एाप6्त 9 एिमणनध०ता४ 68 90606 8४ (16 करप इषा 27668 29 70107080 1.०९, ए०णफु,

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एणणाश16त ए6एवभोकणकः चकुभुद्लम) पदर्लः, त०ण, एकु प०्5(१ ९6 एाप्प-एमणछढरषः कभपता, पवष्वणपं एकप,

पार ०, 9, 20928. ए,

भ्रस्तावना

नः

हस भर॑यके रचयिता धी नेमिचद सिद्धातचक्रवतीं है आपके पवित्र जन्मसै यह भारत भूमि किस समयं अलृत हृदे यह ठीक नही कहा जासकता, तथापि इतिहासन्विषी विक्रसकी ग्यारदमी शताब्दीके भारम्भम या उसके इछ पूयं ही बहुधा आपने अपने भनमेजकं उपदेरसे भन्योको कृतार्थं किया था यद षिद्ध करते हं शस सिद्धिम जो रमाण दिथे जाते उनमेसे कुछ का हम यद्ापर सक्षेषमे उक्ल करते है वृदषटन्यसम्रहकी भूमिकामे पं. जवाहरलार्जी शाल्ञीने आपका शक संवत्‌ ६०० ( बि. स, ७३५ ) निधिते किया ईह क्योकि श्रीनेमिचेद्र खामी तथा श्रीचायुण्डराय दोनोंही समकाटीन थे भौर भ्री चा" शण्डरायके विषयमे 'वाहुबज्िचिरितशे ज्खिा है कं" 'कल्क्य्दे पटरूदाताख्ये विनुतविभवसंवत्सरे मासि चैत्र पंचम्यां शयुषपक्षे दिनमणिदिनसे ऊुम्भरपर सुयोगे सौभाग्ये मस्तनान्नि भकटितभगणे सुप्रगस्तां चकार श्रीम्सुण्डराजो वेत्णुङनगरे गोमदेशमतिष्ठाम्‌ ५५

अथौत्‌ शक ख, ६०० मे चैत्र ङ्का रविवारके दिन भरीचायुण्डरायने श्रीगोमटखामीकीं अतिष्ठ की परतु यदि दूसरे भ्रमाणोसे इस कथन की तुलना की जाय तो इसमे वाधा आकर उपस्थित ती है क्योकि वाहुबलिचरितमे ही यह थात छ्खी हुई है कि देश्रीयगणके प्रधानभूतं शरी अजितसैन सुनिको नमस्कार करके श्रीचासुण्डराय ने शरीवाहुबटीकी भ्रतिमाके विषयं इतान्त कहा, यथा" पश्चात्सोजितसेनपण्डितमुनिं देशीगणाभेसरम्‌ खस्याधिप्यदुखाबव्धिवधेनशदिश्रीनन्दिसंघाधिपम्‌ श्रीमद्धासुरसिहनंदियुनिपाङ्गधास्भोजरोकम्बकम्‌ चानम्य प्रवद्सुपौदनपुरीशीदो्ैलेरैत्तकम्‌ ।" भरीसतमिचद सिद्धांतचक्रवर्तीनि भी गोमहषारमे श्री अजितसिनका भरण किया है जमीर उनको शरी. चासुण्डरायका गुड बताया है यथाऽ “जिम्हिशुणा विस्संता गणदरदेवादि इदििपत्ताणं सो अजियसेणणाहो जस्स शुरु जयड सो राओ ॥४

यापर कटकी श्चब्दसे नो शकका अण प, जवादरलारजी शासीने किया है वेह किस तरं किया यष हमारी समल्यमें नदी आया

रयचन्द्रनैनसालमाल्थाप्‌

जौर भी-“+अजज्सेणगुणगणसमूहर्तधारि अजियसेणशुर 1 भुवणशुर अस्स गुर सो राओ गोम्मटो जयउ ॥*

अथौ बह श्री चण्डसाय जयर्वा रदौ जिमके गुर अजितसेन नायम दधातत गणधर टेवा- दिको शुण पाये जाते आना शरी भार्थसेनके अनेक णके नमूटफो धारण करनेवारे तथा तीन ोकके युर अजितसेन यु जिसके है वह गोम्मर राजा जयर्वता ररौ वतक

यदे यद्‌ थात माम होती & जिन अजितसेन खामीका उल चाहुवङी = आर गोम सार किया गया वे एक ही है \ परत ये अजितसेन कब हए चातका कुष पता श्रवणवेलमोरार एक रिाङेखसे मिरुता है

उसमे अजितसेनके विपयमें छिखां किः-- ग॒णाः ऊंदस्पन्दोडमरसंमयं वागय्तवाः पुवभ्रायः प्रेयशश्रसरसरसा कीर्तिरिव सा नलेन्दुज्योत्लाद्येयपचयचकोरम्रणयिनी) कासां घानां पद्मजितस्तेने ब्रतिपतिः

यह्‌ विरुरेख करीष ग्यारहमी शदीक्रा दा हआ दै \ इसे माम होता कि श्री अजिनलेन खामी ग्यारहमी शदीके पूव हए दै, जौर उसी समय धी चाुण्डराय भी हए पतु पं नाथूरामजी मी द्वारा छिखित “चद्रभमनचरितकी भूमिका श्री चासुण्टरायके परिचयमें छिखिा है कि कनडी मापाके असिद्ध कवि रतनने शकं सम्वत्‌ ९१५ मे पपुराणतिरुक' नामक्र ग्र॑थदी रचना की गौर उसने आपको रक्कस गंगराजका आधित्त बतलाया है चायुण्डरायकी भौ अपनेपर विशेष कृपा रहनेका वह्‌ जिकर फरता है इसे माम लोता दै कि शक स. ९१५ या विक्रम स, १०५० के उगभय ही श्री चासुण्डरायं जौर श्रौ अजितसेन खामी हुए है

गोमष्टसारकी श्री चासुण्डरायज्ृत एक कनोटक वृत्ति श्रीमेभिचंद्र सि. चकवतौके मधं ही वंन शुकी थी ! उसीके अवुसार श्री केशववर्णीहत संसृत रीका सी है उसकी आदिमे छल हुमा है -- श्रीमद्भतिदतपमावस्याद्वादश्षाखनगुदाभ्येतरनिवासिभ्रवादिसिषुरसि्ायमान-सि- हनंदिनन्दितगंगवेदारुछाम-राजस्ेल्लादयनेकशुणनामघेयभागघेय-ध्रीमद्वाजमहदेवमरी वछ्ममदामाल्यपद्वियाजमान-रणस्ड्मल्ासहायपराकम-यणरल्षशूपण-सम्यक्त्वरल- निकयादिविविधणणनामसमासादिवकीर्तिकांत-ध्रीमच्चयुडरायमश्ावतीरणैकचत्वारि- दात्पव्नामखत्वमररूपणद्वारेणारोषविनेयजननिङ्रंवसवोधनाथ भीमननेमिचदेतैद्धान्तिक- समस्तसेद्धान्तिकजनयस्यातविशाद्यदया ; विद्यारुमतिरसौ मगवान्‌ .. ,„. | देवताविशेषं चर्यः नंश्नतः शाखपरिसमाप्िनिनित्तं ,,. ... द्वत शाख्परिसखमाहिनिमित्तं राचमह ओर रक्कस मगराज ये दोन ही भाद थे उपयक्तं गोमष्टसारकी पक्तियौसे 1 जाती, है चत्त { सिद टै नेमि चंदर सिदधातचक्रवरतीका भी होना चाहिये तड कि गहय समय चु्डराय तथा भी नेमि-

+^

गोम्मटसार

नेमिचंदर सिद्धांतचकवत्तीनि जगह वीरनंदि थआचायैका सरण रिया है यथा"

“जस्स पायपसाएणणंतसंसारजलदहिसुत्तिण्णो वीरिदणदिवच्छो णमामि तं अभयणंदिगुरं | “"णमिङण अभयणंदि सुदसागरपारगिदणेदिगुरं वरवीरणंदिणाहं पयडीणं पचयं वोच्छं ।॥? “णमह गुणरयणभूसणसिद्धतामियमहन्धिभवभावं वरवीरणदिचंदं भिम्मङ्युणमिदणंदिगुरं ॥” न्दी बीरनेदिका स्मरण वादिराज सूरीने भी किया हे यथा - चद्रभभामिसंवद्धा रसपुष्टा मनःप्रियम्‌ छृमुद्रतीवं नो धत्ते भारती वीरनंदिनः (पाशवनाथकाव्य शो, ३०) वादिराज सूरीने पार्धनाथ काग्यकी पूर्तिं शक ख, ९४५७ मे की है, यह उसीकी अन्तिम अरशसिके इस पद्यसे मालम होता दे (शशाकाब्द नगवार्धिरन्धरगणने संवत्सरे कोधने, मासे कार्तिकनाश्चि बुद्धिमदिते शद्धे ृतीयादिने सिह पाति जयादिके वदयुमतीं जैनी कथेयं मया, निष्पत्ति गमिता सती भवतु वः करस्याणनिष्पत्तये अ्थीत्‌ शशक सम्बत्‌. ९४७ कोधन सम्वत्सर ) की कार्तिक श्क्षा तृतीयाको पार्ैनाथ काव्य पूरण किया 1” इस कथनसे यदयपि यह माम होता है कि वीरनंदि आचाय शक सवत्‌ ९४७ के पे ही होवे दै; तथापि जव कि वीरनदी भाचार्य खयं अभयनंदीको युर स्वीकार करते है ओर नेमिचद्र सिद्धात चक्रवती भी उनको शुरुपरसे सरण करते दै तब यह अवद्य कटा जा सकता है कि वीरनंदि ओर नेमि- चेद दोनो ही समफालीन है गोमदसारी गाथाभाका उङेख अमेयकमर्मारतेण्डमे मी मिरता है-यथा.- ८“निग्गहगदिमावण्णा केवछिणो समुहृदो अजोगी सिद्धा अगाहारा सेसा आदारिणो जीवा “( ६६५ ) भरीभरमार्चद आचार्यने अमेयकमलमार्तण्डकी रचना भोजराजके समयमे की दै, क्योकि उसके अतम यह उड दै कि.

५श्री मोजदेषराज्ये भीमद्धारानिवासिना परापरपरमेष्ि्रणामाजिंताभरैपुण्यनिराछृ- तनिखिरमङकरंकेन श्रीमत्पममाचंद्रपण्डितेन निखिर्भमाणपमेयस्वरूपोदयोतपरीस्तासुल- पदमिदं विद्र॒तमिति ।” धारानगरीके अधिपति सोजराजका समय बिकरमकी ११ वी सदी निध्ित हे इससे यह माष्धम होता है कि नेमिचद्रलामी या तो अभाचद्राचाथैके समकालीन दै या पहले हके है यद्यपि इस अमाणसे यह भी माकम होसकता है कि श्री नेमि सिद्धातचक्रवतां अभाचदा-

& रायवन्द्रमेनराखलमाराय।

चायैसे कई शदी पूव हुए है; परेतु जवकि कवि रत्नने अपनेपर श्रीमान्‌ चायुण्डरायकी छपा रटनेका, जिक्र किया है तथा पुराणतिरूककी स्यना शक स, ५१५ मे उसने फी ग्रह मिश्ित तव दस दौकाको स्थान नहीं रहता अत एव इतिहासम्ेमी यह निध्ित करते श्रीमान्‌. नमिचदर सिद्धातचक्रवर्तीका समय भी लगभग क्क स, ९१५ के ही है परतु यह निश्चय एक श्रकारसे पुराणतिलकके आधारते ही अत एव अभी इतना संदेह दी है कर यदि पुराणतिरकके कथनको प्रमाण माना जाय त्तो बाहुवरीचरितकर केथनको प्रमाण क्यो माना जाय ° यदि माना जाय तो फरस तरह घटित करिया जाय इसतरद नैमिनचद्र सि, चक्षवतीका समय एक तरदसे अभीतक हमको संदिग्ध ही इसीटिये समयनिर्णयको इम यहीं विराम देते है दूसरी वात यह भी समयकी प्राचीनता था अवा चीनतासे प्रमाणता या अभ्रमाणताका निर्णय नहीं चेता ्रामाण्य या अप्रामाण्यके निणैयका हेतु भंथकर्ताका अथ होना द!

ग्रथके रचयिता साधारण विद्वान्‌ थे उनके रचित्त गोमटरसार त्रिजोकसार ठन्धिसार आदि उपठन्ध भ्रंथ उनकी असाधारण विद्वत्ता ओर ^सिद्धातचक्वर्ता, इस पदवीको सार्थक सिद्ध कर रहे टह यद्यपि उपरुन्ध अथोभ गणितकी प्रचुरता देखकर रोग यह विश्वास कर सक्ते हे क्रि. श्री नेमिर्चर सि. चक्रवर्ती गणित्तके ही अप्रतिम पण्डितथे परु इसमे कोर सदेह नहीं वे सर्वेविपयमे पृण निप्णात ये

उप्र जो गोमषटस्ार सस्छृत टीकाकी उत्थानिकाका उैख दिया है उसमे यह थात ट्यिाई गद 2 कि इस ग्रंथकी रचनां श्रीमव्ासुण्डरायके भ्श्नके अनुसार हई है शस विपये एसा सुननेमे आता किं एके वार ध्री नेमि्चद्र सिद्धातचक्रवर्तीं धवखादि मदासिद्धात म्थोमिसे किसी सिद्धांत--प्रैधका स्वाध्याय कर रहे थे उसी समय गुरुका द्रोन करनेकेचयि श्री चायुण्डराय भी आये रिष्यको भाता हुआ देया. कर श्रीनेमिचैद्र सि. चक्रवर्तनि खाध्याय करना व॑द कर दिया जव चासुण्डराय गुरुको नमस्कार करके वेढगये तव उनने पृछा कि शुरो ! आपने एसा क्यो करिया तव गुरने कटा कि श्रावकको इन सिद्वातं भके सुननेका अधिकार नहीं है इसपर चासुण्डरायने कहा कि हमको इन अ॑र्थोका अववोध क्रिस तरह होसकता है * कृपया कोर एेसा उपाय निकालि कि जिससे हम भी इनका महत्वाज॒भवं कर सके है कि इसीपर श्रीनेमिचंद्र सि, चकवर्तीनि सिद्धात भ्र॑थोका सार ञेकर इस गोमदसार श्रथकी रचनां कीदहे।

इस भथका दूसरा नाम पंचसंम्रह भी है कंयोकि इसमे महाकर्मभाश्तके सिद्धौतसव॑धौ नीवसथान छग्रवध वंधखामी बेदनाखड वगेणाखंड इन पाच तिपर्योका वर्णन है मूर्यंथ भाकृतमे छलि गया यद्यपि मूढ ङेखकं श्रीयुत नेमिचंद्र सि, चक्रवती ही है; तथापि कहीं पर कोई गाथा माधवर्वद ्ैविद्य- देवने भी छली हे यह टीकामें दी इई गाथायोकी उत्थानिका के देखनेसे माम होती है माधव ्ैविद्यदेव श्रौ नेमिचदर सि चक्रवर्तकि भधान रिष्योैसे एक ये माम होता है कि तीन विद्याथके अधिप्रति दोनेके कारण ही आपको त्रैिदयदेवका पदं सिखा होा इससे पाठकोको यष्ट भी भदाज करणेना चाहिये कि नेमिर्वद्र सि चक्रवतीकी विद्रत्ता कितनी असाधारण थी

इस भर॑थराजके उपर अभीतकं चार टीका ठछिखी गई है जिसमे सबसे पे एक कनौटक इत्ति बनीं दै उसके रचयिता भंथक्तौके अन्यतम रिष्य श्रीचामुण्डराय है इसी टीकाके आधारपर एक संसृत टीका वनी दै जिसके निर्माता केशववर्णा है ओर टीका भौ इसी नामसे असिद्धः दै दूसरी संस्कृत टीका श्नीमदभयरचद् सिद्धातचशचवर्तीकी बनाई हई है जो कि भ्ेदमबोधिनीः नाम॑से अख्यात ! उप. युक्त दोनों दीकाओकि आधारसे श्रीमद्धि्र टोडरमल्रमीने ^सम्यग्ञानचदरिका नामकी हिंदी टीका बनाई है उक्त कनौटक इततके सिवाय तीनों टीका्कि आधारपर यह सथिप्त वाखवोभिनी दीका लिखी है! “मेद्भबोधिनी' हमको पूरणं नही मिरुसकी इसथ्यि जातक मिरु सकी वहातक तीनों दीकाभकि आधारसे जर आगे “केशववर्णी" तथा ^सम्यग्ानचंद्रिकाके आधारते ही हमने इसको ठिखा है

गोम्मटसार

इस भंथके दो भाग दै -एक जीवकांड दूसरा कर्मकांड जीवकाण्डमे जीवफी अनेक अषद् अवसथा. करा या भार्वोका वर्णेन हे कर्मकाण्डे कर्मोकी नेक अवस्था्थोका वर्णन है ¦ कर्मकाण्डकी सक्षिप्त हिंदी टीका श्रीयुत पं. मनोदरलाख्जी ्ाज्ञी द्वारा सम्पादित इसी भ्र॑थमाराके द्वारा पहरे भकारित हो- की है जीवकाडकी सक्िप्त ददी टीका अभीतक नहीं हुई थी अत एव आज विद्वानोके समश्च उसीके उपस्थितः करनेका मेने साहस किया है 1

जिस समय भीयुत आत सरणीय न्यायवाचस्पति खाद्वादवारिधि वादिगजक्रेसरी गु्वर्यं पं गोपाल- दासजीके चरणोभें मे निदाध्ययन करता था उसी समय शुरुकी आज्ञानुसार इसके लिखनेका मेने आरम्भ क्रिया था} यद्यपि इसके किखनेमे भ्रमाद्‌ या अन्नानवश्च सुञ्चसे कितनी ही अश्युद्धिया रहगर होगी, तथापि सजन पा्ठकोके गुणप्राही खभावपर दष्ट ठेनेसे इस विषयमे सुनने अपने उपासका बिल्छुर भय नही होता प्रथके पूरणं करनेमे भे सर्वथा असमर्थ था तथापि किसीमी तरह जो मे इसको पूणं कर सका ठसका कारण केवल गुरंप्रसादं है अत एवं इस छृतन्नताके निददीनार्थं गुरुके चरणोका चिरतन तवन करना ही श्रेय

आचीन टीकां समुद्रसमान गम्भीर है-सदसा उनका कोई अवगाहन नहीं कर सकता जो अवगा- इन नही कर सकते उनकेलिये कुल्याके समान इस शुद्र टीकाका निमौण किया है आश्चा दे कि इसके अभ्याससे प्राचीन सिद्धात तितीयु्ओंको अवश्य कछ सरता होगी पाठकोसे यह निवेदन है कि यदि इस कृतिम्‌ कुछ सार भाग माम हो तो उसे मेरे रुका समन्न हदयगत करं जौर यदि नि.सा- रता या विपरीततां माम पडे तो उसे मेरी ति समश्च, जौर मेरी अज्ञानतापर क्षमाप्रदान कर

यह टीका धीमान्‌ रायचद्रजीद्रारा स्थापित “परमश्चुतरभावकमंडर"की तरफते प्रकारित की गई 21 अत एव उक्त मडल तथा उमके ओनरेरी व्यवस्थापक शा. रेवादकर जगजीवनदासजीका साध वादन करता

इस तुच्छ छतिको पठनेके पूव “गच्छत स्लरनं क्रापि भवत्येव प्रमादत.1 हसति दुजंनासन्न समाद्‌ धति सजना इस 'टोकके अर्थको दषटिपथ करनेके ठय विद्रानोसे आर्थना करनेवाक-- जैन

७-७-१९१६ ई, ! ) निबा

रा पाजरपो-व॑वद नं,

विषयसुची

# ~----<=---6* 9.

विपय

मगर्का भ्रयोजन मगर ओर भरतिन्ञा बीस अधिकारोके नाम गुणस्थान ओर मार्गणाकी उत्पत्तिका निमित्त ओर उनके पयौय वाचक शब्द गुणस्थान सज्ञाको मोहयोगभवा क्यो कहा ° इसका उत्तर . . 9 दो अ्रस्पणा ओर वीस प्ररूपणाकी मिन्न अपेक्षा ^, = मागेणाप्ररूपणार्े दूसरी भररूपणाओका अतभौव संन्ञा्ओका अंतभौवे ,. उपयोगका अंतभौवे गुणस्थानका रक्षण 3 चौदह गुणस्थानोके नाम॒. व्वार गुणस्थानेमि हदोनेवारे पाच भाव % गुणस्थानोके पाचे भावोकी अपेधार.. पाचमे आदि गुणस्थानोमे होनेवाठे भाव जौर उनकी अपेक्षा मिभ्यात्वका उक्षण भौर मेद मिथ्यात्वके पाच मेदोका दयत श्रकारातरसे भिथ्यालका लक्षण °“ मिथ्यादृटिके बाह्य चिन्द ,,. सासादन गुणस्थानकरा रक्षण सासादनका दशत तीसरे मिध गुणस्थानका कक्षण तीसरे गुणस्थानका दन्त तीसरे गुणस्थानकी ऊढ विदोषता ,* वेदक सम्यक्त्वका रक्षण ,., ६4 ओपशमिक ओर क्षायिक सम्यक्त्वंका लक्षण चतुर्थं शुणस्थानकी ऊुछ विदषता पाचमे गुणस्थानका ठशक्षणे,०*

विरतातरिरतकी उपपत्ति ,,, गोरर,

रपं विषय,

१। चे गुणस्थानका छक्षण ,.. १। ५५ | परमादके १५ भेद

२। |प्रमादके विषये रकार स्या 1 1} 1 २।१८ [म्रस्तारका पहला कम „१०

भरस्तारका दूसरा क्रम , ३। | प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षपरिवर्तन दूसरे ्रसतारकी अपेक्षा भक्षसंचार , . ३। नष्टकी विधि ,,, * ००० उदका खरूप ००९ + ३।१४ |अथम भ्रस्तारकी अपेक्षा नष्ट उदका ४। १| गृढयंत्र ४।१३ | दूसरे भस्तारकी अपेक्षा गूढरयत्र॒ . ४।२५ | सतमेशुणस्थानका खरप * ५। |सातमे यणस्थानके दो भेदका खरम... ६। |अध करणका उक्षण ६।१६ | भपूर्वकरण गुणस्थान = « अपूर्वकरण प्ररिणा्मोका कायै ,,,

नवेमे गुणस्थानका खूप ७। दशमे गुणस्थानका खरूप ,* 4 पनिं ग्यारदमे गुणस्थानका खरूप

वारहमा गुणस्थान हय =

तेरदमा शुणस्थान 0 चीदहमा युणस्थान ५, =, , गुणस्थानोमे होनेवाटी गुणश्नेणिनि्जरा०.. सिरद्धोका स्वरूप,.. $

१०।११ | तिद्धोको दियेहुए विदोषणोका फर ,..

१०३० ११। जीवसमास-अधिकार

१२। |जीवसमायका रक्षण ,,.

जीवसमासके चौदह भेद .. ,** १२।९१ | जीवसमासके ५७ मेद्‌ , १३। | जीवसमासके तिषयमे स्थानादि अधि- १४। १| कार १४। | स्थानाधिकार

ध" प, १४।२१्‌ १५] १५१५ १५।२५्‌ १६।११ १६।२५ १४७१० १५।२४ १८। १८।२३

१९।१० १९२२ २०३ २०।११ २१ २२।१५ २५ २५२६३ २५७ २५७।२८ २८। ८।१४ २९ थै २५।१६ ३०।१९ ३०।९३

३१।१५४ ३२।११ ३९।१९

३२।२९ २३३।१०

९१० रायचन्द्रजैनमासलमाखायाप्‌

विषय योनिअधिकार . . 9 जन्मका योनिके साधं सम्बन्ध

गुणयोनिकी संख्या „*

गतिकी अपेधा जन्म ..

गतिकी अपेक्षा वैदोका नियम

अवगाहनाअधिकार

अवगाहनाओके स्वामी ओर उनकी न्यू- नाधिकताका गुणाकार

तु स्थानपतित इद्धि ओर अवगाहन मध्यके भेदं 5

वायुकायकी अवगाहना ,.* 88 तैजस्कायादिकी अवगाहनायेकि गुणका. रकी उत्पत्तिका क्रम... अवगाहनाके विषयमे मत्यरचनां ,,* कुरुअधिकार +

पयौप्ति-अधिकारः दे्ातद्वारा पयौप्त अपयौप्तका स्वरूप .. पयोप्तिके छह भेद जौर उनके स्वामी... पापिका कार वन अपयौप्तकका स्वरूप ,,„ „= अपयाक्तकके उत्छृष्ट भव ... केवल्योकी अपयौप्तताकी शंकाका परि-

हार ४०६ गुणस्थानोकी अपेक्षा पयौप्त अपयौप् अवस्या ~ =. सासादन ओर सम्यक्स्वके अभावका नियमं ,, द, ्राण-अधिकार भ्राणका लक्षण 4 ्आाणके भेद्‌ ,,, आर्णोकी उत्पत्तिकी सामम्री मराणकि स्वामी एकेन्द्रियादि जीवेकरि आणोकां नियम ,,,

संक्षा-अधिकार सज्ञाको स्वरूप जर मेद्‌ „„, कमसे आहारादि संक्ञाका स्वरूप ,,,

पर प। विषय, २३५।२७ | सेन्ञाओकं स्वामी ६।१४५ मार्मणा-मराधिकार

३५ [संगङाचरण अर मार्गणायिकारके वणै- ३५२४ नकी भ्रतिन्ञा 94 ३८।१३ |मार्गणाका निरक्तिपूर्यक रक्षण -.“ ३९ [चौदह मागैणाञकरे नाम ३५।१५ |अंतरमार्गणाभके भेद्‌ ओर उनके काठ- का नियम .. 9 विप ,,, ध, गतिमागैणा अ-& गति शब्दकी निरेति ओर उसमे भेद नारकफादि गतियोका भित्र सवरप सिद्धगतिका स्वर्यं * .. 4

४८१

४३।१४ ४1१३

४६।२३ वि गतिमार्गेणामे छ, ४७1१६ इन्द्ियमारणा अ-

इन्द्रियका निरुक्तिसिद्ध अर्थं 6

इन्दरियके द्रव्य भावरूप दो भेद ओर द्रव्य भावरूप दो भेद

उनका स्वरूप ४५६ ४९) [इन्द्ियकी अपेक्षा जीवोके मेद ५१ [इनस कम = इन्द्ियोका निषयक्षे , . इन्दियाक्रा आकार इन्दरियगत आत्मप्रदेशांका अवगहन- ५२१० प्रमाण ,..

अतीन्धियज्ञानियोका स्वरूप एकेन्द्रियादि जीवोकी संख्या कायमागणा अ-८ कायका रक्षण जर भद्‌. १६ धृथ्वी आदि स्थावर्रोकी उत्पत्तिका कारण हारीरके भेद ओर छण „= , शरीरका भमाण,.. वनखतिका स्वरूप ओर भेद ,* त्रसोका स्वर्प भेद क्षेत्र आदि ,..

५२१२८

५३।१०

५६। » [स्थावर भौर त्रस जीबोका आकार ०,

धुर प. ५७।

४५७२१ ५८ ५५८।१०

५८१४७ ५९ $

५९।२१ ६० ६२1१८

६६।२द

६७1 ५, &५७।१द्द्‌ ५८\ ६८१११ ७०१

७०। ७१} ७११५७

७४] ७४1१६ ७८।२५ ७५ \७९।२३६

८०२६ ८१

विषय दृष्टतद्रारा कायका कायै ,,, > कायरहित-सिरद्धोका स्वरूप धृथ्वीकायिकादि जीवोकी संख्या „„, योगमार्मणा अ-९ योगकरा सामान्य लक्षण ,,., योगका विशेष उक्षण ..

दल भ्रकारका सदय अनुभय वचनके भेदं नवार अकारके भनोयोग ओर वचनयो-

गके कारणं .. नः

मयोगकेवठीके मनोयोगकी संभवता , . काययोगकै प्रत्येक भेदका स्वरूप ,„,

योगम्ररृत्तिका भकार . अयोगी जिन॒ „^, 2 = धारीरमे क्म नोकर्मका विभाग ओदारिकादिके समयग्रवद्धकी संख्या, , ओदारिकादिके समयम्रवद्ध ओर वर्गणा-

का अवगाहन भरमाण . वित्तसोपचयका स्वरूप कर्म नोकर्मका उत्कृष्ट संचय आर स्थान उत्छेष्ट संचयकी सामयरीनिदेष

गरीरोकी उत्कृष्ट स्थिति ,,. उक्छ्ट र्थितिका गुणानि आयाम . भरीराके समयभ्रवद्धका वंध उद्य सत्व अवस्थामे द्रन्यभमाण ,* ओदारिक ओर वैकियिक शरीरकी विरो- पता ओदारिकं शरीरके उक्छृष्ट सचयका स्वामी वेक्रियिके दारीरके उक्ष सचयका स्थान तैजस का्मेणके उत्छष्ट संचयका स्थान योगमा्ेणामे जीवोकी सख्या . - वेदमार्मणा अ-१० तीन वेदोके दो भदोकरा कारण ओर उनकी समविषमता भाववेद्‌ ओर उसके तीन भेदोका स्वरूप वेद्रदित जीवं ,.. 8 6 वैदकी अपेक्षा जीवसंल्या ,,. 6

गोम्मटसार।

ण, षृ, विषय. ८१।१५ कषायमा्भेणा भ~११ ८१।२६ | कषायके निरक्तिषिद्ध लक्षण - ८२।१० [शक्तिकी अपेभा कोधादिके मेष ,,, गतियकि भ्थम समयमे कोधादिका

नियम .. कषायरदित जीव ६० ८५२२ |कषायोके स्थान. = „= , , ८८।१९ |कपायकी अपेता जीवसंख्या ९०।२४

ज्ञानमार्गणा अ-१२

ज्ञानका निरक्तिसिद्ध सामान्य रक्षण .. पाच क्ना्नोक्ा भयोपश्चमिके भायिकल-

पसे विभाग मिथ्याज्ञानका कारण ओर स्वामी .

८७]

९१।१४७ ९१।२५ ९२।१७

€|

मिश्न्ञानका कारण ओर मन पयैयज्ञान- ३१६ कास्वामी . ९६।२६ [चतद्ारा तीन मिध्या्ञानका स्वर्म . ` | मतिज्ञानका स्वरूप उत्पत्ति आदि . ६५ श्ुतक्ञानका सामान्य लभण 4 श्ुतन्नानके भेद ,.* 4 क्षा ॥॥ 99

९८।१२ पयां शा

पयौयसमास . .

९८।२५|दछह्‌ इद्धियोकी छह संका ,. .

छह शृद्धि्योकी ङुछ विरेपता ५१४ |अथौकनर श्रुतन्नान 9 श्रुतनिवद्ध बिषयका अमाण ५० ९९।द्‌९

अक्रसमास ओर पदज्ञान 4 पद्के अक्षरोका भमाण पदसमास ओर सधात श्ुतन्नान संघातसमास आदिं १३ भकारके श्ुतज्ञा- नका विस्तृत स्वर्प . अगवाह्य श्वुतके भेद „== श्ुतन्नानका माहात्म्य °,“ अवधिज्ञानका स्वरूप ओर दो मेद॒ - दो भकारकी अवधिका स्वामी ओर १०६ १| सवस्प ° १०६१३ | युणभ्रखयय ओौर सामान्य अवधिके भेद १०७।१५ |अवधिका द्रन्यादिचतुष्टयकी अपेक्षा १०७।२३। वर्णच “ˆ ०० ` ०० 4

१००११ १००।२८ १०१। १०१।१६ १०१२५

११ प्र, प,

१०९।१ ११०।

१११।१४ १११।२६ ११३२ ११४१३

११५२८

११६ ११६।१३

११६।२२ ११७ ११८ १२१।२३ १२३२। १२२।२८ १२४ १२४।२० १२४।२८ १२५७।१० १२९३१ १३८ १२८।११ १३८।२द्‌

१२९ १४०॥ १४०।१९ १८१

१४१।१५ १४१।२६

१४३

१२्‌

विषय, अवेधिका संवसे जघन्य एवय अवधिक्रा जघन्य क्षेत्र ,,, जघन्यसने्का निनेष कथन अवधिखा समयप्रचद्ध ,** 9 धरुवटारका रमाण मनेट्रव्य-वरणाका जघन्थ ओर उच्छृ प्रमाण ०. 1 भक्रारान्तरसे धुवदारका प्रमाण उदावधिके द्रव्यकी अपे्ना भेद .,“ धेच्रकी अपेधा जघन्य ओर उक्ष प्रमाण वर्गणाका भमाण परमावधिके भेद , ठेशाचधिके बिकत्प ओर उनके विषयभूत भेत्रादिके भ्रमाण निकारनेके कम्‌... उन्नीस काण्डकमे दोनों कममांका सरूप .. श्ुवश्दिका रमाण ` अधुवड्द्धिका भरमाण -.* 9६ उक्छृष्ट देशावधिके विपयभूत दन्यादिका प्रमाण ,„ 3 परमावधिके जघन्य उरव्यका परमाण ,.. उत्छष्ट ठरव्यका भमाण ०, सर्वाविधिका विषयभूत द्रव्य, ०. परमावधिके क्त्र कार्की अपेक्षा मेद विपयके असल्यातगुणितक्रमका भकार अकारातरसे गुणाकारका भमाण प्रमावधिके विषयभूत उक्कष्ट धेच ओर कारुका भरमाण निक्ालनेकेच्यि दो करणसूत्च॒ ,.. जघन्य देशावधिसे स्नाबधिपर्यत भाव- का अमाण , . . नरकगतिमे अचधिका धेश्रं .. तिर्येच ओर मदुष्यगतिमे वधि ... ठेवगतिर्मे अवधिका क्षेत्रादि मन प्रयैय ज्ञानका स्वरूप ,.. „.. मन पर्येयके भेद पयेयके दो भेदका विष स्वरूप मन पथेयक्रा स्वामी आदि. „.. ऋलमतिका जघन्य ओर उक्कृष्ट द्व्य

रायचन्द्रजैननादमालायाम्‌।

पु. प॑.। रिपय. १४२१७) विषुलमतिको द्रव्य १४३।२८ ' दोनों भोकर पत्राटिको प्रमाण १४४ ¦ केवल तानक स्वेर्प = = १४५२५ | ज्ञानमायणामे जीवनद्या ...

^ 8 1901

१४६। ५। सयसमागणा अ-२३ ।सैबमका खरप जीर उनके पाच मेद १४६।१४ ¡ संयमी उरपत्तिम कारण १४६९१२३ ।देगसंयम ओर असेनमका कार्ण . . १४५७] सामायिक सयम ००० १४७१५ छेदोपस्यापना सयम ,,- धि १६५२४! परिदारविशद्धि सयम ° . १४८॥ ¦ सूक्षमसापराग्‌ रयम 4 ' यथान्प्रात संयम $ १४८।१२ [देगविरत =.“ निः १५०।१० [अमयत + नि १५२१ ४! उस्रियोके अद्यईसं विषयं .,. भि १५२।१६ | संवमकी अपे्ा जीवसख्या

ददीनमा्भेणा अ-१४ १५३॥ 9 | दशोनका र्षण „.* १५३।२५ चक्लुदचनं आदि भेदोका मसे स्वटप

१५५४} | ठभननभे अवेक्षा जीवसंख्या १५४।११। लेदयामामैणा अ-१५ १५४।२द |ङ्व्याका उक्षण.

१५४।२८ | ठेदयाभके निदेश आदि १६ अधिकार

१५५१७, निर्न

वर्ण ००

परिणाम ( > १५६।१३ संक्रम

क्म ४; १५६।३०| उक्षण कु १५७२० गति 9 वि १५७३० स्वामी मि १५८] साधन 3 | १६१।२८ १० सख्या १६२ ११ त्र 5 १६२।२६ १३ सदौ $ १६४ १३ कारु १६५।१४। १४ सतर

ध, ५, ¶६५।२१ १६६११ १६५५११६ १६१२९.

१६९१ १६६९११५ १७०१ १७०११४५ ९५०।१५ १५७०।२८ १5११५ १५१।६ १५० १७२२५ १७३

१७६३।१२

१५७८} १७.६।१९. ५७५६१

१७६११ १७८] १७७११३३ १,७५७]२ ७४ १७९ १८६०६१८ १८२ १८३। १८५। १८९१८ १९२६ १९२।१२्‌ १९.४२७ १९६१ १९८।१६ १९९१२

चिपय, १५-१६ भाव ओर शत्पबहुल ,.. छेटयारहितं जीय भव्यमार्गणा अ-१६ भव्यमव्यका स्वकूप भन्यल अभघ्यत्वसे रहित जीव भन्यमार्गेणामे जीवस्या „. णाच परिर्वतन ,,. सम्य्त्वसार्मणां अ-१७ सम्ययत्वका खष्पर ६६ सात सभिकारोके द्वारा ष्ट न्यषा निक्पण

नाम २, उपलक्षण 8 लिति भन भर्या **

£ रभानच्वपं ०७ ५०७

प्र # & 1 परमाणु स्कन्धरप प्ररिणमनका कारण पचान्तिकाय ००,

नव पदां .. $ गृणस्धानकमसे जीवर्मस्या ,. अजीवादि-तत्वोकरा संक्षिप्त खक्ष ,,

नायिक़ यम्य वेद फ़ सम्यक्त्व , = उपशमे सम्यक्त्व पाच लच्धि .,, =

सम्यक्त्वे भटणकफे योग्य जीव $ सम्यक्लमार्गणाके दूसरे भेद सम्यक्त्वमार्यणामे जीवर॑ट्या

सक्षी मार्मणा अ-१८ संक्ञी भसन्नीका स्वल्प ,

गोम्मटस।रः।

घु, पृ, विषय, २००।२५ |सं्ञी असंन्ीफी परीक्षा चिन्ह ,,. २०१।११ | रत्नी मार्गणे जीवसंल्या ,

आहारमागणा भ-१९ २०१।२२ | आहारका स्वरूप $ २०२।२४ आहारक अनाहारकेका विभेद्‌ ,“* २०३ समुद्धातके भेद. २०३।१२ सयु्ातका स्वरूप 9 ~ आद्ारक आर अनाहारकका कालप्रमाण आदारमा्गेणारे जीवसंख्या 0 उपयोगाधिकार-२० उपयोगका स्वस्प ओर दोभेद दोनो उपयोगेफे उत्तर भेद सार उपयोगकी विदोपता अगाकार उपयोगाफी विक्चेपता = „+, उपयोगाधिकारभें जीवस॑स्या ६५ अत्भावाधिकारः गुणस्थान ओर माग॑णामे गेषं अरूपणा- ओका अतर्भाव ०० म्गिंणाओमे शुणस्थानादि ०,

२०८४।१३

२०८२४

२०९।१ २१५१२ २१६ २१५२५, २१८।२३ २२३]

२२४।२१

२२८२६ | यणस्थानोे जीवसमासादि

आङपाधिकार २९.१४

२३०॥ | नमस्कार ओर आालयपाधिकरारक कनेकी

= प्रतिज्ञा

६३८। (वा

9 शणस्थान ओर मार्गणाभकि आलापोंकी

|| ३९५ | #\ 9 संख्या

>४०।२६ 801 8 १11

२४१। | यणस्मानोभि आलप * 6

२४१।२२ [मारगेणाओमे जालाप „=

जीवसमासकी विदोषताः .

वीस भर्दोकी योजना ०, 4 २४२।२५७ आवदयक नियम २४४

गुणस्थानातीत सिद्धोका स्वप ,, वीस भेदोके नाननेका उपाय „० २४५ | अतिम आशीरवादं $

मो 2 ° 10)

१६

ए, प, २४५।१९ २४६।

२४६।१० २४६।२५ २४५ २४५७।११६ २४५।२६ २४८

२६४८।१४ २४८।२२ २४९ २४९।१३ १४९।२५७

२४५० २५०।१७

२५८।२०

२६२।१६

२६३।२४ २६४ २६५ २६९२७ २७०।११ २७०।२९ २५७३। २७२३।२१ २७३।१८

रायचन्द्रमैनशाखमाराद्वारा प्रकाशित अन्थोंकी सूची

[ण

पुरुषार्थसिद्यपाय भाषारीका यह ॒भ्रीद्रतचन्द्रलामी विरचित प्रसिद्ध श्ाल्न है इसमे आचारसवन्धी यड गूढ रहस्य है विशेष कर हिखाका खूप बहुत खवीकेसाथ द्रसाया गया है, यह एक वार छपकर विकगयाथा इसकारण फिरसे सश्लोधन कराके दूसरीवार छपाया गया है न्यो

पश्चास्तिकाय संस्क, भा. टी. यह श्रीडन्दङृन्दाचारयकृत मूक ओर भीयग्तचन्द्रसुरीृत सर्छृतटीकासटित पहले छपा था! अवकी वार इसकी दूसरी आडकततिमे एक संस्ृतटीका तात्य्दतति नामकी जो कि श्रीजयसेनाचारयैने बनाई है अर्थकी सरलताकेल्यि ठगादी गई है तथा पदी सस्छृतरी- काके सूम अक्षरोको मोटा करादिया ओर गाथासूची विषयसूची भी देखनेकी ञगसताके ज्थि रगादी है इसमे जीव, अजीव, धमे, अधर्मं ओर आकारा इन पांच द्रन्योका तो उत्तम रीतिसे वणेन तथा काठ्द्रन्यका भीं संक्षपसे वर्णन करिया गया है इसकी भाषा टीका सर्गाय पाडे हेमराजजीकी माषा. दीकाके अनुसार नवीन सरङ भाषाटीकामे परिवतेन कीगई है सपर मी न्यो २२

क्षानाणव भा. डी. इसके कर्ता धीश्भचन्द्रखामीने ध्यानका वर्णेन वहुत ही उत्तमतासे किया £ 1 अरकरणवच्च ब्रह्मचर्यनतका वर्णन मी बहुत रिखराया है यह एकवार छपकर एेकगया था अव द्विती- यवार सद्योधन कराके छपाया गया है न्यो ४२,

सक्तभद्गीतरंगिणी भा. की. यह न्यायका अपूव भन्थ है इसमे भंथकतां भ्रीविमरूदासजीने खा- टम्ति, स्ाच्रास्ति आदि सप्तभङ्गी नयका विवेचन नव्यन्यायकी रीतिसे किया है साद्वादमत क्या है यह जाननेकेल्यि यह भरं अवदय पठना षाय इसफी पहली आदृत्तिमे की एकमी भति नहीं रही अव दूसरी आडृत्ति चीघ्र छपकर भ्रकादित होगी न्यो

चहद्रव्यसंग्रह संरछूतः भा. दी. श्रीनेमिचन्दरखामीकृत मूर ओर शीव्रहदिवजीहृत संस्कृतका तथा उसपर उत्तम वनाई गई भाषाटीका सहित है इसमे श््योका खरूप अतिस्पष्टरीतिसे दिखाया गयादै। न्यो २रु

द्रन्यालुयोगतर्कण इस भ॑यमे शाल्लकार श्रीमद्धोजसागरजीने छगमतासे मन्दुदिजीवोको व्य हान होनेकेल्िये “अथ, “्युणपयैयवद्रन्यम्‌"› इस महाशाल्न तत्तवाथसूत्रके अचुकूर दरन्य--युण तथा अन्यं पदार्थोका भी विशेष वर्णन किया है ओर प्रसंगवशच खादसि" आदि सप्तमन्नौका ओर दिगंवराचा- वरय श्रीदेवसेनखामीविरवित नयचक्रके आधारसे नय, उपनय तथा सूलनर्योका भी विस्तारे वर्णेन क्ियाहे। न्यो. २रु

सभाप्यतत््वाथीधिगमसू्र इसका दूसरा नास तत्वाथौधिगम सोशल भी है जेनियोका यह परममान्य ओर सुख्य भ्रन्थं है इसमे जैनध्भके संपूरणसिदधान्त आचा्यैवयै श्रीउमास्वाति ( मी ) जीने वडे साधवे समह किये है देसा को$ भी जेनविद्धान्त नही है जो इसके सूर्ोमिं गमित हो 1 षिद्धा- स्तसागरको एक अलन्त छेते तत्वार्थूमी घटमे भरदेना कायै अदुपमसामथ्यैवाे इसके रचयि- ताका ही था तत्त्वा्थके छोटे सूतके अर्थगाभीयैको देखकर विद्वानोंको विसित होना पडता है। न्यो २रं

स्यादयादमञ्जरी सस्त मा. ॐी. इसमे छो मतोका विवेचनकरके टीका कतत विद्रे श्रीम हिषेणसूरीजीने खाद्रादको पूरणरपसे षिद्ध किया है न्यो" रं

गोम्मरसार ( कसैकाण्ड ) संरकृतचछाया ओर संपत भाषाटीका सदित यद महान्‌ अन्य

्रीनेमिचन्द्ाचार्यतिद्धान्तचक्रवर्तीका वनाया हुआ है, इसमे जेनतत््वौका स्वरम कहते इए जीवं तपा

कर्मक स्वरपर इतना विसतारसे है कि वचनद्वारा प्रशसा नहीं होसफती देखनेसेदी माद्म दोसकता दं

ओर जो. संसारकां श्षगडा है वह दन्द दोनो ( जीव-करम ) फे संबन्धस दे सो उनदोने(करा स्वसूप दिखानेकेलिये अपूर्वं सू हे न्यो. २२

१० प्रवचनेश्चार -श्रीयगूतचन्द्सूरिकत तत्त्वभदीपिका सं. टी, “जो कि यूनिवर्निटीके कोमगे दाखिर हे तथा श्रीजयसेनाचायैकृत ता्प्यृत्ति सं. टी आर वाखाववोधिनी भाषाटीका उन तीन टीका सहित-छपाया गथा है इसके मूलकतौ भीकृन्दङ्न्दाचायं दै यह अध्यात्मिक ग्रन्थ दै न्यो. > इ.

१९१ मोक्चमादा--कतां मरहुमसतानेधानी कवी श्रीमद्राजचंद्र छे, एक खाद्वाद तत्वावचोभ- क्ष वीज छ. भरन्थ तत्व पामवानी जिन्नासा उत्पन्न करीके एवं एमां कंद अन्नो पण देवत रघु छ. पुलक प्रसिद्ध फरवानो सुष्य हेतु उछरता वा युवानी अविवेकी विधा पामी जे आत्मतिद्धीधी शष्ट थाय छे ते अर्ता अरकाववानो छे. मोक्षमागा मोभमेकववाना कारण रुप छे. पुसतफनीये ये आदति खरस थद्‌ ग्छे उने णाहकोनी यदी मायणी 4 श्रीजी आकृति खपार्वी छे कीमत

आना बार

१२ भावनाघोध--आ अन्थना कतौ पण उक्त महापुरुपज छे. वैराग्य भ्रन्थनो सुर्यविपथर छे, पात्रता पामवानै अमे कषायमरु दूर करवा भन्थ उत्तम सावन छै. आत्मगवेपियने भन्थ आर्नदो्छस आपनार छे भ्रन्थनी पण वे आटृतिओ खपी जवाथी अने भराटकोनी यदोढी मागणी थी न्रीजी आदृति छपावी छे, कीमत आना चार, आने भन्थो गुजराती भापामा अने वारबोध यद्रपमा छेपावेर छे

१३ परमात्मप्रकादा- यदह भ॑य श्रीयोगगी्रदेव रचित भ्राङृतदोहाओंमे इसकी सस्कृतरीका श्रीबहमदेवहृत है तथा भाषाटीका प° दौरुतरामनीने की है उसके आधारसे नवीन रचित हिदीभाषा अन्वया्थं भावाथ परथ करके वनाई गई हे इसतरह दो टीका सहित छपरगया टै ये अध्यात्म््॑थ निश्चयमोक्षमागैका साधक दोनेसे बहुत उपयोगी हे न्यो स.

१७ षोडशाकभ्रकरण--यह भन्थ चेताम्बराचायै श्रीमद्धरिभद्रसूरिका बनाया हुआ सस्रत आया छन्दमिं ३, सम सोर धर्मोपदेशके प्रकरण दें धसका सर्त टीका तथा हिदीभापारीका सहित भ्रकारन होरहा है एक वर्षम रुगभग तैयार दोजाइगा

१५ छुन्धिसार ( क्षपणासार सदित )- यह ॒भन्थ भी श्रीनेमि्॑द्ाचायै सिद्धात चकवताका धनाया हुभा है ओर गोम्मटसारका परिदिष्ट भाग है इसीसे गोमटसारके स्वाध्याय करमेकी सफलता होती है इसमे मोक्षका मूरुकारण सम्यक्त्वके भ्राप्त होनेकी पाच छब्धियोका वर्णन हे फिर सम्यक्त्व दोनेके वाद कमेकि नादा होनेका बहुत अच्छा कमं वतढाया गया है कि भन्यजीव शप्र ही करेसि छट अन॑त सुखको भराप्त होकर अविनाश्षी पदको पासकते है 1 यदह भी मूर गाथा छाया तथा सक्षिप्त भाषा- टीका सहित छपाया जा रहा है 1 छह मरीनेके रगभग तथार होजाइगा 1

इस शा्लमाराकी अंसा सुनिमहारार्जोनि तथा बिद्वानोनि बहुत की सथानाभावेः नहं सकते ओर यह संस्था किसी स्वार्थकेल्यि नदीं है केवर द, इसी शाज्ञमारामें उत्तमम्रन्धोकि उद्धारकेवासे ऊगाया जाता है इति शम्‌ भथोकि भिरनेका पत्ता- शा० रेवाशंकरः जगजीवन जोँहरी जनिरेरो व्यवस्थापक श्रीपरमश्ुतभभावकमंडल ` ओदो बाजार खाराङ़वा पो नं० वर॑बरै. 1

सयायचन्द्रजैनश्षाल्रमाला !

श्रीमनेमिचन्द्राय नमः अथ छायाभापारीकोपेतः

गोस्यटखारः

जीवकाण्डम्‌

अथ श्रीनेमिचन् तेद्धान्तिकचक्रवतीं गोम्मटसार अन्थके छिखनेके पूव ही निर्वप समाप्ति ना्तिकतापरिहार, िष्टाचारपरिपछन जौर उपकारखरण-इन चार प्रयोजनोंसे इष्टदेवको नमस्कार करते हुए इस ग्न्थमे जो कु वक्तव्य है उसकी “तिद्ध” इत्यादि गाथामत्वारा भरतिजा फरते है- सिद्धं सद्धं पणमिय जिणिन्दबरणेमिचन्दमककं गुणरयणभूसणुदयं जीवस्स परूबणं वोच्छं सिद्धं शधं णम्य जिनेन्द्रवरनेमिचन्द्रमकड््म्‌ शुणरबमूपभोदयं जीवस्य प्ररूपणं वश्ये अर्थ--जो सिद्ध अवखा अथवा सासोपरव्धिको भ्रात हो चुका दे, थवा न्यायके अनेका भ्रमास जिसकी सत्ता सिद्ध दै, जौर जो चार वातिया-द्व्यकरमके अमावसे शुद्धः जर मिथ्यालादि मावकमोकि नासे णक्क्कक हो चुका है, जर निसके हमेशादी सम्यक्लादि गुणरूपी रलेकि भूषर्णोका उदय रहता है, इस कारके शीजिनन््रवरनेमिचन्द्र- खामीको नमस्कार करके, जो उपदेशद्वारा पूवीचार्य परम्यरासे चला मारहा है इस ठल्ि सिद्ध, घौर पूर्वापर विरोधादि देर्षोसे रदित होनेके कारण शुद्ध, ओर दूसरेकी निन्दा जादि करनेके कारण तथा रागादिका उत्पादक होनेसे निष्कलङ्क दै, ओर निससे सम्यकलादि गुणर्मी रलभूपर्णोकी प्राति हती है-जो विकथा आदिकी तरह रागका कारण नही है इस प्रकारके जीवप्ररूपण नामक अन्थको भर्थात्‌ जिसमे भञ्यद्ध जीवये सरूप भेद्‌ ममेद्‌ जादि दिखकाये है इस प्रकारके अन्धको क्वं गा »

रायचन्दरलैनक्षाखमाछायाम्‌

इस भकार नमस्कार भौर विवक्षित भ्॑थकी पभरतिक्ाकर इस जीवकण्डर्म॑जितने मधिकारके द्वारा जीवा वणेन करगे उनके नाम जर संख्या दिखाते है गुणजीवा पत्ती पाणा सण्णाय मग्गणाजो य्‌ उ्रओगोवि कमसो वीस तु पर्णा भणिदा २॥ शणजीवाः पयीप्रयः प्राणाः संज्ञाश्च मागेणाग्ध इपयोगोपि कमरा; चितिस्तु प्ररूपणा भणिताः अर्ः--युणखान, जीवसमास, पयि, भाणः, संञा, चोदर्‌ माणा, जौर उपयोग भकार ये वीस प्ररूपणा पूवौचा्योनि कदी है भावाथे इनदीके द्वारा आगे जीवदरन्यका निरूपण किया जायगा इसश्यि इनका ठक्षण यद्यपि अपने अपने अधिकारमं खयं साचा करेगे तथापि यहापर संक्षेपसे इनका रक्षण कषदेना भी उचित है मोद जीर योगके निमित्तसे होनेवारी आमक सम्यग्द्रीन, सम्यग्ान सम्यदूचारित्रगुणोकी अवस्ामोको गुणखान कहते है जिन सद्दाधमेकि द्वारा मनेक जीका सबरह किया जासके उन सदशधरमोका नाम जीवसमास दै शक्तिविरेषकी पूरण॑ताको पयाति कहते है जिनका संयोग रहनेषर जीवम “यह जीता दहै" ओर वियोग होनेपर “यह मरगया रेसा व्यवहार हो उनको भाण कहते है आहारादिकी वाञ्छाको संज्ञा कहते है जिनके द्वारा अनेक अवसाम सित जीवोका ज्ञान हयो उनको मा्गेणा कहते है ! बाय तथा अभ्व॑त्र कारणेकि द्वारा होनेवाढी आस्माके चेत्तना गुणकी परिणतिको उपयोग कहते है उक्त षीस प्ररूपणा्जोका जन्तमौव गुणखान जर मारीणा इन दो प्ररूपणाभोंही दो सकता है, इस कथनके पूर्वं॑दोनो प्ररूपणायोकी उत्पत्तिका निमित्त तथा उनके पर्यायवाचकं शब्दोको दिखाते दै संखेओ ओधोत्ति गुणसण्णा सा मोहजोगभवा वित्थारादेसोत्ति मग्गणसण्णा सफम्मभवा संक्षेप ओघ इति गुणसंना सा मोहयोगभवा विस्तार आदेश्च इति मागैणसंज्ञा खकमैभवा अथे संक्ेप जोर जोष यह गुणखानकी संशा है भोर वह मोह तथा योगके निभि- तसे उत्पन्न होती दे, इसी तरह विसार तथा मदे यह ॒मार्गणाकी संज्ञा है भौर यहं भी जपने कर्मक उदयादिसे उलन होती है यांप चकारका ग्रहण किया है इससे

गुणखानकी सामान्य जर मा्गणाकी विष यह मी संज्ञा समक्षना यहांपर यह शङ्का

दोसकती दै कि मोह तथा योगके `निमि्तसे गुणखान उत्पन्न होते है नकि सकत `? शह तथा बोगक् निमित्ते यणखान उन होते दै नकि “ुणखानः

नामके एकदेकसे मी सम्पूरणं नाम समञ्चाजाता इस ल्यि गुणशाब्दसे गुणस्थान ओर जीवश्चब्दसे जीवसमास सम्नना

गोम्मटसारः } ,

यह सज्ञा फिर संज्ञको मोहयोगमवा ( मोह ओर योगसे उत्यत्त ) क्यौ का इसका उत्तर यह्‌ है कि यदपि परमार्थे मोह गौर थोगके द्वारा गुणान दी उलन हेते है कि गुणखान्ञा; तथापि यष्टापर वाच्यवाचकम कथचित्‌ भभेदको मानकर उपचारसै संन्ञाफो मी भोहयोगभवा कहा है उक्त वीस प्ररूपणाओका अन्तमीव दो प्र्मणा्ंम किप चपेक्षासे हो सक्ता है बीसप्रह्पणा किसर अपेक्षासे कही है यह दिखाते है आदेसे संङीणा जीवा पजत्तिपाणसण्णाओ उवभगोषि भेदे बीसं तु परूबणा भणिद्य आदेने संलीना जीवाः पयौपिग्राणसंज्ञाश्च उपयोगोपि भेदे विंगतिस्तु प्ररूपणा भणिताः अर्थ-मगेणामेमि ही जीवसमास, पर्यापति, प्राण, संज्ञा जर उपयोग हनका अन्तमीव हो सकता है इस ल्थि अभेद विवक्षासे गणखान जर मार्भेणा ये दो मरूपणा ही माननी चाहिये, वीम प्रूपणा जो कदी है वे भेद विवक्षासे है किस मार्गणे कौन प्रङूपणा अन्तर्भूत हो सकती है यह वात तीन गाथाँदरार दिखते है इन्दियफाये रीणा जीवा पजत्तिजाणभासमणो जोगे काओ णणे अक्खा गदिभग्गणे भाऊ ५॥ इन्द्रियकाययोर्छीना जीवाः पयौप्यानमापामनांसि योगे कायः जानि अक्षीणि गतिमागेणायामायुः अर्थ -इन्दियमार्गणाने तथा कायमागीणामे सरूपखरूपवत्सम्बन्यकी अपेक्षा, भयव सामान्यविरोषकी बिक्षा जीवसमासका अन्तमौव हो सकता है; क्योकि इन्दिय तथा काय जीवसमासके खहूप है ओर जीवसमास खरूपवा्‌ है तथा इन्दि ओर काय विरोषं हें जीवसमास सामान्य हे इसीमकार घमषम्मि सम्बन्धी यक्षा पीति भी भन्तभूत हो सकती है; क्योकि इन्दिय धर्मी है जौर पयति धर है। का्यकारणसम्बन्यकी मक्षा शवासोच्छरास मराण, वचनवर प्राण, तथा मनोबलम्राणका, पीप अन्तमोव हो सकता है; वर्यो भाण काय है जोर पीति कारण है कायवक माण विशेष है लौर योग सामान्यहै इसश्यि सामान्यविरेपकी अपेक्षा योगमागैणामे कायबरुपाण अन्तर्म हो सकता है कथेकारण- सम्बन्धकी थपेक्षासदी क्ञानमागीणामे इन्दरयोका अन्तमीव होसकता है, प्रमो शानकायके अरि सञीनडिय कारण है इतीदम गतिमागैणामे भदुमाणका भन्तमाव शासस नथी जया हो सकता हे, क्योकि इन दोनोका उद्य जाट -------- ह, क्योकि इन देोनोका उदय साथी होता दे।

द्‌ इन्दरियज्ञानावरणकमेके क्षयोपश्चमसे उत्पन्न निर्मरुता

रायचन्द्रनैनराखमाखायाम्‌

संलामोका अन्तमाव किस प्रकार होता है सो दिखाते है मायारोरे रदिणुवाहारं कोहमाणगि भय बेदे मेहणसण्णा रोदसि परिगगहे सण्णा & मायारोभयो रतिपूषैकमाहारं करोधमानकयोभैयम्‌ 1 वेदे मैथुनसंज्ञा छोभे परिमहे संज्ञा अथे-रतिपूैक आहार रथात्‌ आहारसंक्षा रागविशेप होनेसे रागका सर्पी है जौर माया तथा रोभकषाय दोनोंही खरूपवान्‌ दँ इसण्यि खरूपखरूपवत्सम्बन्धकी अपेक्षा माया जौर लोमकषायमे आहारस्ञाका अन्तमौव दोता है इसीपरकार खरूपखरूपवत्स- म्बन्धकी अपेक्षा ) कोष तथा मानकषायमे भयसंज्ञाका अन्तमौव होता है कायेकारणस- म्बन्धकी अपेक्षा वेदकषायमे मैथुनसंज्ञाका भर रोभकषायमे परिगरहसंन्नाका अन्तमोव होता है; क्योकि वेदकषाय तथा रोमकपाय कारण है जर भेथुनसंन्ञा तथा परिग्रह- संज्ञा कार्यं है उपयोगका अन्तभौव दिखानेके लि सूत्र करते है 1 सागारो उवजोगो णाण मग्गन्चि दंसणे भग्मे . अणगारो उनजोगो ङीणोत्ति जिणे्हिं णिदि ७॥ साकार उपयोगो ज्ञानमागेणायां दशनमागैणायाम्‌ अनाकार उपयोगो ठीन इति जिन्ैरिर्दि्टम्‌ अथे--उपयोग दो प्रकारका होता एक साकार दूसरा अनाकार ! साकार उपयोग उसको कते जिसमे पदाथ “यह घर है, यद्‌ पट दैः इत्यादि विशेषरूपसे भरतिभासित हो, इसीको ज्ञान कहते है इसख्यि इसका क्ञानमागेणाम अन्तमीव होता है जिसमे कोई मी विशेष पदाथे म्रतिमासित होकर केवर महासत्ताही विषय हो उसको अनाकार उपयोग तथा दैन कहते है इसका द्थनमागैणामे जन्तमीव होता हे यद्यपि यहांपर ऊपर सब जगह जभेद्‌ विवक्षासे दो ही परूपणा्गोमे शोष परूपणाओका न्तमोव दिखादिया है तथापि भागे भवयेक भ्ररूषणाका निरूपण भेदविवक्षासे ही करेगे मतिजञाकेः अनुसार प्रथम क्रमपराप्त गुणानकां सामान्य रक्षण करते है जरि दु उक्छिजंते उदथादिसु संभवे महि जीवा ते गुणसण्णा गिदा सवदरसीर्हिं यस्तु उक्षन्ते उद्यादिषु सम्भवैभौविः जीनासते गुणसंज्ञा निर्दिष्टाः सर्वद॒र्षिभिः \॥ अथे--द्द्ैनमोहनीयादि कर्मोकी उदय, उपरम्‌; क्षय; क्षयोपरम आदि अवखाके

गोम्मटसारः

दोनेपर होनेवाले जिन परिणामोसे थुक्त जो जीव देखे जाते है उन जीवको सवैज्ञदेवने उसी गुणखानवाङा ओर परिणामोंको गुणखान कहा है

मावाथः- जिस भकार क्रिसी जीवके दन मोहनीयकेकी मिथ्यालमहृतिके उदयसे मिय्याल्र ( मिथ्यादर्चन ) खूप परिणाम हुए तो उस जीवको सिथ्यादष्टि भौर उन परिणामोंको मिथ्या गुणान करेगे

गुणखानोकि १४ चैदह भेद है उनके नाम दौ गाथा्ोद्ारा दिखाते &

भिच्छो सासण भिस्सो अविरदसम्मो देसविरदो विरदा पमत्त इदरो अणुव अणियद्ध सुहमो ९॥

मिथ्यात्वं सासनः मिश्रः अविरतसम्यक्त्वं देरविरत्च विरताः प्रमत्तः इतरः अपूर्ैः अनिवृत्तिः १० सूक्ष्मश्च

अर्थ-मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरतसम्यण्डष्टि, देशविरत, ममत्तविरत, अप्रमत्त विरत, अपूवकरण, जनिदृत्तिकरण, सूष्षमसांपराय इस सूत्रम चौथे गुणखानके साथ जविरतशब्द अन्त्यदीपक है इसरि पू्ैके तीन गुणखानोरमेमी भविरतपना समक्चना चादिये। तथा छे गुणखानके साथका विरत छब्द आदि दीपक है इस ज्यि यांसि लेकर सम्पूर्ण गुणखान-विरत ही होते है पपा समक्षना -

उवसंत खीणसोद्ो सजोगकेवर्जिणो अजोगी चउदस जीषसमासा कमेण सिद्धा णादवा १०

११ उपशान्तः, १२ क्षीणमोदः, १३ संयोगकेवछिजिनः, १४ अयोगी चतुरश जीवसमासाः करमेण सिद्धाश्च ज्ञातन्याः १०

अश्र--उपरान्तमेोहक्षीणमोद,सयोगकेवठिजिन, अयोगकेवली ये १४ चोदह जीवसमासं ( गणखान ) है जौर सिद्ध जीवसमासंसे रदित है अथात्‌ इस सूतम कमेण शब्द पदा 2 इससे यह सूचित होता है कि जीवसामान्यके दो भेद दै एक संसारी दूसरा यक्त। युक्तमवखा संसारपूैक ही होती है संसारियोकि गुणखानकी चक्ष चद्ह भेद दै, इसके अनन्तर क्रमसे युणखानोंसे रदित शक्त या सिद्ध अवखा प्रा होती है इस गाथाम सयोग शब्द अन्त्यदीपक है इस व्थि पूरके मिथ्याश्ादि सबही गुणस्थानव्तीं जीव योगसहित होते है मौर ॒जिन शब्द मध्यदीपक है इससे भरसंयतसम्यग्ष्टिसे लेकर अयोगी पर्यन्त समी जिन होति है केवरि शब्द आदिदीपक है इसल्ि सयोगी

अयोगी तथा सिद्ध तीनों ही केवडी होते है यद वूचित होता दै

& रायचन्द्रञैनराखमालायाम्‌

इस भकार सामान्यसे गुणखानोका निर्देशकर भव प्रसेक शगुणखारनोमं जो भाव होति है उनका उछ्ेख करते है मिच्छे खड ओदङओ विदिये पुण पारणामिजो भवो भिस्से खभोवसमिओ अबिरदसम्मलि तिण्णेव \॥ ११ मिथ्याते खद ओदयिको द्वितीये पुनः पारणामिको भावः मिश्र क्षायोपर्चमभिकः अविरतसम्यक्त्वे चय एव ११॥

अ्- प्रथम गुणखानमे ओदयिक माव होते है ! जौर द्वितीय गुणान पारणा- मिक भाव होते है | मिशरमे क्षायोपशमिक भाव होते है जीर चतुथे गुणखानमे जीपरशामिक; क्षायिक, क्षायोपशमिक इस प्रकार तीनोही भाव होति है

वर्मफे उदयसे जो आासाके परिणाम हौ उनको जौदयिक भाव कहते दै जो क्के उपम होनेसे माव होते है उनको ओपशमिक माव कटेते दै। सषातिस्पकोकि वमान निपेकोकि विना फर दिये ही निर्जरा होनेपर जोर उसीके ( सभैधातिस्पर्धकोके ) आगामिनिषेकोका सदवखारूप उपराम होनेपर ओर देरधाति स्प्ैकौका उदय होनेपर जो आटमाके परिणाम होते है उनको क्षायोपशमिक भाव कहते है जिनमें कर्मफे उदय उपशमादिकी कुछ भी अपेक्षा हो उनको परारणामिक भाव कहते दै

उक्त चारों ही गुणखयानके माव किंस अयेक्षासे कटे है उसको दिखानेके स्यि सूत्र कहते है

एदे भावा णियमा द॑सणमोहं पड़ भणिदा चार्तिं णत्थि जदो अधिरदअन्तेखु उणेखु १२ एते भावा नियमा ददेनमोहं भरतीय भणिताः चारित्रं नासि -यतो अविरतान्तेु नेषु 1 १२

अथे- मिथ्यादश्यादिगुणखानेमिं जो नियमवद्ध जौदयिकादि भाव कटे है वे दर्चनमो- हनीय कर्मकी अपेक्षासे है; क्योकि चतुथेगुणस्थानपयैन्त चारित्र नही होता अथात्‌ मिथ्यादृष्टयादि गुणस्थानेमिं यदि सामान्यसे देखा जाय तो केवर ओदयिकादि भाव ही नहीं होते किन्तु क्षायोपशमिफादिं माव भी होते है तथापि यदि केवरु दर्चनमोहनीय कर्मकी वपेकषा देखा जाय तो योदयिकादि भाव ही होते दै; क्योकि मथमगुणखानमें दुरेनमोदनीयकमेकी मिथ्यालभङ्ृतिके उदयमालफी यक्षा है इसश्यि