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बोंग एक चिन्तन

लेखक

उपाध्याय श्रमण श्री फूलचन्द्र

सनपादक हि

थी नलिलकधर जास्त्री

प्रकाशक

आचार्य श्री आत्माराम जैन प्रकागन समिति

जेन स्थानक लुत्रियाना मुद्रक

आत्म जेन प्रिथ्मि प्रेस ३५० इण्डस्ट्यिल एरिया-ए लुधियाना-३

संस्करण -

प्रथम ( २३ सितम्बर १६९७७ ) एक हजार

मूल्य

पाच रुपए

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परकाणशकाय

आचार्य श्री आत्माराम जैन प्रकाशन समिति श्रनेक वर्षो से स्वर्गीय आचाये श्री आत्माराम जी महाराज की हादिक अभिलाषा की पूत्ति के लिये आगमो का, जैन सस्क्ृति के विविध पक्षों पर प्रकाश डालने वाले मौलिक साहित्य का एवं विविध स्‍्तोत्रो आदि का साहित्य-प्रेमी दानवीरों के सहयोग से प्रकाशन कर रही है। यह पकाणन अपना विशेष महत्त्व रखते है, क्योकि इनमें स्वर्गीय आचार्य श्री की सरल एवं सरस भाषा भे जन-जीवन के उद्धार के लिये उपयोगी ज्ञान-निधि सुरक्षित है। लुधियाना का यह परम सौभाग्य है कि यहाँ पण्डित-रत्न श्री हेमचन्द्र जी महाराज, पजाव-प्रवर्तक उपाध्याय श्रमण श्री फूलचन्द्र जी महाराज, एवं करुणा-मूर्ति विद्वद्वत्त श्री रतन मुनि जी महाराज विराजमान होकर स्वर्गीय आचार्य श्री की ज्ञाननिधि को प्रकाशित करने की सबल प्रेरणा तो देते ही रहते है, साथ ही अपने चिन्तन-पुष्पो से समाज को लाभान्वित भी कर रहे है उपाध्याय श्री जी की लेखनी एक ऐसी स्रोत-स्थली है जहा से ज्ञान-गगा का पीयूप-प्रवाह निरन्तर प्रवाहित होकर जन-जन को अल्षय जान्ति प्रदान करता रहता है। वे अपनी जानमयी अभिव्यक्ति के द्वारा जैन साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे है। योग एक चिन्तन यह एक सव्वेथा अभिनव रचना है। इसमे उपाध्याय जी महाराज ने योग-साधना की पूर्णता के लिये जिन आवश्यक साधनो की अनिवायंता है उनका विद्वद साड्भोपाड़

योग एक चिन्तन ] [ सात

विवेचन किया है !

जहा यह ग्रन्थ योग-सावना के पथिक जिज्ासुओं के लिये उपयोगी है वहा जैन सस्क्ृति का विद्वद परिचय प्राप्त करने वालो के लिये भी अत्यन्त सहायक हैं

उपाध्याय श्री जी तो स्वय महान्‌ योगी हैं, अत उनकी लेखनी ने उन अनभतियों को विशेष रूप से व्यक्त किया है जो उन्होने स्वय इस मार्ग पर चलते ह₹ए प्राप्त की हैं, अत. यह ग्रन्थ योग-साथना के अनुभूत सत्यों की अभिव्यक्ति करने वाला एक ऐसा प्रकाञ-दीप है जिस से प्रत्येक व्यक्ति अभीप्ट प्रकाग प्राप्त कर सकता है।

समिति को सौभाग्य से श्री तिलकघर जञास्त्री साहित्य-रत्न साहित्यालकार जैसे विद्वान मिल गए है, उनकी विद्धत्ता एव कलात्मक प्रतिभा समिति के प्रकाशनो को सुन्दर रस दे रही है, ग्रत समिति उनके प्रति हादिक आभार व्यक्त करती है

अन्त में हम लुधियाना निवासी श्री रतनचन्द ओसवाल के सुपत्र श्रीयुत श्रोपाल जी ओसवाल की धर्मपत्नी श्रीमती जकन (कन्ता देवी) का हादिक धन्यवाद करते है जिनके द्वारा दिये गए अर्थ-सहयोग से यह पुस्तक प्रकाशित हो सकी है। हम आ्रागा करते

श्री रतनचन्द जो ओसवाल के परिवार की ओर से भविष्य में भी हमे ऐसी रचनाओं के प्रकानन के लिये सहयोग प्राप्त होता रहेगा हम इन्हों ग्दों के साथ यह ग्रन्य पाठकों की सेवा मे प्रस्तत करते है

निवेदक

टी. आर. जेन, प्रधान राजकमार जैन, मन्त्री आचार्य श्री आत्माराम जैन प्रकाशन समिति, ज॑नस्थानक, लुधियाना

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योग-साधना के प्रति मेरा झुज्ान साधक जीवन के प्रथम चरण मे ही उत्पन्न हो गया था, क्योकि चित्त-वृत्तियों का निरोध करके में अन्तर्जगत्‌ के रहस्यों को जानना चाहता था, साधना भी बढती गई ओर जिनासाओ्ं का विस्तार भी होता गया जिज्ञासा अपूर्ण रहे यह असझह्य सा होता है, श्रत मै जिज्ञासा- यूनि के लिये स्वाब्याय करता रहा, पतज् लि के योग-दर्शून का शाद्योपान्‍्त मनन करते हुए तब्नुसार हुछ करने का प्रयास भी किया, श्रद्धेय आचार्य श्री आात्माराम जी महाराज के चरणों भें बैंठ कर ध्यान-सम्बन्धी अनेक जिज्ासाओों की पूति भी वी, परन्तु जिज्ञासा श्रव भी प्रश्न-चित्ह को पकड़ कर मेरे सामने खडी रहती है। मैं भी उसके नव-नरवे समाधानों के 'अच्वेषणार्थ यत्नशील रहता हु और यत्नणील रहूंगा समवायाग सूत्र का अध्ययन करते हुए मैंने जब वर्तीस योगो का नामोल्लेख देखा तो मेरे हृदय ने चिन्तन-सागर की अतल गहराइयो को छते हुए पतजलि के योग-मार्ग और. बत्तीस योगो के समनन्‍्वयात्मक अध्ययन से कुछ परितोष का अनुभव किया, जैसे-जैसे समन्वय के पथ पर मेरे चिन्तत को धारा बढ़ती ग्रईं वेसे-वैसे विच्वास होता गया कि महंपि पतजलि ने श्रकारान्तर से इन्ही वत्तीस योगो की व्याख्या करते हुए सूत्र-ैली में चित्तवृत्तियो को निरुद्ध कर गान्ति श्राप्त करने के पथ का ही निर्देश किया है

योग एक चिन्तन | [नो

तभी से मेरी यह भावना प्रवल हो उठी थी कि इन बचीस योगो की विस्तृत व्याख्या करू , किल्तु कार्य की कठितता, समय के अभाव और अनेक अन्तरायो के कारण यह कार्य कुछ विलम्ब से ही हो पाया है, फिर भी मुझे सन्‍्तोप हैं कि अपने कथ्य एवं मन्तव्य को जन-जन तक पहुंचाने की अ्रपनी भावना को मैने साकार कर दिया है

विपय अत्यन्त गहन एवं विस्तृत था, फिर भी गैने यथा- दतय यह प्रयास किया हैं कि विषय कही भी दरूह रह जाए, साकेतिक भी रह जाय और अस्पष्ट भी रहे इसी वात को लक्ष्य मे रख कर मैने अपने कतेव्य की पूति कर दी है, पाठको ने यदि इस प्रयास से ज्ञानद्रुम का एक पुष्प भी प्राप्त कर लिया तो में अपने प्रयास को सफल समझ गा। 7

- प्रस्तुत पुस्तक के प्रकागन-कार्ये में मुझे विद्वद्ख्न श्री- रतन मुनि जी महाराज द्वारा जो उचित सहयोग प्राप्त हुआ है उस के लिए मैं उनका हादिक घन्यवादी. हूं

इस पुस्तक के सम्पादन में आत्म-रश्मि - के सम्पादक श्री निलकधर जास्त्री का सहयोग प्रगस्त रहा हैं, उन्हीं के श्रम से पुस्तक की साज-सज्जा भी सनोहारी बन पाई है उनके लिये जो कहना चाहिये वह मेरा अन्त-करण कर रहा है। फ्‌लचन्द्र श्रमण लुधियाना उपाध्याय २३ सितम्बर १६७छ७छ

भाद्रपद ज्‌ कला ह्ादर्शी स॑ २०३४

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योग एक चिन्तन : मेरी अनुभूति

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प्योग एक चिन्तन” जब यह गीरेक मैंने पढा तो मैंने भ्रपनी पू्वे धारणा के अनुसार यही समझा क्रि प्रस्तुत पुस्तक में 'योग- साधना! कैसे की जाय ? इसका ही विशद विवेचन होगा, परन्तु जैसे ही “बत्तीस॑ जोग संगहा पण्णत्ता” पढ कर वत्तीस योगो के नाम पढे तो तुरन्त मेरी धारणा बदल गई और मे एक अन्य दृष्टि- कोण लेकर पुस्तक का स्वाध्याय करने लगा। पढंते-पढते जहां पंहुचा हू वह अत्यन्त अद्भुत है--श्रानन्‍्दकारी है श्रौर जो अन्यत्र संक्षेप मे है यहां उसे विस्तार में पाया और साथ ही सर्वेत्र जो प्रजेप और अबूझ रहा वह यहा ग्राकर ज्ञेय और स्पष्ट हो गया

* ध्योग' जब्द ने कब कहा से श्र्थवरोष की यात्रा आरम्भ की है ? और इस दब्द से किसने क्या समझा है ? यह कहना श्रत्यन्त कठिन है, क्यो.क व्यान-योग, कर्म-योग, हुठ योग, अध्यात्म-योग साख्य योग, ज्ञान-योग.अदि शब्दो मे योग शब्द श्रलग-अलग शअ्र्थों का बोघ करा रहा, है। . -

योग शब्द के अर्थ जानने से पहले इसका इतिहास जानना आवश्यक होगा, किन्तु योग शब्द के श्रर्थ-ज्ञान के बिना इतिहास का जानना असम्भंव होगा, श्रत सर्वप्रथम योग शब्द के अर्थ पद

थोडा विचार कर लेता चाहिये, जिससे पुस्तक का समग्र 'विषय वोध-गम्य हो सके

योग एक चिन्तन ] [ ग्यारह

योग छब्द प्राव ध्यान-योग के श्र्थ में ही अधिवतर प्रगुन्त हुआ है महपि पतरश्नलि का योग-दर्णन ध्यान-बोग की ही श्राद्यो- पान्त व्यात्पा है। पतरच्जलि नेयोग अब्द का अर्थ करते हुए लिखा है--“योगश्रित्तवृत्तिनिरीध, अर्थात्‌ चिल की विचार- धाराओं को निरुद्ध कर देना ही योग है। योग की यह व्यास्या ईसा से दो सी वर्ष पहले की गई थी, किन्तु ध्यानावस्विच साधकोा की अनेक मूरतिया हचप्पा और मोहन जोदडो से उपलब्ध हुई है, श्रतः जात होता है कि घध्यान-योग को प्रक्रिया से उस काल का मानव भी परिचित हो चुका था जिसे आज के ऐतिहासिक एवं परातन्व- वेता प्रागेतिहासिक काल कहते है क्‍ श्री कृष्ण का काल ईसा से ३००० वर्ष पूर्व माना गया है

कुछ ऐसे विद्वान भी हैं जो श्रीकृष्ण को २२००० वर्ष पूर्व का महापरुप स्वीकार करते है। उन्होंने गीता मे साख्य योग कर्म-बोग भक्ति-योग दि शब्दों का उल्लेख किया है। मालूम होता है श्री कृष्ण के समय तक योग थब्द पर्याप्त प्रप्तिद्धिपा चुका थाव श्री कृष्ण ने योग छाब्द के मुल्यत दो अर्थ किए है--“बोग. कर्मसु कौरालम्‌*-कर्म करने मे कृभलता ही योग है और “समत्व योग उच्यते “समता की साधना ही योग है

- श्री कृष्ण पर भगवान्‌ नेमिनाथ का भअमाव चाहे सर्वेमान्य हो, परन्तु जैन सस्कृति को अवच्य मान्य है, क्योंकि समवायांग सूत्र मे-प्रतिपादित “समदिद्वी” शब्द उस पमत्व का ही प्रतिपादक है जिसे श्री कृष्ण ने योग कहा है

- योग घब्द का कम-कौभल अर्थ भी जैन सस्क्ृति को मान्य प्रतीत होता है, क्‍यों के यहा मन, वचन और जरीर के कार्ये- व्यापारी को योग माता गया है। मन के कार्यब्यापार को, वचन

बारह | [ योग एक्र चिन्त

के कार्य-व्यापार को और काया के व्यापार को इस प्रकार अप्रमत्तं होकर करना चाहिये जिससे कि उनके द्वारा पापकर्म मे प्रवृत्ति हो सके यही तो कर्म की कुशलता है। भ्रत “कर्म कौशल ' योग के इस ग्रर्थ पर भी जैनत्व की छाप स्पष्ट है

पतंजलि के योगदर्शन पर जनत्व की छाप

जलि का जवित्तवत्तिनिरोध भो अन्तत,. समाधिरूप ही तो है, क्योकि चित्तवृत्तियों के निरुद्ध होने पर. अन्तत चित्त देश विद्येप मे बध जाता है, यही तो पत्तञ्जलि की धारणा. है (देश- वन्धश्चित्तस्य घारणा--३।१) उस देशविश्येप मे जब चित्त घ्येय- मात्र पर छ्थिर हो जाता है, तब उसे ध्यान कहा जाता है (ततन्र प्रत्ययेकतानता ध्यानम्‌ ३३२) भर जन्न-ध्यान ही ध्येंय के “रूप में भासित होने लगता है उसे समाधि कहा जाता है (त्तदेवाथ्थमात्र> निर्भास समाधि ३॥३) यह समाधि भी जेन दर्शन मे योग सभा प्राप्त करती है, अत समाधि को भी वत्तीस योगो से स्थान दिया गया है योग शब्द का श्रर्थ “जोड ' सर्व मान्य हे। इस श्रर्थ की दृष्टि से यदि योग को जाना जाय तो हम कह सकते है कि योग के लिये दो का होना श्रावश्यक है,' एक में योग नही हो सकता, योग दो की ही अपेक्षा करता है। योग वह प्रंक्रियां है जिसके द्वारा चित वुलियों को ' मन्त के व्यापारों को और शारीरिक चेष्टाओ को बाहर से तोड कर आत्मा के साथ जोडा जाता है, इधर से तोंडना प्रौर उधर जोडना योग का प्रधानतम लक्ष्य है। योग नीचे को छोड कर ऊपर से जोइता है, उस अवस्था मे पहुचा देता है जहा केवल जान मात्र गेप रह -जाता है श्रीर कुछ

योस एक चिन्तन | [ तेरह

चचता ही नहीं, नेय और ज्ञाता, केवल ज्ञान ही रह जाता है

इस अवस्था में चित्तवृत्तिया तो रहती ही नहीं है, वे निरूद्र हो जाती है, श्रत केवल श्रात्मानुभूति ही शेण रह जाती है इसीलिये अनेक विचारक योग को विचार कह कर शअनभृत्ति कहते हैं

योग उस आध्यात्मिक प्रक्रिया को भी कह्दा जा सकता -है जो योग को तोड देती है। केवल एक को रहने देतो है जसे यदि कोई व्यक्ति घन को पाना चाहता है तो उसे लोभ कहा जाता है, लोभी का व्यान सदा घन पर रहता है

यद्दि कोई त्यागी बन को त्यागना चाद्वता है तो उसका ध्यान भी धन पर ही केन्द्रित रहता है, वह सदा अप्रमत्त भाव से धघंन से'वचने की कोशिग करता रहता है | लोभी और त्यागी दोनो का ध्येय धन ही है। युद्ध-भूमि में योद्धा का ध्यान घत्रु पर ही रहता है, त्यागी घन को शत्रु समझता है, अ्रत उमसे'चबचने के लिये वह उस पर ही सावधानी से निगाह रखता है। योग के लिये नि्लॉभिता और त्याग (अलोभ श्रौर सवेग) शब्दो के प्रयोग का यही तात्परय है योग लोभी के मन और घन के योग को समाप्त कर देता है। सच्चा योगी संचय और त्याग दोनों से मक्त होकर स्व-स्वरूप मे अवस्थित हो जाता है। इसी को योग- दर्शन मे सवथम- कहा गया है सयम में घ्याता ध्यान और व्येय की त्रिपुटी एक हो जाता है, धारणा ध्यान और समाधि मे एक रूपता हो जाती है (चयमेकनत्र सयम, ३।४) |

वस्तुत पतख्ललि का योग-दर्शन जैन सस्क्ृति मे प्रतिपादित

चोदह ] [ योग एक चिन्तन

वत्तीस यौगो की व्याख्या मात्र है। योग-दर्शन करा विपय-प्रति- पादन इसका साक्षी है। योगावस्था मे क्‍या होता है पतंजलि उत्तर देते है--'तदा द्वप्टु स्वरूपेब्वस्थानम्‌--तव अदष्टा श्र्थात्‌ आत्मा अपने स्वरूप मे अवस्थित हो जाता है। स्वरूपावस्थान ही तो जैन सस्क्ृति का प्रमुख स्वर है रा

वित्त-वृत्तियों के निरोध का उपाय क्‍या हे ? पत्तजलि के शब्दों में “अभ्यासवराग्याभ्या तन्निरोध. (१।१२) | अभ्यास और वैराग्य.से चित्तवृत्तियो का निरोध होता है। यह अभ्यास क्या; है (त्तत्र स्थिती यत्नो5भ्यास १। १३)--बतना ही अभ्यास है, यह यतना शब्द और यतना की साधना की प्रमुखता जैन सस्क्रति का ही उद्घोष है। 'वराग्य' तो जिन-सस्क्ृति का श्राधार भृत्त तत्त्व है

योग-दर्णन उस श्रसम्प्रज्ञात समाधि को प्रमुखता देता है जिसमें झात्म-प्रवस्थिति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।इस प्रसम्प्रजात समाधि की झोर यात्रा सवेग से श्रारम्म होती है। सवेग जैन संस्क्ृति;-का -अप्ना शब्द :है पतर्जाल भी कहते है तीव्रसवेगानामासन्न (१। २१) तीन सवेगवालो को अ्रसम्प्रज्ञात समाधि सुलभ हो जाती है।.

योग-दर्शन ने असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति के लिये 'ईश्वर-

प्रणिधानाद्वा कह कर ईश्वर के ध्यांत को कारण माना है; परंन्तु

कोई इव्वर को ब्रह्मा, विष्ण या शिव जैसा देवता मान ले, यह

सोचकर अंगछे ही सूँत्र,मे स्पष्टीकरणं करते हुए पतञ्जलि कहते व्लेश-कर्म-विपाकाशय स्परामृष्ट पुरुष- विशेष :ईइवर, --जो

भी विशेष पुरुप--महापुरुप - क्लेशो से <दूर'हो चुका है,'कर्म और

कर्म के सस्कारो से मुक्त हो-चुका है वही ईइवरः है--यह-ईइवर

योग एक्र चिन्तन '] [ पन्द्रह

जैन सस्कृति के 'सिद्धों की ओर न्पष्ट सवेत कर रहा है इसी विपय को और स्पष्ट करते हुए योग-दर्णन कहता है

“तत्र निरतिगय सर्वेभवीजम्‌ (१॥२) ईब्चर में निरतिशय ज्ञान है, जितना जान हो सकता है वह सब उसमे होता हे, अत उसे सर्वंन कहते है क्या 'सर्वत्' अ्रिहन्त का--तौर्थ डूर का पारि- चायक प्रसिद्ध शब्द नही है |

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'अन्तराय' यह जेन सम्कृति का जाना-पहचाना शहद है समाधि मे श्रन्तराय क्या है ”? यह बताते हुए पतजलि ने -वब«वें सूत्र मे व्याधि, स्त्यान (कर्म-असामथ्ये) सथय, प्रमाद, श्रालस्य अ्रविरति, श्रान्ति-दर्गन, श्रलव्ध-भूमिकत्व (चित्र की अस्थिरता) श्रनवस्थितत््व इन नी को श्रन्तराय अर्थात्‌ विध्न-कारक बताया है 'योग एक चिन्तन का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि जेन सस्क्ृति ने इसी प्रकार .के ग्नेक अवगुणो को साधना में विघ्न करने वाले कहा है

'वीतराग-विपय वा चित्तंम्‌ इस सूत्र का 'वीततराग' शब्द जैन संस्कृति की ही तो देन है, क्योकि तीथेड्ूर राग में रहते हैं, विराग में रहते है, वे दोनो से मुक्त होते हैं, श्रत उन्हें वीतराग कहा-जाता है। वीतराग का . ध्यान चित्त का प्रसादन करता है--उसमे साधना का उत्साह जागृत करता है, क्‍या यह जन सस्कृति ही नही बोल रही है

साधन-पाद में पतजलि ने योग की सिद्धि के लिये जो साधन बताए हैं वे है-+तप, स्वाध्याय, ईश्वर श्रर्थात्‌ सिद्धो का ध्यान

द्वितीय पाद के तीसवे सूत्र में अहिसां, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, श्रपरिग्रह इन्हे यंस कहा गया है और इकत्तीसवे सूत्र मे इन्हे--+

सोलह] [ योग ; एक चिन्तन

' एते जाति-देश-काल-समयानवच्छिन्ना सार्वभीमा महाव्तम्‌ कह कर अहिसा- ग्रादि को सावभौम महात्रत कहा गया है और उन्हें सभी देशो सभी जातियो और सभी कालो ' के लिये आरा- घनोय कहा है बे

नियम के श्रन्तर्गत शीर्च, सन्‍्तोष, तप, स्वाध्याय, ईरवर- 'प्रणिधान को लिया गया है | ३३ बे सूत्र मे हिसा के कृत, कारित अनमोदित रूप की चर्चा की गई है इत्यादि 'समस्त वणन इस बात को प्रमाणित करतो है कि पत्तजलि योग के क्षेत्र पे भगवान महावीर से तीन सी वषे बाद उनकी शब्दावली और उनको घ्यान- प्रक्रिया से प्रभावित्त हुए और उत्होने उन्ही की साधना-पद्धति का आश्रय लेकर योग-दर्गन की रचना की

प्रस्तुत पुस्तक में उपाध्याय श्रमण श्री फूलचन्द्र जी महाराज ने बत्तीस योगो को जो क्रमबद्ध व्याख्या को है वह व्याख्या योग- दर्शन की गली में दुष्टिगोचर होती है, श्रत जो साधक योगी वनना चाहता है, उसके लिये श्रस्तुत पुस्तक का क्रमबद्ध स्वाध्याय 'उपयोगी होगा यह निश्चित है :

ध्यान-मघोग

पतश्ललि का योग-दर्शन ध्यानयोग का समग्र रूप है। ध्यान साधना के क्षेत्र का प्राण है। कोई भी साधक इसके बिमभा साधना मार्ग पर सफलता प्राप्त नहीं कर सकता विश्व में जितने भी अध्यात्म का श्राधार लेकर चलने वाले सम्प्रदाय है, उनमे श्रनेक सैद्धान्तिक मत-भेद हैं, किन्तु ध्यान मे कही किसी का कोई मतभेद नही है। समी धर्म-सम्प्रदायो को ध्यान मान्य है।

यह. विकासशील ' मानव जेसे-जेसे वाह्य ससार में बढ़ता योग” एक चिन्तन ] [ सतह

गया वैसे वैसे वह अ्रन्तर से दर हटता गया है। यह आत्मा को पीछे छोड कर बहुत आगे बढ़ गया है। श्रव वह वापिस लोटना चाहता हैं- प्रतिक्रमण चाहता है, परन्तु प्रतिक्रमण उसे कौन सिखाए ? प्रतिक्रमण तो जैन सस्कृति के मिवा श्रन्यत्र कही है ही नही प्रतिक्रमण की पूर्णता ध्यान के बिना नही हो सकती, क्योकि ध्यान श्रन्दर की गहराइयो में ले जाने की सफल प्रक्रिया है जो बुक्ष बहुत ऊचा उठना चाहता है उसे अपनी जडे पृथ्वी के सीतर -बहुत गहरे ले जानी होती हैं, जिस वृक्ष की जड़े जितनी गहरे मे जाएगी चह उत्तना ही श्रधिक आक्राभ मे ऊचा उठ सकेगा

मनुष्य भी यदि ऊपर उठना चाहेया तो उसे ध्यान के द्वारा श्रन्तर की गहराइयों से सम्बन्ध जोडना होगा, तभी वह ॒सिद्धत्व की-ऊचा इयो तक पहुंचने का अधिकारी वन सकता है। यही कारण है-कि ध्यानयोग़ को यहा प्रमुखता दी गई है

वस्तुत ध्याव मानव का स्व-भाव है, इससे मनृष्य को 'होने का -अपने अस्तित्व को जानने का सुख प्राप्त होता है, किन्तु व्यान ऐसी आ्राव्यात्मिक प्रक्रिया है जिसे करके ही जाना जा सकता है, इसे जानकर किया नहीं जा सकता विच्च के सभी सम्प्रदायों ने जो ध्यान की विधिया बताई हैं उनकी सख्या ११२ बताई गई है | एक सी बारह ध्यान के विशेष प्रकार हैं। देश कोल एवं पात्र की योग्यता को देखकर वे शिष्यों को सिखाए जाते हैं | भगवान बुद्ध ने योग के स्थान पर समाधि जब्द का प्रयोग किया हैं और उनकी दुष्टि में हृदय का सशयं-रहित होना और समन, वचन एवं काया का सन्तुलन ही योग अ्रथवा ध्यान है मन वचत और काया का स्रन्तचुलन होने पर ही चित्त-स्थैर्य प्राप्त होता

अठारह | | योग * एक चिन्तन

है ग्लौर चित्त की स्थिरता भें ही समाधि है-+आत्म-स्वरूप- ग्रवस्थिति है योग-दर्शन जिसे-दिंति-गक्तिक्हता है जन सस्क्ृति मे वही गात्मा-है, योग-दर्श उसे अप्रतिसक्रमा अर्थात्‌ परिणाम- रहित कहता हैं। जैन दर्शन- भी ग्रात्मा.को अपरिणामी मानता हैं, अत, ध्याना- वस्था में आत्म चिन्तन की ही प्रधानता रहती है जन दर्शन का वैशिष्टय - योग-दर्णन में कही भी ध्यान के भेदो का वर्णन नहीं क्रिया गया। जैन दर्शन ने ही उसे चार भागो में विभक्त किया है। जसे कि आतंध्यान, रौद्र ध्यान, धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान ये शब्द इतने मनोवैज्ञानिक एवं श्रध्यात्म-पथ प्रंदर्शक है (कि इनके अपनाए विना पतजलि भी 'नहीं रह सके उन्होने इन्ही शब्दो को कुछ परिवर्तत के'साथ अ्पनायों हैं आतंध्यान और रौद्र व्यान, अशुभ ध्यान हैं, ग्रत इन्हे योगदर्गन कृष्ण कहता हैं और धर्म-व्यान और शुक्ल ध्यान शुभ है इन्हे शुक्ल कहा गया हैँ और आत्मा को अशुक्‍्ल अक्ृष्ण कहा गया है (योग० ४७) योगदर्शन में ध्यान की विस्तत परिभाषाएं है, उसके क्रमिक विकास पर अच्छा प्रकाश डाला गया है, किन्तु ध्येय- स्थिरता के लिये ध्येय का विवेचन नगण्य सा रहा 'है। योगी व्यान की एकतानता तक पहुचने के लिये क्‍या करे ? इसका विवेचन वहां सामान्य सा ही है-जैसे प्रणव अर्थात्‌ #कार के घ्यान के साथ “तज्ञपस्तदर्थ-भावनस्‌” (योग० १२८) कह कर * के जप और अर्थ की' भावना भाने के लिये कहा गया है, किन्तु इतने माँत्र से व्यान की' एकतानता असम्भव है हेमचन्द्राचार्य जी ने भी अपने योगंशास्त्र मे इस विषय पर

योग ; एक चिन्तन “] [ 'उन्नीस

विज्वेप प्रकाश नहीं उाला, झन्‍्हींने भी ध्यान नसझ् पद्लन के सावना-मार्ग का वित्तत विवेचन किया है किससे व्यास एकतानता के लिये दाछ प्रदर्णित नहीं विया।

प्रस्तत पुस्तक में उपाध्याय श्री श्रमण जी महाराज ने ध्यान की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन करते हुए ध्येय की भी ब्व्तिस व्याख्या की है पिण्डग्थ घर्म-ध्यान, परदस्य प्रम॑-ध्यान, दपस्थ- धर्म-ध्यान और छपातीत-घर्म-ध्यान की व्यार॒या के माध्यम से ध्यान की विधि का जो वर्गन किया है उसको जानकर कोई भी साधक ध्यान का पूर्ण अभ्यास कर सकता है। शुस्‍ल व्यान की व्याख्या में योगदर्शन के कैवल्यपाद का सम्रस्त विपय संक्षेतर से बुद्धिम्य हो जाता है) योगदर्शन की सवितरक-समाधि शौर अवितर्क-समात्रि चाहे समझ में श्ाए, किन्तु प्रस्तुत पुस्तक के के द्वारा शुक्लध्यान के अन्तर्गत पृथद॒त्व-सविचारी, पृथक्त्व- आविचारी, सृक्ष्म-क्रिया-अनिवर्ती, समुच्छिन्न-क्रिया-अ्प्रतिपाती-- इन चार पदो की व्यास्या समाधि को सहज गम्य बना देतो हैं

तन्त्रशास्त्र में ध्यान के चार भेदों का वणन किया गया है-- वबखरी, मध्यमा, पश्यन्ती श्रौर परा

वेखरी--अन्तर के झ्रानन्द को वाणी द्वारा प्रकट करना

मध्यमा--पश्रन्तर के शानन्द्र को कुछ वाणी द्वारा व्यक्त करना और कुछ भीतर ही रहने देना

पश्यन्ती - यही ध्यान की श्रवस्था है इसमें योगी उसे देखता हैं जो.उसका अपना स्वरूप है, जिस स्वरूप से अष्ट होकर वह बाह्य ससार में उलझन गया है, यही से चेतना को प्रकाशमणी घारा फूटकर आत्मा को सर्वज्ञता की ओर उन्पुख करती

बीस | [ योग ; एक चिन्तन

- प्रा-यह वही अवस्था है जो सबसे परे है, जितके ग्रागे कुछ नहीं, सब पीछे ही छूट जाता है, केंषाय- मुक्त, अयोगी केवली अ्रवृ्था ही ध्यान को परा अवस्था है

मैं समझता हू तन्‍त्र भी जैन दर्शन से प्रभावित हुआ होंगा। उसमे नौवे गुणस्थान से लेकर ते रहवे गुण स्थान तक को स्थितियों को ही वेखरी भ्रादि ताम देकर ध्यान की विवेचन किया गया है

- बस्तुत, योग” अनेक साधनाग्रों का जोड हैं। इसमें उन अनेक साधनाओ का ही बत्तीस योगो के विवेचन के रूप में ऋमिक विकास प्रदर्शित किया गया है।

धोगासन--

यद्यपि साथ योगियो ते हठबोग को अपनाते हुए चौरासी आसनो का वर्णन किया है, जैसे प्मासन, भद्ठासन, शवासन, हलांसन, उत्तांनपाद आसन, चीरासत, स्वस्तिकासन, गीदुहसन, कुक्कुटासन, हस्तिनिपन्दन आदि नाथो ने श्रात्मतत्व की अपेक्षा ग॒रीर साधना को विभेष महत्त्व दिया हैं, किन्तु यह स्मरणीय है कि आत्मतत्त्व-शरीर से सर्वथा मिन्न है, शरीर निवास हू और आत्मा निवासी है। निवासी निवास चाहता हैं, वह झोपड़ी मे, कच्चे मकान मे, हवेली मे, कोठी में, मर्देल में जहीं भी उसे सुख मिले वही रह सकता है वस्तुत, मन- विपरीतता से ही प्रसन्न होवा है, झोपडी वाला महल में जाकर श्रसन्न होता हैं, किन्तु महलो वाले राजा-महाराजा झोपडियो मे जाकर साधना करते देखे जाते हैं। वनवासी नगरो में आकर और नगरवासी वनो में जाकर सुख की अनुभूति करते है वस्तुत सुल्ल महल मे है, त॑

धो

योग एक चिन्तन ] [ इबकीस

झोपडी में है, नगर में है, वन में है। सुख की प्रतीति तो वदलाव मे होती है

शरीर से सम्बन्ध तोडकर आत्मा से सम्बन्ध जोडने में योग की पूर्णता है, जव योग शरीर से सम्बन्ध ही तोड देता है तो उसे शरीर की अपेक्षा ही चही रह जातो, फिर गारीरिक मुद्राओ की--बासनो की वह अपेक्षा क्यो रखेगा ? ज्ञान की प्राप्ति श्रासनों पर ही निर्भर होती तो वह सरकसवालो को ज्ञीज्र प्राप्त हो जाता, क्योकि वहा एक हीं कलाकार ग्रनेक असाध्य असनो का प्रदर्गत करता है |

तीथेडूरों और महा साधको ने विभिन्न श्रासनों में वेठकर ज्ञानोपलब्वि की है भगवान्‌ महावीर गोदुहासन मे बैठ कर ज्ञान प्राप्त करते हैं। गजसुकुमाल कायोत्सगं मुद्रा मे ज्ञान प्राप्त करते हैं वस्तुत “आसन का कोई महत्त्व नही है इसीलिये पतश्चलि ने कहा 'तत्न व्थिर सुखमासनम्‌ --जिसमे शरीद सुखपू्वक अ्रव- स्थिति प्राप्त करे वही ग्रासन है

यही कारण हैं पत््जलि ने योगासनों की व्याख्या नहीं की योगनिण्ठ श्री श्रमण जी महाराज ने भी प्रस्तुत ग्रन्थ मे आासनों को महत्त्व नही दिया, उसका वर्णन आवश्यक नही समझा

उपाध्याय श्रमण श्री फूलचन्द्र जी स्वयं योगी है, योगनिष्ठ महा|पुरुष है, योग-साधना उनकी भ्रन्त -अनुभूत्ति है, उसी अनुभूति को उन्होने शब्दात्मक रूप देकर साधको और जैन सस्क्ृति के जिन्ञासुओ पर महान्‌ उपकार किया है। उनका यह उपकार सर्वे-जन-मगलकारी हो यही मेरी भावना है कक

थ्वाईस | | योग . एक चिन्तन

हक भू

योग एक चिन्तन ]

(क) वत्तीस योग (ख) योग-प्रवेण

१? आलोचना

निरवलावे निरफलाप ३. हदृढ्धमंता

अनिश्चितोपंघान शिक्षा

६, निष्प्रतिकर्मता अज्ञातता

थे अलोभ

£ तितलिक्षा

| तेईस

9० आजंव ' ३९ हर

१५ शात्रि 4 2० सम्यःडंष्टि ८८ 23 समाधि प्र .... १४ आचार ॥औ 9५ विनयोपेत ध्द १६ वृतिमति य््० ५७ सबेग य्र १८ प्रणिधि . झोडे १६ सुविधि ०३० २० सवर पड २१ गआात्म-दोपोपसहार 9०३ . सर्व-काम विरक्तता 2०६ २३ मुलगुण-प्रत्याख्यान १2० " २४ उन्तरग॒ण-प्रत्याख्यान 23४५ २५ ब्यूत्तग्र . १५० २६ अश्रप्नघाद 9५३ २७ लवालव १५७ श्८ष वध्यान-सवरस्-पोग १६३ २६. उदय मारणान्तिक 9६५ गा ३० सग-परित्याग १६७ | ३१ प्रायश्वित्त-करण २०० ३० मारणान्तिके आराधना शू०प (के) परिणिष्ट (मानव-धर्म ) २३६ " (ख) देवीं सम्पत्ति २५४५ 'वीवीस ] योग एक चिन्तन

परे/+स+त ७८८2 ४2५ 3:८० ९-८ >८४५००० ८५५०५ 3९६५४ द्प्र&:२८४६ २१०४५ ०४.२४ “ही ४०४५४: ८८५६८... .००८८८६

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. जन-चधर्म-दिवाकर पंजाब प्रवर्तक उपाध्याय अमण श्री फूलचन्द्र गीं महारान

नमोउन्चू णं समणस्स भगवपभ्नो महावीरस्स

योग : एक चिन्तन

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वत्तीस जोग-संगहा पण्णत्ता, त॑ जहा :-- आलोयण निरवलावे, आवईस डढ्धम्मया | अभिस्सिओवहाणे य, सिक्‍्खा निष्पडिकम्मया १॥ अण्णायया अनोभे य, तितिक्खा अज्जवे सुई सम्मदिदी समाही य, जायारे विणओबेए ॥२॥ धिइमई ये सवेगे, पणिह्दी सुविहि-सवरे अत्तदोसोव - सहारे, सब्वकाम-विरत्तया ॥३॥

पच्चचखाणं विउसगे, अप्पमादे लवालवे आप-सव र-जोगे य, उदय मरणतिए ॥४)॥॥ सगाण परिण्णाया, पायच्छित्त करणें वि आराहणाए मरणते, बत्तीस जोग - सगहा ॥५॥। (समवायाज़ सूत्र, वत्तीसवां समवाय ) योग एक चिन्तन ] [१

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बत्तीस योग

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उपर्यक्त पाच गाथाओ का सक्षिप्त अर्थ इस प्रकार है जैसे कि :-- शिष्य द्वारा गुरु के समक्ष अपने दोपो को निवेदन करना

श्षिष्य द्वारा आलोचित दोपों को किसी के समक्ष प्रकट करना |

$ आपत्ति के सम्रय धर्म मे हृढता रखना

ब्िना किसी सहायक के तप करना या केवल निर्जरा के उद्देध्य से तप करना

ग्रागमी का अध्ययन और अव्यापन या सयम-पालत की रीति सीखना

शरीर की सार-संभाल नही करना

श्रपती तप.-साधना को गुप्त रखना

« किसी के द्वारा दिये गए प्रलोभन मे आना। परीधह-कणष्ट आदि सहन करने का श्रभ्यास करना मन, वाणी और काया के व्यापा रो मे एकरूपता रखना जचि भ्र्थात्‌ सत्य और सयम को अपनाना

- सम्यग्दर्गन की विगृद्धि के लिये प्रयास करना |

[,योग , एक चिन्तन

१३ शरीर को स्वस्थ, वाणी को पवित्र और मन को एकाग्र रखना

१४ नि णलल्‍्य होकर पांच भ्राचारो का पालन करना

१५ बिनीत बनना--मान रहित होना

१६ सब तरह की दीवता से रहित होकर धरर्य-सम्पन्न होना ही बृति-मति है

१७ कर्म-वन्दन से मुक्त होने की अभिलापा रखना

१८ सयम और त्तप में कपट ने करना

१६९, विधि-पूर्वक सद-अनुप्ठान करना

२०. सवर अर्थात्‌ सभी श्राश्रवों का निरोध करना

२१ आात्मगत दोपो को दूर करने का प्रयास करना

२२ इनच्द्रियों के सभी विपयो से विमुख होना, श्रर्थात्‌ सर्व-काम- विरक्तता को जीवन मे उत्तारता .

२३ मूलगृण-प्रत्यास्यान अर्थात्‌ जिस त्वाय से मूलगुण विकसित हो ऐसा भ्राचरण करना।

२४. उत्तरगूण प्रत्यास्यान, अर्थात्‌ उत्तरगुण के वाधक दोपो का त्याग करना

२४ च्युत्सग अर्थात्‌ कायोत्समें का श्रभ्यात्त करना

२६. आध्यात्मिक साधना मे क्षण मात्र भी प्रमाद करना

२७ जीवन के प्रत्येक्ष क्षण मे समाचारी का पालन करना

२८. घर्मे-ध्यान हारा योगो का भिरोध करना, ध्यान सवर-योग है

]

योग . एक विस्तन | [४

२६ मृत्यु के निकट आने पर भी मृत्यु-भय से छ्ुब्ब होना

३० समतत्याग, अब्र्थात्‌ जिन कारणों से रागद्व उत्पन्त हो उन कारणो का त्याग करना।

३१ किसी भी छोटे-वडे दोप की निवृत्ति के लिए प्रायश्रित्त करना।

३२ शरीर और कपायो को क्षीण करने के लिये सलेखना एवं सथारा करना |

समवायाज़्-सूत्र मे उपयुक्त चत्तीस योगो का निर्देश किया गया है। हम आगामी अ्रध्यायों मे इन बत्तीस योगो की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे

| योग एक चिन्तन

% $ <- ९१ $९+ योग-प्रवेश 4$%%< कक कै ९४३? जैन दर्शन वह नन्‍्दन-वन है जिसमे विहरण और विचरण करने से मानव की सभो श्रान्तिया दूर हो कर ज्ञान-पिपासा शान्त हो जाती है जैसे सूर्य के उदित होने पर अन्धकार स्वत हो नष्ट हो जाता है, वेसे ही इस ननन्‍्दन-वन मे पहुचकर सभी शकाए गनायास ही निमू हो जाती हैं

ग्रात्मा मे अनन्त ज्ञान है, उसे जानावरणीय कमें-प्रकृतियो ने ढाक रखा है। ज्ञानावरणीय कर्म का जितने-जितने अंश मे क्षयो- पद्मम, होता जाता है, उतना-उतना ज्ञान विकसित होता जाता है जो ज्ञान स्व-पर प्रकाशक है एवं निब्चयात्मक है, वही ज्ञान प्रामा- णिक माना जाता है। जैसे दीपक या सूर्य को देखने के लिये किसी अन्य दीपक या सूर्य को पश्रावश्यकता नही रहती, दीपक भ्रौर सूर्य स्वय प्रकाशमान तो है ही, साथ ही वे दूसरे पदार्थों को भी प्रकाशित करते हैं। वसे ही ज्ञानी प्रात्मतत्त्व को तो जान ही लेता है साथ ही वह अन्य लोगो को भी ज्ञानालोक से आलोकित कर देता है

मानव को दो प्रकार से ज्ञान की प्राण्ति होती है, स्वत , आर सनन्‍्तो-एवं गुरुजनो के उपदेश से ज्ञान-प्राप्ति के उपादान और निरमित्त ये दो कारण सहायक माने गए है। इनमे ज्ञान-प्राप्ति के ' लिये उपादान कारण का होता अनिवार्य है, किन्तु निभित्त का होना

योग एक चिन्तन ] !४

अनिवार्य नही मानव अपने ही अनुभव एवं सूनन-वूझ से जो ज्ञान प्राप्त करता है, वही ज्ञान स्वत होने वाला जान कहलाता है और उसमे उपादान की ही मुख्यता रहती है। निमित्त वही कहलाता है जो उपादान के अ्रनुरृष हो। उदाहरण के रूप में जंसे नेत्रज्योतिः जितने भरत से होती है उसके अनुरूप ही यदि चश्मा (उपनेत्र) हो तो वह देखने मे सहायक होता है न्यून-अधिक तम्बरो वाला चश्मा देखते में सेहायक नही वतन सकता ग्रुरु और बास्त्र ये सब ज्ञान की वाह्य सांमग्रिया है-मिमित्त हैं। जो ज्ञान किसी गुरु से उपदेश सुन कर या शास्त्र पढ कर होता है वह ज्ञान नेमित्तिक कहलाता है, श्रर्थात्‌ वह जान किसी वाद्य निर्मित्त से होता है, भ्रत वह ज्ञान परोपदिष्ट माना जाता है। जब तक उपादान कारण तेयार नही हो जाता, त्तव तक सभी निमित्त श्रकिचित्कर रहते हैं

गवधि-नाव, मन.पर्यव-ज्ञान और केवल जान इनके उत्पन्न होने मे वाह्य मिमित्त की आवच्यकता नहीं होती, श्रत ये तीन ज्ञान स्वत ही उत्पन्न होते हैं, ये विमित्त-जन्य नहीं होते। मति- ज्ञान शोर श्रुतज्ञान में दोनों कारण विद्यमान रहते है, श्रत वे स्वत भी होते हैं और वाह्मय निमित्त से भी हुआ करते है| इन्द्रियों हारा जो जान उत्पन्न होता है, वह प्राय निित्तजन्य ही होता हैं। मतिज्ञान और श्रुतनान का अच्तर्भाव परोक्ष प्रमाण मे होता है

प्रत्यक्ष प्रमाण के दो भेद है सकल प्रत्यक्ष और विकल प्रत्यक्ष केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष है और अवधिनान तथा मन पर्यवज्ञान थे दोनो ज्ञान विकल प्रत्यक्षे है। प्रत्यक्ष प्रमाण में उपादान की मुख्यता होती है, निमित्त की गौणता, जब कि परोक्ष प्रमाण में निर्मित्त की प्रधानता रहती है और उपादान कारण गौण रहता है

5 [ योग : एक चिन्तन

सम्यर्दर्गेन प्वेक्त सम्यस्ज्ञान हुआ करता है, सम्यग्शान वही है जो यथार्थ एवं स्व-पर के लिए हितकर एवं पलेयरकर होता है, वह ज्ञान ज्ञानी को ससार और ससार में आवागमन के सभी कारणों से वचात्ता है, मोक्ष और मोक्ष के साधनो मे प्रव॒त्ति कराता है। इसी कारण उस ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहा जाता है।

सम्यग्ज्ञान होने पर ही सम्यक-चारित्र की आराधना की जाती है, इस सम्यक्‌ चारित्र का अंतर्भाव योग में ही हो जाता है

यद्यपि योग शब्द अनेक श्रर्थो का वोधक है जैसे कि गणित में दो से अधिक राशियो के जोड को योग कहा जाता है, ज्योतिष-शास्त्र मे नक्षत्र एव राशि आदि की विभेष फलदायिनी युति ही योग है। तिथि-वार और नक्षत्र के मेल से श्रानन्द आदि योगो का होना योग माना जाता है। किसी शुभ काल के लिए भी योग शब्द का प्रयोग होता है। श्ननेक औषधियो के समिश्रण की विधि को भी योग कहते हैं। मन, वचन श्रौर काया की जशुभ या अ्रशुभ प्रवृत्ति को भी जेन परिभाषा मे योग कहा जाता है, परन्तु यहा योग शब्द का इष्ट अर्थ सम्यक चारित्र ही है श्रात्म-कल्याण के जितने भी सफल साधन है वे सब योग हैं। जिस घ्यान द्वारा ध्याता का सबच्ध ध्येय के साथ जुड जाए बह योग है, श्रर्थात्‌ चित्ते को एकाग्र करने के सभी विधि विधान योग हैं, अर्थात्‌ कर्म-वघ से मुक्त होने के जितने भी चिधि-विधान है उन सबका भ्रन्तर्भाव योग में ही हो जाता है। ऐसे विधि-विधानो की सख्या वत्तीस निर्धारित की गई है इसी कारण उन्हे द्वात्रिशत्‌- योग-सप्रह कहा गया है। साधना जीवन की वह मस्ती है जिस मे भीतिक सुख-दुख का भान ही नहीं रहता। मन जब योग के केन्द्र मे पहुच जाता है तब मन में उत्पन्न होने वाले सभी

योग एक चिन्तन ] [

विकार और विचार स्वत्त ही लुप्त होने लगते है। मन शरीर इन्द्रियां स्वयमेव श्रात्मा के व्ीभृत हो जाती हैं। जान का श्रखण्ड प्रकाभ-पु सदा के लिए जगमगा उठता है, आत्मा सव तरह से कृतक्ृत्य होकर परमात्म-पद को प्राप्व कर लेता है, फिर उस केलिये कुछ प्राप्त करना थेष नहीं रह जाता। वह श्रपर्ण से पूर्ण वन जाता है, उसक्री चेतना और आनन्द ये दोनो ससीम से असीम वन जाते हैं। इतना ही नहीं आत्मा के सभी गुण असीम हो उठते है

८] [ योग ; एक चिन्तन

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१. आलोचना

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श्रालोचना- उपयु क्त वत्तीस योगों मे सब से पहला योग है--आलोयणा--भलोचना आलोचना शब्द का शाव्दिक अर्थ है चारो शोर अ्रच्छी प्रकार देखना, श्रर्थात्‌ किसी वरतु के गुण-दोषो पर विचार करना या उनका निरूपण करना इसका भ्रथ'बतलाना भी है, अतएवं प्रायश्चित्त के लिए अपने द्वारा किए हुए दोषो को निष्कपट भाव से गुरु के समक्ष बतलाना आलोचना कहलाती है। माया से सभी दोप छिपाये जाते हैं श्रोर निष्कपटता से उन्हे प्रकट किया जाता है। जब कोई भी वस्तु किसी दोष से दृषित हो जाती है, तब उसका मूल्य गिर जाता है, वेसे ही जब किसी साधक की साधना दोपो से दृषित हो जाती है तब उसकी साधना का स्तर भी गिर जाता है

. दोष को शास्त्रीय भाषा मे प्रतिसिवना भी कहते है। दोष कृत भी होते है और अकृृत भी हीरे, जवाहरात, मणि-मोती ग्रादि पदार्थों मे जो दोष पाया जाता है वह अक्ृत दोष है साधकों मे कुछ जन्मजात दोप होते हैं और कुछ कृत दोष भी होते हैं, किन्तु _ प्रतिसिवना कृत की ही होती है अकृत की नही, क्योकि प्रतिसेवना का ग्र्थ है--निषिद्ध वस्तु का सेवन या श्राज्ञा-विरुद्ध काये करना कोई भी साधक अपनी साधना को दृषित करने के लिए तैयार नही होता, प्रत्येक दृष्टि से वह श्रपत्ती साधना को शुद्ध रखने के

योग , एक चिन्तन | [९

लिए प्रयास करता है, किन्तु कभी-कभी उसके सामने कुछ ऐसी विवशताए एवं परिस्थितिया श्रा जाती है जिनसे साधक की साधना प्रतिसिवना के सामने घुटने टेक देती है प्रतिसेवना के मूल कारण दस है जसे कि--

(क) दर्ष--प्रभिमान के वशीभूत होकर अपने साथना-पथ के नियम-उपनियमो की उपेक्षा करना एवं निपिद्ध कार्य करना, दर्प- प्रतिसेवना है इससे झूठ भी बोला जा सकता है, किसी को पीडित भी किया जा सकता है तथा किसी पुज्य की आशातना भी की जा सकती है

(ख) प्रमाद--नजणीली वस्तुओं का उपयोग करना, विलासता से, विकथा करने से, कपाय भाव से, अतिनिद्रा से,' धर्म-निरपेक्ष जीवन से, अ्सावधानी से, अयतना प्रादि से जो दोप लगते हैं उनका समावेश प्रमाद में हो ही जाता है। प्रमाद में कोई भी महा- ब्रत सुरक्षित नही रह पाता प्रमाद सयम को तो दूषित करता ही है, साथ ही ज्ञान एवं दर्शन को भी दृपित कर देता है इसी को प्रमाद-प्रतिसिवना कहा गया है

(गे) श्रनाभोग--अ्रनजाने मे, बिना उपयोग के जिस दोप का सेवन किया जाय वह अवाभोग प्रतिसेवना है जिस दोप का जान साधक को हो पर वह हो जाय तो बह दोप इसी कोटि में समा- विप्ट होता है।

(घ) श्रात्र--जब कोई साधक किसी पीड़ा एवं विषम परिस्थिति से अ्रश्चीर हो जाता है, तव उसे श्रातुर कहा जाता है। प्रत्येक श्रातुर की स्थिति भिन्‍न हुआ करती है। जैसे कि कामातुर व्यक्ति मे किसी का भय होता है और लज्जा ही, चिन्तातुर

१. निहु बहमण्णेज्जा |

९० ] [योग एक चिन्तन

को सुख है निद्रा है, जो श्र्थातुर है वह बन्बचु की परवाह करता है और मित्र की, जो क्षुधातुर है उसका गरीर शिथिल औ्रौर विवेक लुप्त हो जाता है भौर उसकी शक्ति क्षीण पड जाती है अभिप्राय यह कि किसी भी तरह की श्राधि-व्याधिि से व्यथित व्यक्ति आतुर कहलाता है।

(ड) आपत्ति-प्रार्पत्ति चार प्रकार की होती है-द्रव्यापत्ति, क्षेत्रापत्ति, कालापत्ति और भावापत्ति

प्रासुक एपणीय एवं जीवनोपयोगी पात्र, वस्त्र, एवं श्रावास आदि का मिलना द्रव्यापत्ति है। निर्घन व्यक्ति द्रव्य के श्रभाव में तरह-तरह के दोपो का सेवन