ता है अबसमझ रहा हैँ, कि कुछ दिन पदले विचाद्द क्‍यों किया १”

“डीक है ठीक है ।”

राजेश्वर ने कोई जवाब नहीं दिया | द्वारकाप्रसाद ने फिर कहा- “स्त्री कैसी है ? क्‍या अपने वाप के यहाँ जाना

चाहती है *' ..._ «हाँ, तीन चार दिन हुए गई है ।”

“विवाह होते ही विदाई ? लड़की छोटी है न, इसी से ।”

“क्यों ? सती तो स्लो ही ठदरी-इसमें छोटी बड़ी फैली ?”

“अभी ऐसा ही जान पड़ेगा नया प्रेम पियानो चाज़ा के समान मनोहर होता है। इसके वाद छड़के की वीमारी, छड़की का विवाह; यह सभी छीलाये सवार होंगी। तब कान के पास जय का डड़य वजने छंगेगा।”

५यातो मे तुम्ह कोई पायेगा /*

“क्र्या नहीं, हम सब सोग जो चुके है, पुराने पापी हैं, हम लछोण सब समझते हैं। पुराने ही मल्छाह समझ सकते हैं कि कहाँ रेतो ओर कहाँ संवर है |”!

“ठीक है भाई !!

“इसके वाद यह चताओ, कि. डाकखाने की आमदत्ती बढ़ा रहे हो यथा नहीं १”

“डाऋखाने की आमदना कैसी ??

“अर्थात्‌ खूब शोप्रता के साथ चिट्टियाँ भेज रहे हो ' या नहीं ?”

इस प्रश्न ने राजेश्वर फो शर्मिन्दा कर दिया। उसने कदा-- “हाँ, अभी एक पत्र लिखा है। क्‍या पत्र लिखना उचित नदी है ?”

“यह कोन कद्दवा है? हम छोग भी पहले पदल बहुतेरी चिट्ठियाँ लिख चुके हैं। अब तो लिखने के लिये कोई बात ही नहीं सुझती, उस समय लिखते समय कलम रुकता ही ने था यह कहो कि तुमने कितना बड़ा खत लिख मांस ? आठ पेज्ञ या सोलह 077

“त्चहीं ज्ञी, इतना बड़ा नहीं ।*”

“चलो खैरियत है ।”

इस प्रकार बहुतेरी बादों के वाद द्वारकाप्रसाद उठकर चहल दिये। रास्ते भर द्वारकाप्रसाद राजेश्वर की बातें सोचते चले गये उनके प्रलक्ष चेहरे पर मुस्कुराहट खेछने छगी। उसने सोचा,--कैसा चित्त बदलता है | यह वहीं राजेश्वर है ! समाज- संस्कार का इच्छा ओर देशोशन्नति की कामना इस समय र्री के चरणो में अर्पित है में इतने भड़म्बे का पक्षपाती नहीं बहुत कम उम्र में मेरा विवाह छुआ; नये प्रेम का नशा कुछ दिनो तक बड़े चाव से बढ़ाया गया; इसके बाद, बस | भ्ृहस्थ बनकंर सोलहो आने ग़हस्थी मे फँसना पड़ा। जीवन कोई स्वप्त तो है नहीं जिस पर इतने दिन तक विचार करने के बाद

इस उम्र में विवाद किया जाय। सोचते दी विचारते हृदय रोग-

१३ प्रथम परिच्छेद

स्थान वन गयां, जिसमें ज़रू रूपी रस पड़ते दी सूल गया-- जरासा पानी वरखने से कहीं रेगिस्तान सी शीतल हुआ है ! अब हम लोग नई नई पली के आदर्श की कह्एना करते है; किन्तु पाते हैं पुरानी जैसे जैले उम्र चढ़ती जाती है, वेसे वैसे नई का आंदश नस नस में वेठा जाता है इस समय तो राजे- ध्वर भाई का नशा खूब जमा है; इसमे खुमारी आये, तश्नी मड़ल है |

उस दिन रात को लेटे लेटे राज़ेश्वर फे हृदय-पट पर एक धालिका का चित्र खिच गया। रंग गोरा-गोरा, वनांवट बुरी नहीं राजेश्वर को वह चित्र बहुत ही भरा जान पड़ता था

राजेश्वर सोचने लगे,--''अपनो अफेली फोटरी में बेटी वालिका सोच रही है ? मेरा घ्यात कर रही है ? जितना में उसे चादता है, उतना द्वी वह बालिका भी मुझे चाहती दे? शायद नही ( मत ने आप ही अपने को समझाया ) यदि अप्ती नहीं, तो आगे चल कर चाहे ज्ञो हो। अभी वहुत छोटी है ।” इसके वाद राजेश्वर ने फिर सोचना शुरू किया-- कई दिन वाद में अपनी ससुराढु जाऊंगा; इस समाचार को पाकर वह मन में वहुत प्रसन्न हुईं होगी उसे देखने की आशा से जैसे मेरा मन आजनन्दित हो रह! है, चेसे ही मुझे देखने के लिये डसे भी आनन्द द्ोता होगा ? क्यों द्ोगा १”

इसी प्रकार राजेध्वर अपनी र्नी की दो दिन की छुछाकात के चारे में मनन ही मन तके-वितर्क करने गे बालिका की सव बारां में ही उन्हें सरलता ओर प्रेष्त दिखाई देने छगा। इच्छा

अधः-पतन १४

होती तो उन सब बातों फे वहुतेरे अर्थ किये जा सकते थे। किन्तु रांजेदवर अपने मन के गुताविक अर्थ लगाने छगे |-- “उस बालिका का हृद्य प्रेम से कितना परिपूर्ण है। वह अम्तृत- भरा घड़ा मेरा है। आज में कितना खुखों हैं। यदि विवाह करने में इतना सुख है, तो मैंने इससे पहले विधाद्द क्‍यों नहीं किया ? किन्तु पहले विवोह कर लेता, तो इस उेशी को कहाँ पाता ?”

राजेद्वर इसी प्रकार खयाली पुलाव पकाते रहे नये विचाह या नये जीवन में प्रवेश करने पर पहले पेसे ही बह- तेरे स्वप्त ओर आशाओं की खष्टि होती है। वह स्वप्त या वह आशारय बहुत खुखकर भो होती हैं। मनुष्य का हृदय अपनी इच्छा से स्वगे या नरक की सृष्टि कर सकता है; किन्तु जब तक स्वर्ग की सृष्टि हो सकती है; तब तक कोई चरक की श्टष्टि

कया करने छगा ?

दूसरा परिच्छेद

बगल की कोठरी जिस रात करवर्टे बदूते हुए राजेशवर तरह तरह के खुख- स्वप्न देख रहे थे, उसी रात बगल की कोठरी भें ओर भी एक युवक को नींद नहीं रही थी; यद्द राजेश्वर का भतीजा

माधव प्रसाद है। बन्द कोठरी में जलते हुए चिराग की रोशनी से माधव

दूसरा परिच्छेद

जाने किस चिन्ता में हवा है। धीरे धीरे उठ कर उसने पक सन्‍्दुक खोला; सन्दुक से बहुतेरी चिट्॒टियों का एक चडल निकाला पन्नों की लिखावट कण्यी है,--जान पड़ता है कि किसी वालिका के लिखे हैं। पक एक पत्र खोल कर माधव पढ़ने लगा--उसकी बड़ी वड़ी आँखों में आऑखू मर आया; अन्त में एक पत्र पर टपाटप दो वृद्‌ आँसू दपक पड़े दथेली से आँख पोछ वद्द फिर पत्र पढ़ने मा | अन्त में चह सब पत्र पढ़ गया। इसके बाद उसके हृदय से वेदना के साथ एक टंढो साँस निऋल कर हवा में मिल गई

पत्रों को वटोर कर माधच ने सन्‍्दूक में बन्द कर दिया। इसके बाद वह चुपचाप आकर विछोने पर लेट गया। बिछोने पर पढ़े पड़े वबद सोचने छगा,--“यह क्या हुआ ? बह भूली हुई वात फिर हृदय में ज्ञाग उठो ! वद घुझ्ो छुई आग फिर क्यों जल उठी ? बहुत दिन की बात,--बहुत दिन की भूली हुई याद; आज फिर एकाएऋ क्यों ने हो गई ? अब क्‍या करूं; चित्त बहुत चंचल दो रहा है ।”

सोचते सोचते युवक उठ कर खिड़की के पास चला गया | फोठरी की वायु गम द्वी थी और ठंढी; फिर भी चिन्ता के मारे युवक के माथे पर मोती जैसे पसीने के वूंद ऋलक रहे थे। युवक ने खिड़की खोल दी; इसके वाद पक कुरसी खींच कर स्विंडृकी के पास ही बैठ गया | सामने ही सड़क है, किन्तु इतनी रात को सड़क से कोई ज्ञाता आता नहीं। सड़क के दूसरे किनारे के मकान की एऋ कोठरी में चियग जल रहा है |

अधःपतत्त १६

उस कोटसरी में बैठा कोई छात्र अपना सबक याद्‌ कर रहा है। वीच बीच भे कोई घोड़ा गाड़ी सन्नादे को तोड़ती हुई निकल जातो है।

खिड़की के सामने बेठ कर युवक जाने वया सोचने लगा। बह बार बार अपनी आँख ओर चेहरे पर हाथ फेरने छगा युवक की आँखों में मांनो बीतो घटनाओं का अमिनय हीने लगा उसके हृदय पर एक्र चित्र खिच गया; उसकी आंखों के आगे एक बालिका सूर्ति खड़ी हो गई | शापद बचपन के प्रेम की कोई कहानी याव्‌ गई

प्रथम योदन में कितने ही छोगों को बहुतेरी बालिकाओं के चेहरे पर एक आपूर्व माधुरी दिखाई देती है; उन्तकी आँखों के सामने असीम खुख के स्वप्न फी झलक दिखाई देती है। वह प्रेम का अंकुर,--चह प्रेम उस समय कामनाविहीन और पवित्र होता है। उसके स्पशे से हृदय में प्रेम का पोदा पनपवा और हर॒य कोमल दो जाता है। वह कामनाधिहीन प्रम उस समय कुलध्वंसी आकार घारण नहीं करता। जैसे द्वी उस प्रेम में कामना का प्रवेश होता है, वैसे ही वह कुलध्व॑ंसी वन ज्ञाता है। तब भी बचपन के प्रेम की याद सहज द्वी मेटे नहीं मिथती | संसार की चोट से मन की उमड्डों के बिगड़ने से पहले जब हृदय निर्मल रहता है, प्रेम नवीन होता है, उस समय प्रेम की याद सहज ही हृदय से निकाले नहीं निकलती साफ आहने में जैसा साफ और स्पष्ट आकार दिखाई देता है, मैले आइने में वैसा नहीं दिखाई देता। नवीन हृदय का प्रेम

१७ तीसरा परिच्छेद

सहज ही नहीं भूलता | हृदय में दौढ़ कर देखो, बीते हुए जीवन की वहुतेरी याददाश्तों में कोई पुक्र याद चहुत साफ दिखाई देगी, हृदय के आकाश में कोई एक तारा खूब चमकता हुआ दिखाई देगा | जाने कितने दिन को बीते वात है, आज खप्म के राज्य की तरह उसकी पक चुँ चली याद चेनी है। कब कस चालिका की आँखों में मोहनी भाव द्खिई दिया था; उसके चेहरे पर कैसी स्वर्गीय पत्रित्रता दिखाई दी थी; वह आज भी भूल्ती होगी यद भी भूले होगे, कि कब किस भाव से तुम्हौीरी और उसकी आँखें चार हुईं थी ओर इसके बाद किसने आल नीची कर ली थी' |

पेसे ही जो प्रेम हृदय में एक दाग दे जातादहै, चह कभी भूलने को हे! भूलने की चात होती तो मांधच अब तक भूल गया होता भूछ सकता, तो आज्ञ उसके हृद्य में इतनो वेद्न[ होती। उस सक्षाटी रात भे उसी प्रेम के बारे मे माधव चुपचाप वेठा जाने कया सोचता रहा

मांधत्र के लछाट से पसीना वहने लगा। चह वहुत देर तऊ वेठा चिन्ता में डूब रहा कही' की घड़ी ने तोच बजाया तथ चह छिड़की बन्द कर सो रहा |

तीसरा परिच्छेद

/ दस्पति शरद ऋतु का तीखरा पहर है; आफाश में पश्चिप्त की ओर

अंधः्पतन १८

सूथ्ये ढल पड़े हैं। धुवाँ फंकती हुई डाकगाड़ी बरेलो के स्टेशन पर आकर ठहर गई लोगों के उतरने, चढ़ने, कुली घ॒लाने. के शोर से स्टेशन गू उठा। कुछ बोझ उत्तार और कुछ लादकर सीटी देती हुई डाकगाड़ो चल दो। स्टेशन फिर सन्नाटा हो गया। क्‍

जो लोग उतरे, उनमें एक हमारे परिचित राजेश्चर हैं जो सखुराल जा रहे हैं। सारी राद राजेश्वर जाने कितने सुख की कट्पना करते चले रहे हैं। उ्ेशी की प्रभा उनके हृदय को रोशन किये हुई है। एक किराये की गाड़ी पर सवार हो शजेब्वर ससुराल की ओर चले

कुछ ही देर मे गाड़ी ठीक स्थान पर पहुँच गई तब राजेश्वर दड़ी हड़डी निकले घोड़ों से जुती, विचित्र खड़खड़ाद्दट की आवाज़ करने वाली, घूछ से लतपत गाड़ी से उतरे | मकान के सामने ही छोटा सा मैदान है; जान पड़ता है कि कभी पहाँ फूलों का बाग छर्गा था या बांग लगाने की कोशिश की गई थी | इस समय एक किनारे दो पेड़ पारिजञात के रह गये हैं मकान के सामने का हिस्सा एक मंजिला ओर पीछे का द्विस्सा दो मंजिल! है। सामने ही बैठक का कमरा है; उसी कमरे में पहुँच कर राजेश्वर ने अपने सखुर को बड़े अदब से सलाम किया घबराहट के साथ आशीवांद देते हुए सखुर ने दामाद को बैठाया इसके बाद सखुर जी सबका कुशल पूछने लगे, हसी समय दामाद के आने का समाचार पा राजेड्वर के दोनों साले भी वहाँ पहुँचे छोटे साले की उम्र चार वर्ष की दोगी

१६ तीलर परिच्छेद्‌

घोती-कुण्ता पहनने से से उसे चिढ़ थी आज दामाद के शुभा- गमन से उसकी मा ने उसे जवदंस्ती धोती प्दना दी थी किन्तु जनान खाने से वाहर आते आते कमर के साथ झगड़ा कर घोती जमीन में छटकने छगी थी। वालक के कमरे म॑ आते द्वी घोती एक दम लटक फर जमीन पर लेट रही 'ोती में पेर फंसने के कारण लड़का धम से गिर पड़ा। राजेइवर ने उसे उठा छिया। बालक गस्भीर दोकर वेठ गया रोया नहीं राजेश्वर ने सोचा,--केसा शान्त लड़का है

इसके बाद जलपान के लिये जनान खाते से चुलाहट आई राजेशवर भीतर गये। उत्तप्त हृदय जरा तेजी के साथ उछलने लगा। राजेश्वर ज़लपान फरने वेठे चार अंग्रुल का घूंघट निकाल उनकी सास सामने बैठे कर “यह खा लो, उसे चखो, अभो फ्या खाया।” कहती हुई खिलाने के लिये जिद करती गई | समभदार लड़कों की तरद्द सिर झुका कर राजेद्वर ने भोजन फे साथ अच्छा व्यवद्दधार फिया तव भी सास कहने लगी ,--“कुछ भी खाया ।” राज़ेश्वर ने सोचा,--कितना आदर है।

वाददर आने के समय राजेद्वर ने देखा, कि मानो अधखुले दरवाजे के पास से फोई हट गया। चाहे हटने चाली उस मकान की फोई द(सी या पड़ोसन ही क्यो रंद्ी हो; फिन्तु राजेदवर ने सोचा, कि निदचय उरंशी दी थी। जरूर उसी की प्यारी आँों ने द्शेन फिया है उस बालिका के हृदय में कितना प्रेम है !

राजेश्वर फिर बाहरी कमरे में आकर वेठ गये इस समय

घं ' पतन ५२५

सूच्ये पूरी तरह से हूब चुके हैं--तव भी सूरर्थ की आखिरी किरणों से प्रकाश है। केवछ एक चमकते हुए तारे की विन्‍्दी छगा कर लज्जा से शिर झुकाये नई बह की तरह सम्ध्या धीरे धीरे जा रही है। समीप ही के किसी शिवालय में पृज्ञा का नोंचत बज रहा है |

राजेश्वर को ऐसा जान पड़ने छमा, मानो आज रात ही होगी धीरे घोरे कुछ अंधेरा हुआ पूज्ञा की कोठरी में आरती होने रूगी; धूप की झुगन्धि घर से फेल एडी |

र्नः र्नः नै

उस रत सोने की कोठरी में पहुँच कर राजेश्वर ने देखा, कि उचशी चारपाई पर चुपचाप सोई हुई है। धीरे धींरे मधुर स्वर में राजेश्वर ने चुछाया,--“उघेशी” किन्तु बह कुछ बोली | राजेश्वर ने धीरे धीरे चारपाई पर पड़े उसके हाथ को अपने हाथ में ले छिया, तब भी उर्बशी दिली राजेश्वर समझे कि वह खो गई है। उन्होंने धीरे से उबेशी के हाथ को छोड़ दिया, अब उर्वशी की बारी आई। उवेशी समझ गई, राजेश्वर ने उसे सोई जान छोड़ दिया है | राजेश्वर उर्वेशी की चाल को समझ नहीं सके ऐसी चालबाजियाँ का अभ्यास दोने के कारण राजेश्वर समझ नहीं सके कि स्वामी के दृशेन की आंशा से रमणी के नोंद आने की जगद्ट जागते रहना द्वी स्वाभाविक है उर्घशी कुछ हिली; राजेश्वर समझे, कि बड़ छज्ञा के मारे नहीं बोली,--फैसी कोमल लख्जा है !

राज़ेश्वर ने फिर आवाज दी,--“उलेंशी !”

२१ तीसरा परिच्छेद्‌

इस बार उ्शी स्नामी की ओर घूमी

राजेश्वर ने पूढा,--“'केखी हो १”

पहुत द्वी मधुर स्वर में उर्वेशी ने जवाब द्या,--“उतनी अच्छी नहीं ।?

“क्या, तवीयत खराब है ९”

उबेशी ने कहा,--'तुम इतने दिन आये क्यों नही ?”

सरलचित्त राजेश्वर का हृदय उछछ पड़ा; बह समझे कि शायद्‌ देख सकने के कारण ही उचशी की तदीयत खराब दो गई जेसे चन्द्र को देख कर समुद्र का हृदय उछल पड़ता है, देखे ही उवंशी की वातों से राज्ेश्वर का हृदय उछछ पड़ा। उसकी बातों से राजेश्वर मोहिद द्वो गये। शायद्‌ जगत मे सीधापन ही सब से अधिक खुख है।

इसके बाद उचंशी ने राजेश्वर से पूछा,--“तुम कैसे द्वो ?”

अब राजेभ्वर बड़ी विपद में पड़े। उनका शरीर वहुत अच्छा था, वीमारी का कोई भी रूक्षण मोजूद था ' किन्दु उनके विरद से उर्वशी अच्छी थी; जितना प्रेम वालिका में है, क्‍या इनमें उतना भी नहीं हे ? कुछ इधर-उधर कर उन्दोने कहा,-- “एुक्क तरह से अच्छी दो है ।!?

राजेभ्वर धोड़ा खिलकत आये, इसके बाद ओर थोड़ा ख्िसक आये--पास फर उन्होंने उवशोी का चुम्बन किया। राजे- ध्वर का हृदय जोर जोर से घड़कने लगा क्योंकि उनके टिये यह फाम पिलफुल छी नदीन धा। जो लोग अपविष्र हॉर्ठों पर अपवित्न सम्बन लेने फी शिक्षा पाते हैं, राजेभ्यर उन लोगो में

अधःपतत ०३ नहीं पत्नी के अधर का चुम्बन करने के समय राजेश्वर काँप उठे

इसके बाद राजेश्वर ने अपनी छाती से पत्नो का शिर छगा लिया। प्रेम के उस कानन में उ्ेशी ने क्या खयाल किया, यह नहीं मालूम | किन्तु तब भी उसका हृदय चंचल हो, उठा; यह नहीं मालूम कि प्रेम के आनन्द से, या पहले की बातों को याद करके

इसके बाद दोनों ही चुप रहे। कुछ देर बाद राजेश्वर ने पल्ली से कहा--“बहुत रात गई--सो ज्ञाओ ।”

उर्वशी उठी; राजेश्वर भी उठे। उर्वशी ने उठकर अपने कोमल हाथों को राजेश्वर फे गले में डाह चुम्बन क्रिया | पत्नी के प्रथम चुश्बन से राजेश्वर की नस नस आनन्द से काँप उठी मानों उनके सारे शरीर में बिजली दोड़ गई आनन्द की मदिरा ने उन्हे मतवाला बना दिया। राजेध्वर ने भी दोनों द्ाथों से ज़कड़ पत्नी को हृद्य से गा लिया ओर मारे चुम्बनों फे उसके चेहरों को धो दिया | उवेंशी ने सहज ही स्वामी के हृदय पर अधिकार कर लिया

जो सहज ही जीता ज्ञा सकता है, उसके जीतने के लिये हृदय में प्रबल घासना तो होती है, किन्तु उत्तेजना नहीं दोती। इस छिये उसे जीत लेते पर सफलता की असीम तृप्ति ओर आनन्द भी नहीं होता। जो सबरू ओर अज्ञीत है, उसी को जीतने के लिये हृदय में प्रचछ वासना उत्पन्न होती है ओर उसे पाने या जीतने से वड़ा आनन्द भी आता है। जो जितने डुग्ख

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श्र चोथा परिच्छेद्‌

से मिलता है, वह उतना ही प्रिय जान पड़ता है। राजेश्वर के हृदय को जीतने में उर्वशी को अ'धेक फोशिश करने की जरू- रत नही होती। उसने राजेथ्वर के हृदय को अनायास ही जीत लिया। क्‍या राजेश्वर का पेसा हृदय उसके लिये अधिक प्रिय होगा !

नहीं मालूम कि उबंशी के लिये यह हृदय अधिक प्रिय होगा या नहीं किन्तु उस छृदय से राजेश्वर को वहुत तृप्ति हुई, केवल तृप्ति ही नदी, खूब आनन्द सी आया। उर्वशी के प्रेम मे पग राजेश्वर फे हृदय ने कहा कि “यह स्वगे सुख है !!”

चोथा परिच्छेद

ग्हस्थी

सारनाथ फे समीप के गाँव में पक पुराना मकान दे इसकी पक्र वाहरी कोठरी में कई आदमी पेंठे है। इन्हीं लोगों में एक राजेश्वर भी हैं राजेश्चर फे पेर पकड़ एक खेतिहर रो रहा है। फाटरी में दो चोक्षियाँ विछी हैं; दोनों दी पर रोशनाई के दाग से भरी द्रियाँ विछी हैं। उस विस्तर पर दो सन्दुक लिये दो आदमी चेंठे है, दूसरी चोकी पर फई मुनीम वही खाते फेछाये

" लिख रहे हैं, यद जमोदारी फचदरी है

राजेश्पर यहाँ कहों ? संसार की गात ही ऐसी है आजञञ यहाँ, तो फल घदों। विवाह के चाद कुछ दिन खसख-स्वप्न में पीत गये, घर से ससुणल ओर सखुराल ले घर की देराफेयी

अंधःपतत्त' २४

मं कक महीने बीत गये | इ्क्त कद महीना मम उधंशी की याद के अलावा ओर कोई काम था। इसके बाद राजेश्वर ने देर कि जीवन स्वप्न नहीं है| स्री के लिये जगत्‌ में जितनी सुन्द चीज संग्रह करनी पडती हैं, उनके लिये रुपये की जरूरत है पहले रुपये को राजेश्वर बहुत द्वी घृणा की दृष्टि से देखते किन्तु अब घृणा की जगद आकांक्षा ओर ममता ने दखल जमा है। राजेब्बर की कुछ पेतृक जमीदारी थी। इतने दिन उन्हेंने जर्मीदारो की ओर ध्यान भी नहीं दिया; अब ध्या देवा जरूरी हो पडा। जैसे अशान्त लडके बहुत दिन तक मानी चाल चलने के उपरान्त अन्त में शान्‍्त हो पिता के लौट आते हैं, वैसे ही राजेश्वर भी अपनी सम्पत्ति देखने भाल के लिये मानों घर छोटे। जर्मीदारों पर उन्हें बडी चिढ़ क्योंकि जमींदार छोग प्रज्ञापीड़क, अत्याचारी, कुकर्मी इ्त्या इत्यादि होते हैं। उन्हें यह समझ ज्रथी कि देश में वर्तमान अर्मीदार यदि हों, तो प्रजा उजञ्ञड़ ज्ञा सकती है। जमीदार के सैकड़ों अच्छे से अच्छे गुण उनकी नजर में आते द्वी थे कही' पुकाधच जर्मीदार के अत्याचार की कहानी सुन वे समर जमी दारों पर चिढ़ गये थे। किन्तु अपनी जमी दारी में पहुँच कर उन्होंने देखा कि प्रज्मा का प्रणाम करना बुरा नहीं जान पद्धता; प्रजा का दिया सनन्‍्मान भी कोई वस्तु है यद्द तो पहली अवस्था हुई, दूसरी अवस्था में राजेब्बर ने देखा, कि प्रज्ञा को सताने से कुछ ऊपरी आमइनी भी हो जाती है। रुपये की जरूरत दे दी, इस लिये वे बीच बीच में प्रज्ञा को सताने भी

२७ चोथा परिच्छेद:

लगे अब राजेश्वर का चित्त कंदने छगा, पिता थोडी ओर जर्मादारी बढ़ा जाते तो अच्छा था |

विवाह के वाद ग्रहस्थ वनने पर राजेश्चर एक राह छोड दूसरी राह पर गये वह गुजरा जीवन ओर पुराने विचार

स्वप्न फी तरह बदल गये यह ग्रहस्थी पेली दी चोज है। आज पक किखसान राजेदवर का पेर पकड कर रो रहा है।

( घान इतनी ही है कि उसका एक वेल किसो दूसरे क्िंसान के खेत में घुस गया था। इसी अपराध पर राजेश्वर ने उस पर दस सरग्ये जुर्माना छगाया है। इसी से वह उनके पैर पकड़ कर से रहा है। उसके आँखुओं को देख कर भी राजेश्वर की आज्ञा ने। टली, तव वह अभागा छाचार हो वैद्ल बेच कर रुपये संप्रह ऋरने गया उस अमागे के हृदय की रुलाई पर किसी ने (४ भपान दिया। हल में जुतने वाले दो बैकों में एक्त बेच डालने ते इस साल उसकी खेतो द्वो सकेगी; खेत में कुछ उपजने ॥6 लें खाने फा भी ठिकाना रहेगा, जमींद।र की मालगुजारी ती याद फी घात है। छाचार अपने भूखे परिवार को साथ ले हा उसे यद्द गाँव छोड दुसरे गाँव में जाना पड़ेगा। पैतृक घर में (उसे मरने के लिये भी ज़गद मिलेगो भारत के बहुतेरे खेति हो पर पेसे हैं जो एक ही समय फे भोजन पर गुजर करते हैं, उस पे फादतू रुपये चखूछ किये जाने ले उनके जीवन का भी हा ठिकाना नहीं रहता इस बारे में खेतिहर भी विलकछ निर्दोप नदी: यदए सच है; घे जमीन में पूरी तरह से खाद नहीं देते

(रे 'ैक तरह से सिचाई का पन्दोषस्त नहीं करते, लाचार बर-

से छत ब््ग

अधभ्पतत्त २६

सात में देर होने से मारे पड॒ते हैं। किन्तु इस दोप फा मूल कारण उनकी दरिद्रता है। जमीन की उन्नति करने, सिंचाई ओर अच्छे वेछ खरीदने के लिये रुपये की जरूरत है--द्रिद्रों के पास रुपये कहाँ !

करीब ग्यारह बजे राजेश्वर कचहरी से उठे उठते ही उनके शरीर में तेल मरा जाने रूगा। इसके वाद धीरे धोरे बावू

साहब कुओँ पर नहाने चले

उस दिन घर लोटने के समय राजेश्चर को खयार आया कि में यह सब कया कर रहा-हैँ? मेरा वह आदश जीवन कहाँ चला गया ? मेरे इस जीवन का आरम्म कब से हुआ -- विवाह के बाद से ! इसका कारण कोन हे ? उर्चशी ! राजेश्वर का हृदय कॉप उठा; उनके चेहरे पर क्षण भर फे लिये उदासी छा गई !

धघोरे धीरे राजेश्वर भाग्य को मानने रूग गये। वे सोचचे लगे,--“ मेरे साग्य में दी ऐसा है चाहे में जहाँ जाऊं, भाग्य मेरे साथ है। यह ग्रहस्थी ही मेरे छिये कमेक्षेत्र है; इैश्वर ने ही मुझे यहाँ भेजा है। में कोन हैँ? क्‍या है ? में कर ही क्या सकता है? वे मेरे हृदय में बेठे हैं; वे जैसी आज्ञा देते हैं वैसा ही करता हूँ। में तो पंच से चलनेवाली कठंपुतली के समात् हूँ; अपनी इच्छा से में क्या कर सकता हूँ ?*

२७ पाँचवाँ परिच्छेद

पॉचवों परिच्छेद

अबज्ञा का बल

उस दिन भोजन के वाद दिन में आराम करने के समय से

कुछ पदले ज्ञनानखाने में अपने सोने की कोठरी भें पहुँच राजेश्वर ने देखा कि उवेशी कोई चिट्ठी लिख रही है। जूता

उतार दव पेर थे डबंशी के पीछे जा! खड़े हुए पहली दी लाइन में लिखा था,--प्रियतम |!” राजेद्वर चों पड़े उसी समय पीछे पलट उचंशी ने देखा कि राजेद्वर खड़े हैं। उसका चेदरा पीछा पढ़ गया, दोनों आँखे चमक उठो'; इसके वाद द्वी उसने चिट्ठी फो फाठ़ पुरञे पुरज्े कर फेक दिया। हवा के भोके से फागज की धज्ञियाँ सारी कोठरी में फेल परी 'डर्चशी डठ के खडी हो गई

यहन ही कठोर स्वर में राजेद्वर ने पूछा,--“यह चिह्ठुद फ़िसे लिख रदी थीं ?'

पएष्ठ यार चेहरा सीधा कर उचंशी ने उनकी ओर देखा। रजेश्धर की अखें छाल द्ो रही है। जीवन में यद्द पहली यार राजेद्वर ने अपनी पक्षी एर क्रोध किया है। जिस लन्देदह और ज्ञिस अविध्यास के कारण वे मन दी मन बहुत हा भयासक यातना सह रहे थे, एपा उसे उचरेशी समझ नहीं रदी थी ? झिन्त फिर भी घद् चुए रद गई

राजेस्वर पे फिर पूछा,--वबोलो, किसे खत लिख रही थीं!”

उदशी ने कुछ जथाव नहों दिया। उससे आगे कुछ

अधःपतन ३6

तीसरे पहर तक बढ़े कए से उवंशी को मनाकर राजेद्वर बाहर गये उस सपय ने तो उनके मनमे क्रोथ ही था ओर सन्देद्द ही

राजेब्वर के जाते ही उचशी के चेद्दरे पर मुस्कुराहरट छागई कीठरी का द्रवाजा बन्द कर उवेशी खूब हंसी | इसके वाद चह आपही वड़ वड़ा कर कहने रूगी--“पुरुष ऐले ही बेवकूफ होते हैं | स्री की बुद्धि के आगे क्‍या कसी मर्दों की वुद्धि चल सकती है !! स्त्री के कोशल से पुरुष सदा द्वी पराजित हुआ करते हैं | गंगा हमेशा महेश फे शिर पर सघार रहती हैं; कांली फे पेरों तले शिव पड़े रद्दते हैं ।”

उचंशी कुछ देर तक जाने क्या सोचती रही। इसके बाद उससे फिर पक खत लिखा चिष्ठी को लिफाफे में रख पता लिख ओर उसी समय मजदूरणी को देकर डाक में छोड़वा दिया क्या राजेशइ््रर को देख उसने जो चिट्ठी फाड़ के फेक दी थो यह वही चिट्ठी है?

ख््री अवला है। किन्तु अबछा में जितना बल है, उतना मद्‌ में नहीं | अबला फे वछ के आगे वल्वान पुरुष का चछ परा- जित होता है | पुरुष अपने भाग्य के साथ युद्ध कर जीव सकता है, किन्तु स्मणो के प्रभाव को दूर कर नहीं सकता। क्योंकि दुर्बछता ही रमणी का बल है ओर उस बरू के आगे जगत का कोई बल काम भें नहीं आता | जगत में कितने ही पुरुष रमणी के लिये बुद्धि गंवा कर उसके दास बन बैठे हैं कितने दी छोग रमणी के लिये कितनी ही भूल कर॑ बैठते हैं; पाप करते हैं, आत्म

३१ . छठां परिच्छेद

हत्या करते हैं | इस जगत में रमणी के मोह के पीछे कितनी ही प्रतिभा नष्ट होती है, वहुतेरा धन खराब जाता है, यश नए हो जाता ऐ-- यदि बह प्रतिभा बचतो, तो ज़गत का कितना महा दोता, डस घन से कितने गरीदो का दुःख दूर दो ता, उस यश से कितने छोगों का जीघन उज्ज़ल होता | रमणी के लिये कितने ही लोग कुसमय मर जाते हैं, क्रितने ही खुख के भवन में दुःख की आग लगा वैठते हैं, संसार का कितना अनिष्ट छर बैठते हैं

कछठों परिच्छेद बहुत दिन बाद फागन मद्दीने फी शाम है घोरे धीरे दःक्खनी हवा चल रही है | दालान में एक कुर्सी पर वेठे राजेश्वर अपनी प्रजा से माल्ग जारी के बारे मे बात चीत कर रदे है। मकान के सामने दी एक टेस का पेड फूलों से लाल द्वो रद है दक्पिनी दवा फे धोकि से फ़छों की मीठी मीठी खुशबू फेल रही है। जेप्चर बातें कर रहे दे, ऐसे समय एक गाड़ी सामने आदर खड़ी हुई एक युवक ने गाड़ी से उतर फर राज़ेश्वर को प्रणाम किया | राजेश्वर ने कुशल पूछकर उसे आदर से वठाया | यह उनका भठीज्ञा माधव दे दुछ देश घाद वद्दाँ से उठ कर माधव जनान खाने में चला गधा। उस समय उसझ्ीी दादी राजप्पर की माँ योकी पर पेटो

अध;पतत्त ३२

मसाला जप रही थीं। माधव ने बूढी को प्रणाम किया ओर कुशल मड्जल पूछने के वाद फिर बाहर चला गया |

माधव के चले जाने पर वृढ़ो ने माछा रख कर वह को आचधाज दी,--“धहू ।”

पास ही रसोईघर है, उर्चेशी वहीं थी | किन्तु उसे साख की आधचाज सुनाई तन दी। मावध की आदाज सनने के वाद से उ्ेशी का चित्त जाने कहाँ उड़ गया था।

सास ने फिर आवाज दी,--“बह ।”!

इस वार आवाज उदंशी के कान तक पहुँची उसने जवाब भी दिया।

वृढ़ी ने कद्ा,-- बड़े घर की लड़कियाँ सात वार बुलाये बिना आवाज ही नहीं देतीं रसोई जरा ज्यादा दनाना

माधव भी खायगा 7 इसके-बाद्‌ वृढ़ी फिर माला फेरने लगी रात साढ़े नो वजे

राजेश्वर ओर माधव भोजन के लिये जनाना खाने में आये | वृढ़ी बैठ कर माधव को खाने के लिये जिद करने ओर खिलाने लगीं। किन्तु आज का भोजन खाने के लायक ही नहीं है। उर्वशी ने किसी में अधिक नमक डाल दिया है ओर किसी में स्मक डालना ही भूल गई है। खाने में हिचकियचाते देख लुढ़िया बोल उठी,--““आज कछ के लड़के केवल मांस पसन्द करते हैं तुम सब की बातें ही निराली है ।”

माधव ने हँस दिया राजेश्वर भी मुस्कुरा कर चुप रहे |

माधव की आवाज झुनने के बाद से उचेशी का चित्त जांने

+ हैँ पर

३३ छठां परिच्छेद्‌

कैसा हो गयां था उस रात सोने की कोठरी में जा राजेश्चर सो रहे, किन्तु उ्ेशी को नींद नहीं आई बद्द सोचने लगी--यह मेने कया किया | सोचा था कि यह प्रम हृदय में ही छिपा रह जायगा; यदि भूछ जाऊंगी तो ओर किसी पर प्रकट भी ने दूंगी। किन्तु हाय मेंने उसे फिर फयों देखा। देखते ही पहिछ की याद हृदय में जाग उठी। किन्तु जब पद्दले पहल देणा तब उसे पाने का कोई उपाय था। में अपने अशांन्त हृदयको शानिति दे सकी; अपने को भूलकर मैने फिर डससे वात चोत आरस्म करदी | ऑर--ये जो पुरुष विष्यास करके मेरे पास सोथे हुये हैं, इनके प्र फा कया में यही ददला दे रही है ?

उनेशी ने सोते हुये अपने स्वामी के मुद्द की ओर देखा। उसका हृदय घेचेस हो उठा डसी समय नींद में राजेश्वर ने फरघरट बदली | उर्वशीके मन्त में सोये हुए स्वामी की ओर से घृणा उत्पन्न हुई

ज्ञिस पर सच्चा प्रेम नहीं होता उसे प्रेम की दएि से देखना भी बहुत कष्कर होता है उस फए की घजद थोरे घारे मन में उराकी ओर से घृणा पैदा होने लगती हुव भरपूर घ्ूणा दो