कक कल # .2., कक का. ब्यषुरन- पे टबप८

श्रीकृष्णाय नमः

* 3... न्‍न्‍५नसनमनन- खो

हे

जता ऋ,अा अधक ऑऔसा पअऊया

5 लक पु 5 कक) कर चल कप हे न्क है द् 2 अंक २०, ने आहत पति भा सन्‍तरा कक कक पट किद+ कप जता "दलित आलम कक गया. कर ॥- तप वयानफ<-पहजन अधका- करन... ओके प्यकाअकया: . आक अेवआ... की + पकऋओ #+- + +

विविधग्रन्थानां लेखकेन रिसच रमकालर इत्युपाये- धारणा पॉडतवस्यण माथवाचार्स्पण संपादितया कर ऊे भाषाराकया चर समलकत: ६०) !

+. 3

>. की अर हर अयि चल

किक

क्र, डक. उस बुक कक म्ज़ है र्डं हा ब्याज 5 शीश क््फा सक

>>

का बल जे 35

मद सन क्र

ला 5 हे पे ३० ->-क है कि

हि...

९७५३... नें 4

रू सब >-त 3 ग्रे युचर अल

बज

ड़ जिस्वना5

च्च ३]

च्च्फे है हि.

इज कक, ध्य 5 अति के कक - मह

लक, कड़ी >

जी जा

रू

दम

रे 7 4 कै गे पे रू हा फाओ

ज़ की ्रँ है | न्‍ कि की. थे कफल कल रा प्‌ + # # +/ ५४ ३, .७॥ + 65४ ५. $ आउ(7६ 67। है छओ्दी/शाक भीम! 7.2 त्कपरर 4 री 45 है. 48. फट... बट फलों क्र पे 96 87 :4हलक एह ३७४४ वेद 99, % 7 2 5 0 “, हक / ५. , ही ५05 20008 2५2५ की गा थ् + नि हा « अफणजग कप, हा कट्राएऋ की १, ता तक हि. कि तू * हीं, '् कह वह बा 2 ! अं 2] $ प्क कक, हा नली जी १४०७ 2 + मु बह रा खां हा ली अनछु री खल्वी 4 हे चिफनको, १7 प्िटक७ की; * , ४7 ६९ शिया हे कॉलर कि. आग दी «हों,

मुद्रक और प्रकाशक-

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष-" श्रीवेड्डंटिश्वर !! स्टीम-प्रम, बस्बई

सन्‌ १८६८ के आक्ट २५ के अनुसार रजि्टरी सब इक प्रकाशकने अपने ्ाधीन रकबा है

पस्तावना.

७७" आए

अखिछ विश्वके सारे मानव समाजोंपर दृष्टि डांडकर देखढीजिए, आधुनिक और प्राचीन सभ्यताओंपर पूरा विचार .._ कर छीजिए, भूमण्डछके किसीभी छोटेसे छोटे और बढेसे बडे खण्डको के छीजिए चाहें असभ्य कहडछानेंवाले नरोंकाही अभूह क्यों दो ? कोइ भी समुदाय एवं संप्रदाय ब्रतों और उ्सवोसे खाली नहीं है, अपने ढंगके सभी उत्सव मनाते हैं और त्रत करते हूं ब्रतोंकी महिसा वेदनेभी बडे ही आदरके साथ गाई है, त्रत करनेवाला सुयोग्य पुरुष जगदीशस्से प्राथना करता हैं कि- अग्नेमप्तपते बे चरिष्पामि ततच्छकेयम्‌ , तन्‍्मे राध्यताम्‌ , इदमहमन तात्स-

तव्यम्नुऐेमे ' हे ब्रत्ेंके अधिपते | सबसे बडे परमास्मन ! में व्रत करूंगा, ऐसी मेंरी इच्छा है में उस बतको पूरा करम्कूं , यह मुझ शक्ति दीजिए यह शो ब्रतकर्ताकी ब्रतार॒म्भसे पहिढका बीत हैं कि, वह ब्रतके पूरा करनेसे मेरा कल्याण होगा इस्र भावनासे प्रेरित होकर उसकी सफछलाक छिए परमात्मासे प्राथना करता हें जब वह घतनिष्ठ होजाता है तो उस काछमें सत्य मानता हैं. कि, में अपने जीवनके अमूल्य समयको वृथा द्वी नष्ट कर रहा था उससे अब विरत होकर सच्चे

उपयोगकी ओर जाता हूँ। जितना में ब्रतमें समय लगाऊंगा वही सच्चा समय हैं, बाकी तो अनूत यानी झूठा उपयोग है

उससे जीवनकी कोई साथकता नहीं होती यह हे त्रतपर दिकोंका विश्वास:कि, ब्रव ही सच्चा जीवन बनाता है यही कारण है कि, किवमीदही ऋगूवेदकी ऋषाओंमें अत्यन्त सम्मानके साथ ब्रव] शब्दका उल्लेख; किया है- आदित्य

शिक्षीत प्रलेन, वयमादित्य ब्ले, जन्‍्मनि ब्रते, पत्नो अभिरक्षाति ब्रतम्‌, अपामपि ब्रते ऋगूवेद भन्त्रोंके वे थोढेस टुकडेभी दिखा दिये हैं जिनमें श्रत शष्दुका प्रयोग परिर्फुट दीख रहा है हाब्दके अथेका विचार तो निरक्तम किया गया है | इसे महर्षि यास्क ने कमके पर्य्पायोंमें रखा है, इसी कारण ही

है कि, प्रद एक कसे विशेष दी है वृ८"घातुसे छणा।टि धू प्रत्यय होकर प्रत शब्द बनता है निरुक्तकारनें इसक विवरण बृणोलि पदसे किया है कि, जो कमे कत' &ो बूत करें वह ब्रत है। दूसरा विवरण-उन्होंने वारयरि पदसे दिया है कि, जो भपनेग्रें प्रवृत्त हुए पुरुषकों ख्री आदिं अपचारोंस रोकता है, यह नियम कराता है, एवं अतेकों विपिड़ कर्मोंसे रोकता है; लिन्हेँ कि, परिभाषाप्रकरणमें श्रतराजने गिन कर समझाया है | यदि विचार करके देखा ज्ञाय तो निरुक्तकारके दोनों अथे ब्रतराजके श्रतपर घटत हैं। यह एक तरहइके सकस्पविशेषको श्रत कद्दता हैं, इस हल* राजके प्रतछे अथेपर गद्दरी दृष्टिस विचार किया जाय तो दोनोंक़े अथैका स्वारस्थ एकद्दी दोता हे। महर्षि यास्‍्कके अर्थ उसका कोई मी वास्तविक भेद नहीं रहजाता | श्रतराजकारका अर्थ कमके पदार्थंस्र किसी भी अश्र्मे बाहर नदी .. जा सकता, ब्रतियोंके सामान्य धर्मों तथा उपवासके धर्मोर्में विस्तारके ख्राथ वे पंद्वार्थ लिखे हुए हैं; जो कि, उन्हें करने और छोडने चाहिये निषिद्ध कर्मांका रोकनेवाठा बत ही ह। क्योंकि, उनके करमेमें त्रतीको ब्तके भंग होनेंका पूर इसा है इसी कारण वह उनको नहीं करता | इस तरह यह्‌ प्रत, त्रतीका वारक भी सिद्ध होता है तथा इसका

फछ त्रवकर्ताकों प्राप्त द्ोता दे इसके सविधि पूणे दोनेंम उसकी उन्नति तथा खंडित करनेस प्रय्यवायकी प्राप्ति होती है इस तरह यद्द पाप और पुण्य दोनोंदी फरलोंका देनेवाछा भी है अत एवं दूसरा भी निरुक्तकारका अथ ब्रतराजके

304४ पक्के जप३ ३मक तक बाई

इष्टिपथम पैर समाया हुआ थी। यद्यपि उन्होंने उत्सव शब्दका बहुत कम प्रयोग किया है पर उत्सर एक भी इनसे नहीं बचा दे त्यौद्ारोंको इन्होंने ब्रतके कहा है और भिन्न भी प्रति पादन सकटपतुर्थी श्रादि जिनमें केवछ उतस्सवक साथ देव पूजन भादि भी किए जाते है। बहुतसे उं त्खवोंक पढ्ेख ही कर दिया है जो केवछ ब्रतका भथे उपवास समझते हूँ उन्हें यह आंति होजाती है. कि आजायंगे पर पूर्वोक्त अथोम तो छत्सव भी ब्रतोम ही आजाते हैं कितनी दी जगह ब्रतोंकी पूज

कलेप्यश्व महोत्सवः३ बढा भारी इत्सव करना चाहिए। इस तरद्द अनेकों उत्सवरों

होजाता है; वे भी ब्॒तोंमें ही भाजावे हैं। जो जाति जितनी दी नई होती है उधके उत्सव उ8 हस्खदों का सम्घन्ध, उस जातिके गणय मान्य विशिष्ट पुरुषों क्री अलधारण महत्त्तपूणे घटना?

ही सम्माभकी ट|

हिंसे देखनेवाडे समुदाय उत्सवोंकों जन्म दे देती हैं। समय रे पर इस्छ

४7204: शो 7 2 7%:52:

4 2802252 80650 50000:

2 पल जन एक नरक पक अकाल ५29५-3५ नल 392: ++क ०-५5 कप ध5७ आ+ 22060 00000 7 /00000000/770/000 007 कल आय मभआा।७००७ ७७०० बा 30 00,052 202000000 00200 780 00000, 44 कह ७७0॥७॥॥७॥७७॥७॥७॥७॥॥७७ ०७ शतक, हा]

४ल्‍७७४७७७७७॥७७७४३७/७४ आए:

५2

लिया करते ह। किन्तु उसका जन्म थोड़े स्मयका होनेके कारण उन घटनाओंकी संख्याके कम होनेसे उनके उत्तय + . कम डुआ करते हैं। यही कारण हैं कि, चार छः हजार वर्ष मात्रकी जनमी हुई जातियोंके उत्सव इसने ही कम हैं. कि उनकी स्रेख्या डेगलियोंबर ही गिनी जा ख्रकती है ।, अत एवं उन जातियोंकों उनका ज्ञान अनासास ही है उनके हरि हासका झ्ञान करनेके छिए इन्हें कोई कष्ट नहीं उठाना पढ़ता | उनके अबोध बाछक आपही आप अपने बढ़े बुढ़ों बातों बातोंनें ही सुनकर जान जाते हैं पर जिप्न जातिको संसतारकी सभी जातियां अपनेस भव्यन्त आाषीन भा गेक नवमस्तक होती हैं, जिसका इतिद्वास ढाम्ों वर्षका पुराना माना जाता हैं, जो अपनेकों अमादि सनातन एवम श्वा मानवसमाजको सभ्यता सिखानेवाढ्ा गुरु कहटतौ हे. जिसके अनेकों दी विशिष्ट पुदभोंकी घटना विशेषोध् संत सत्सः

भौर ब्त इतने कम नहीं हैं नो कि आधुनिक जातियोंके उत्सवों और ब्रतोंकी तरह अगुद्धियोंपर सेभाओ जा सडक ;

वह ऐशस्री किसी साधारणकी बात॒क्नो छूकर प्रज्नछ्चितद्दौ हुए हैं जो कि ) बातोंसे ही बता दिय जाये ले बढ जवण्य महत्त्वहीनही हैं जो कि, उपेक्षाके गड्ढेमें गेरकर बूर देने योग्य हों प्रत्यककी स्मृति जातिमे नवीन जीवन, रे हरएकके साथ जातिके गौरवकी मात्राएं णत्यम्त प्रचुरताक स्राथ छगी हुईं हैं। पूव पुरुषों ॥। गौरवाग्प इतिहास इन साथ मिद्धा हुआ है उनकी अ्रद्धाकी अमृश्य कहानी मिली हुई हे जिस अद्धाको योग भाप्यकार कं राव + आा3,

कहा हे इनका स्मृतियोंने सादर स्मरण किया है इतिहास प्रन्थोंने इनका सौरवॉकी गरियारी ओोपझिक (वा परावृ विस्तारके साथ गाया हे पुराणोंने इनका हर जगद्द उल्लेख करके इनकी प्राचीनवाकी 7न्‍्द भि बजाई

है जँ।क थे; नौ. आष॑ ग्रन्धोंमें रत्नोंकी तरह उचित स्थरूोंपर पुवेहुए इन अतोत्सब्रोंका अनेकों पर्मशास्रकारोंत भ्रपनी अपनी शक्ति अनुसार संभह किया है | फिर भी रनसे बहुतस्रे बाकी बच गये हैं क्योंकि, जो सृष्टिक आरंभकामी उस्ताव बत कर+ हूँ उनके ब्रद्मादिकोंका पता विता अक्षौकिक साधनोंके कहाँस मिठसकता है ? जातिके चधके हुए खिना। १, (३... * आबाल बुद्ध वनिताओंतक व्याप्त थे इस्र गिरे समयके संग्रह कारोंको इन्हें हिन्दृपमशाख्रोंसि मद. लि 0 05१ / यही कारण हे कि, पूरा नहीं कह पाय है। फिर भी इनका परिश्रम अगण्य नहीं है उन्होंने अवध पी , 5, >्वाहिबाँब। भपमी संप्रहकौ हुई निधि देकर एन्‍्हें अगाड़ी बढनेके लिए उत्साहित किया है। अनराजक छेखफ़को इस पुराने अप्रट अच्छी सहायता मिली हे तथा बहुतस्री नृशन खोज करके इस कमीको पूरा कर दिया है। («. ४! अदौौप भा्ेएढ विश्वनाथशर्म्मा आजसे दोसौ वर्षके छगभग पहिले हुए थे, आपने पुराण, घर्मशाश्र तवा अनेक राधे: थ. थोक इकट्ठा करके समन्वय और विशेष विधियोंके साथ ब्रतोत्सवॉको अपने वतराज अस्धमें रख (॥ 2 ।६ल्‍होँं। ४,०३५ इश्न कमीको पूरा किया हे तथा इसमें ये इतने कृतकाय हुए हें कि, इनसे पट्टिछ॒का दूसरा फोईभी दुबे विधस +; बंध करते. बाढ्य नहीं हुआ हे दूसरे संग्रहकारोंके क्तोत्सवोंके संग्रहको अपने प्रन्थमें छेतीवार हमारे: यश की इन ते कोई हैतशता नहीं कौ है किन्तु उसके नामका आदरक स्राथ रहेख सप्रप्ाण किया है कि, अमुकने इस इस पुराणम डिया था, रुखे म॑ यहां रख रहा हूं। इनका प्रन्थ ज्तराज नि्णयसिन्धुस कियश्ती तरहभी कम नहीं दे इनके लिणयक सामते फसछाकरभट्टके घमेसिणय अंगण्यसे बन जाते हैं। त्रत और उत्सवोंकी तिथियाँके निर्णय करनेके सप्य इन्हें लिलों खिन्धुक निर्भय बहुतही अखरा है; यहांतक कि, स्पष्ट शब्दोंमें कहदिया है कि, इन कारणोंसे ऐसा जिण। ५9, ?,: | है निणय ठौक नहीं दे | यादि दूसर शब्दोंम कह तो यह कह सकता हू कि. निणयसिन्धुकी जिन पा या + माजेत मु कू अगूढ़ टीका अमेखिन्धुभौ नहीं कर सका था जिनका कि, जान छेना दूसरोंके छिए महा कटिन काये था, परि4

| दूर *, हक] - हि. भर हे रे कह 2 3 जा रजक सामने अनाथासही रखदों हे। अतोत्सवॉकी विधियोंके निर्णयकी निणयमि- [शी ८१०,)

हे के कम ब्रलराजने भथुमात्रभी मुछादिजा नहीं किया है यही नहीं, किन्तु सप्रमाण सिद्ध करनेबो 4 मी ही). जहां | & बहा हमने यथाज्ञान इन्हें परिस्कुट करनेकौ चेष्टा की हे तथा करतीवार इस्र बातक़ाभी ब्यात रखा है रण पे बदुनेपाये। निज्वेष कहतीबार [_] इसकोष्टकके बीचमें कहदिया हैजब इकनेस भीटा! शन्‍्तों।

रह

| है

देकर :उस्रविषयको पूरा प्रकटकरनेका प्रयत्न कियाहे।दूस्नरे स्थछों पर भी जहां हरापटि-: 5... 2 केक पूणे चें्टा कौ हे यह सब कुछ करके हम इसी परिणामपर पहुंचे है कि, |. .” >यन्थोक 5०: कार मे. * | 0. श्र ' जीने | क; | . का परिष्कारही ब्रत्राजके नामसे श्रीविश्वनाथजीने करढाला है ' इसके सभी मिल्‍ूय कक , हो टिक हूं जो कि, आजतकके किसी धमंशास्रोंके संप्रह करपेवाेग ,। है है. | है, द्स 8 करंयाणकारी विषयॉपर ध्यपन दिया हो. रा७5४) आर टू 8

ह्ह है आशक्षा + | $ / 9 | ,

है

लेट ७०8४6 55 कक 78 806: 050 80/82/0007 60 7766 0 07634 7 40 6 कैप

#॥ 850 /% 05 2९४३४ 0000 007000 0 शा /0/00३ ४4

ग/॥/१/९0///8/6:%/ 2772 27 00420 025 अक/000 ९708 वित#लक्-/मंरक्रजोकशापथ' ॥4०४पापमरतरपपटफम नि के त9५०+१पक्रककाइुसमपे> ५2 पुर: कर तेएशा३०४८।मा०३ ३५अक अपलवका।.. 0० पाआफेफ फरपनन: पंप है ६४२६ 2६१६१२३००००३३२कैन 22७ ("कक १७ भार 402 मी

होगे कमंकाए्हक बहुत बड़ भागकोी !हछा हैं। देवोपासनाक लिये तो इसने अमृतक निधिकाही काम किया है। 'बॉफे पत्ते, धषासल एबम उसकी प्रिश स्त्री इसने पृणरूपस दिखाई हैं जिनके बधप्रयोग्स उपासक इृष्ठदेवका ताक्षात्‌ करसकता है, जिन जिन विशिष्ट पुदुषोंने उन विंधियोंसे इष्टद््‌वका साक्षात्कार करके अपने ऐहलॉकिक एव कछौकिक कार्मोको पाया हैं उनका पूरा इलिहास शन्य प्रशाणों कर साथ दिया है जिसके देखनेसे कलियुगके कलुषित की भी श्रद्धा उनमें उत्पन्न हो तथा वह भी रख्यपुत्॑ड अपना कल्याण करसके | हवनादिका भी बहुतसा विषय #र्थी है अनेक तरहकी आहुति और भद्दोंक भी विधान विस्तारके साथ आये है | कोई भी छोकिक कर्मकाण्डका देवता की महा होगा! जि ५: कि, पूजन हवन इसमें आया हो | सतदीक्षी सब बातें विस्तारके साथ, आगई हैं। बत- कि उताओे मानवीय उर्शशाणा थी बहुत बड़ा भाग कहृदिया है, जो हि जाहि त: «णॉरपे इधर उधर सुत्र्भ णिक्की तरह पिरोया हुआ है। हविष्य !सलुओंके न्ामपर खात्रालाशुकामी निणय करदिया हैं। इस तरह इन्होंने धर्म सके क्रिसीसी छप्योगी सालजनीय विष्यकों नहीं छोडा है जिन्हें देखकर हम यह कह देँ कि, श्रतराणके नामपरे मी मेक जि लीं अखिल 7] देश है, एवं जो भी कुछ ऊत्याएइवट, छतझछाप है बह सब उसको कह- [या है तो कोई अत्युक्ति 7 होगी। "3 फछके कमकलापमें ऐप्ले अनेकों ही मन्त्र प्रचलित हैँ जिनकी कि, भाष्यकारोने कसी दूसरे देवतामें योजना की है तथा उनका आधुनिक ईसंछाण्डमें दूसरे देवताले पयिषयमें विनिय्ोग देखा- ता हैं ऐस ही दोसौके छगभग मन्त्र इस ब्रतराजमें भी आये हैं जिनका कि. अथ यहांके विनियोगके अनुसारही ॥गे किया है जहां तक हो सका हें यह भी ध्यान रखा है कि, किसी भी भाष्यकारसे विरोध हो, यह योजना ! इस 0२ जकी टीकाके दसरी जगह कम देखनेको मिलेगी। यह कियासी इसी उ्देश्यसे हू टि,सन्त्रदे अथसे उसी बताका परिषृण अनुसन्धान करके कर्म्नलापकों खर्बोत्क्टॉंगुणवाछा बताया जासके; क्योंकि, बिना देवताका' अनु- हुधान किय उच्च कमको श्रतियोंने उन्तम नहीं;बताया है जो मंत्र यहां जाये है वह ही आजक कृथ्रझाण्डके प्रन्धोंमें हीं होंगे विनियक्त कियेगये हैं इस अथने उनके लिये वहाँ भी पथ दिखादिया है कि, इस अर्थसे उनदे देवता का अरुसभान ए7 दीजिये | बेदके भाष्यकारों हा अथ वहांकी व्यवस्थाक अनुसार ह। ऐसा क्यों क्रियागवा इसका | 7। भी वहाँ टीका 27.75 ५; गया हैं यद्यपि पुराना पक एसाभी आर्प संग्रदाय था कि, मन्त्रोंका अर्थ मानकर बअछ मज्जोंमे आय हुए नाम्रोंक अलुसार विलितोगों गे व्यवस्था करके उन्हीं नामदाले सनन्‍्त्रोंस उस सामके देवताओंकी [ति करने छह ता था पर लिकुफने इस कोई महरूर नहीं दिया है तथा भा.वि :खिकिए अपनी शिक्षार्म' अथके अनु बानके विना थत«वोगयो निरथक बताया है इस अथस रूप जाव्डी ब'स्यजिक् छाम उठा सकेंगे यह हमझकर इस टीका उनका विलिर नुसार अथ ऋरदिया है ! 0५. ८.0००५ और _जा ब्रतादिक लिखनेमें अन्तर तो यही है कि. निशमसिन्धने प्रत्येक मामके जुद ज॒दे ब्रतोत्सव दिखाय है पर उतने साखोंका हिसाब छोड़कर विधियोंका हिसाब लिया है रिपदाण लेकर 5४:५० सब त्रत और उत्सव एक साथ दिखा दिय हैं इसमें भी निणय सिन्धुस इसदी संख्या बहुत ज्यादा है। वारत्त ते निणण्सिन्धुमें है ही नहीं इनके सिवा और भी अनेकों क्त हूँ का कि इस अन्थों मे कोई धरसेप्ती नहीं आया है | सब 767 विस्तारके साथ कहे गये है इसमें व्यय कियगये कालकों तो हमण | ताएये साथक समझा है 5सर्ग एक हमारी (7७४ यह भी हैं कि गजुस्मति आदि सभी पघमण। जक अन्य पाषोंके आयशित कबनेमे के |) ततकुरूफ भाम्यायण आदिका विधान करते हैं अतातमकों गभीर रृष्रिसे दल तव थी ये सत्र उप्यासों: ू४; - हैं जो कि; ब्रतोमें रावा. थे रीतिसे विधान किय +% ' ही नहीं, शवोंयी 7 टनिरोंए कम उपवास हों. शासोपतास बतके उपवास तो प्रायश्ित्तोंके उपद्ःसोते भी अग।... बढ्गये है अनेकों भव्य पुरुषोंने भी अपनेको तोएएरगों 5 शुद्ध करकेद्दी सुखमय ईश्वरीय याज में बसनकी योग्वत पाई थी। ये ।समतोए- करके पुरुषको केबस्यत? अधिकारी बना देते ह। इस कारण धो: छामीको भी शववासात्र पादुय हैं। सकाम पुरुष इनको विधिक साथ जाझो .7 पूरा करके अपनी कामनाश्येको अन ही पाजाते हैं अत" हव आुक्तिक जा।नी यही है करिए वााप्िषप्टी शिक्षा भादि वेदिक ग्रन्थोंमें भी तो यही बाल है. पतित प्राणियोंको ड्य टिका "एस 7 बतही तो पव सभी :70 7४ शिष्ट पुरुषों में देखा जाता ऐसे ४5 /िएुछिलेपादक बरतोंका 7, हमने अपनी डगौग मनवरत (ण्टिसके साथ किया, है कि, अतगाजक वाह हुए सब जन आदिकॉको तो शायद इस जीवनमें ले करस सं घगके पापहरी परम पवित्र स्मग्णसेदी अपने 7पॉनो सध्डाए

! 22000 42275 हे ; 394 2600 260 25008 0260264755 खक90/7 77%: 32 कप हक अफियोश जा बलियमाथ कल पोफेसिलिफारमब्कत. ह५.. जता फणामा्रमलांसहाानापाशपपथाकपात भाप मन दफा. "लाना... शरण

आओ रत चर

अर,

.

७७ अ्रवराजमें आये हुए संग्रह अन्थ-हेंसाट, कल्पतरु, मर्दंनरत्त, प्रथ्वीचन्दोंद्य, गौडनिवन्ध, पटूप्रिंशम्मत

शेखर, शारदातिहक, पद/थादिश, गोविन्दाणंव, भाग॑वाचनदीपिका, माधवीय, : ज्ञानमाला, निर्णयास्ृत, देवनिर्णध _ आचार/मयूख, दुर्गाभक्तितरंगिणी, शिवरहस्य, काछादश, रुद्रयामछ, अद्धायामछ, वाचम्पतिनिबन्ध, पुराणसमुख्यय

आदि ग्रन्थ हैं। ब्रतराजकारने अपने ग्रन्थमें इनका उल्लेख किया है।

. _पुराण-त्रह्म, पाद्म, वेष्णव, विष्णुध्, विष्णुधमोत्तर, शैव, लिड्, गारुड, नारदीय, बृहन्ञारदोीय, भागवत, आध्ेय : ककान्द, भविष्य, भविष्योत्तर, अश्ववैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वाराह, मात्स्य, कौर्म, अज्ाण्ड, दृबी, भारत: आदिश्य पंचरात्र, गणेश, कालिका, नूर्सिह, अगस्त्यसंद्विता आदि इसने पुराणोंम आये हुए ब्रतों और उत्सवोंको तथा ब्रत और उत्सवोंस संबन्ध रखनेवाढे विशेष वचनोंको ब्तराजमें रखा है | स्कान्द और भविष्य तथा भविष्योत्तर और विप्छा, घर्मोत्तरके ब्रत अधिक संख्यामें आये हैं | _ स्मृति-मजु,याज्ञवल्क्य, नारद, देबर, विष्णु, हारीत, यम, आपतस्तेब, कात्यायन, बृहस्पति, व्यास, गदर, पक्ष, वच्िण्ठ इद्धसिष्ठ, सत्यव्त, पेठीनसि, छागढेय, बोधायन आदि आई हैं।

. बेद-ऋगू। साम; यजु, कृष्ण यजु और अथव तथा दूसरी दूसरी शाखाओंक भी मंत्र भाये हैं। कर्मकाण्ड यद्यपि उल्केंस नहीं किया हैं पर अन्थके कल्वरको देखनेस पता चलता है कि, कमंकाण्डका भी कोई प्रस्थ नही बचा हे | इसकी भाषाटीका करती वार हमें इन अन्धों मेंस जो मिछ्सके उन सब भन्‍्थोंकों इकठ़ा करना पढ़ा तथा इनके अछादा और भी बहुलस भ्रन्थ हमें इकट्टे करने पड़े इस प्रन्थका पूपक्ष आदि दिखानेके लिये नि्णयसिन्धु, घमसिन्धु, जयसिंहकल्पहुम आदिका उल्ेख किया है तथा चारों वेदोंका सायणभाष्य और मिरुक्त आदि बदिक अन्थोंका भी एप, योग हुआ है ।'सर्वेदेवप्रतिष्ठाप्रकाश, गोविन्दार्चनचन्द्रिका, मंत्रमहाणव, मंत्रमहोद्धि, नवग्रद्विधानपद्धति, अतिप्नार्सप्रह मुन्त्रसंहिता, प्रहशान्ति, पारस्करगृह्मसूत्र, आपस्तंबसूत्र, सूय्येसिद्धान्त, :महरलाघव, छीछ [हूर्तेचिन्तामणि, तू ब्क्‍्योतिषाणव, कमकाण्डसमुश्यय,आश्वछायनसूत्र, व्याकरणमहाभाष्य, वाल्मौकीरामायण, हिरण्यकेशीय बक्षक मंसमुचय, भादिका भी टीकामें उपयोग हुआ है इन अन्थोंके प्रमाण आदि हमारी टीकामें मिलेंगे। कहीं हमने नामनिर्ेश कर दियाहे तो कहीं विषय दिखायाहे उसके नामका और कोई संकेत नहीं किया है इस मदग्रन्थर्म हमें एक वर्षके करीय अनवरत परिश्रम;करना पडा फिर भी नहीं कह सकते कि, यह परिपूणे होगई क्योंकि, मानवी बुद्धि कहीं स्थगित होती ही है | सायणाचाय्येके अनुभवके अनुसार किसीनकिसी कक्षामें अज्ञाम रह ही जाता है। यद्यपि बेद्‌ पुराणों संभिद्चित,सेवा करनेके पीछे हम छिखनेके कार्य्येसे विरत हो छेखिनीको विश्राम देते हुए दूसरी रीविसे धर्मसेवार्मे लगे हुए थे, दूसरे शब्दोंमें यह कहें तो कह सकते हैं कि, हम अपने अधीत वेदवेदाज्ञोंका उपयोग करना छोड़क निरयंक ही सुढा रहे थे कि, भारतके अतिप्राचीन श्रीबेंकटेश्वर प्रेसके स्वत्वाधिकारी एवम्‌ क्षेमराज णदास

नामके प्रसिद्ध फमंके अधिपति भनातनपर्मभूषण रावबहादुर सेठ श्रीरड्रनाथजी वया अ्री के

से

#

छा सा ३. टी "रम सहदयताके साथ कलमसे देश और धमंसेवा'करनेमें अम्सर किया। यह उन्हींकी प्ररणाका फल हमें; अह्यसूजका + _ पावपकाश आदि तथा अतराजकी इस भाषाटीकाकों धार्मिक देशदासिद्ोर् रख से मे 5 2१3! सर कार इनक हृदयसे घमके .छिये कितना प्रेम पं कितनी श्रद्धा हैं कि, धर््रयारके ला हुए प्रतिवादिभयेकर अठक अधीश्वर राजसम्भानित जगदूगुरु श्रीमद्नन्ताचार्यजी महाराजको देख मुझे अर अकीफ पहाड़ी स्थानोमें भी छोगोंमें घा्मिक जीवनकी रूहर वहा देनेके छिये भेजा। यही क्‍यों! सनात्ल- क्‍ बा आपने कफ समयपर अपूब त्याग किया हे भारतके विशिष्ट पुरषोके स्मृविचिन्द्दोंको देखनेकें लिये भने ब्ोचपोत .... था मकर देखा हे ! यदि थोड़े शब्दोंमें कह तो यद्द कह सकते हैं कि, यह उन्हीं की धामिंक भावनाओं . आजम ते हुईं. रचिर प्ररणा हे जिसे कि. मैं' इस भा' _थ पा पड 5 है सनंसा 200 रण ! में, प्तराजकी इस भ्राषाटीकाके रूपमें रख रहा हूं .: “पंल्वंकके विषय-सेगंदाचर एफ क्रते का मन देवता मा मक भहिसुस॑ हक 2 कक किए सिलर » पेमें, प्रायश्वित्त, उपवासधम, हविष्य उपयुक्त रद्रमेडल, बस: बुर जादि वे लिएय हैं, जिनका! सभी रो उक्त वस्तु,भद्रसेंडछ, इसके 2. ढेकर जम्रावसतककी तिथियोंके ब्रत तथा दोड़ी भादि सब

. श्सच, प्रतोंकी देंब पूजा, कथा, उद्यायन तथा विधि और उनकी तिथियोंका निर्णय एवं ,अन्य ऐतिहासिक बृत्त है, इसके पीछे वारत्त हैं इनमें प्रत्येक वारके सूये आदि देवोंका पूजन ओर उनकी. कथाएँ वर्णित हैं बुध और “बुंहस्पतिके ब्रत हमने और भी दूसरे अन्थोंत्ते छाकर जोढ दिये हैं कुछ प्रदोष आदिके ब्रत भी ऐसे ही गयेहँ (जो वार तिथि दोनोंसेद्टी सज़न्‍्ध रखते हैं। व्यतीपातके ब्रत दान आदि।आये हैं जिस्रके लाराके प्रकरणकों 'किकर हमने एक /वेदिक .टिप्पणी दी है। संक्रान्तिके प्रकरणके पीछे रक्षपुजा आदिका प्रकरण आया हैं। पीछे मंगछागौरीकें त्त आदि आकर और भी बहुतसे ब्रव भादि आये दूँ द्वो कि, भनुक्रमणिकामें सब भिन्न भिन्न करके दिखा दिये गये हैं. और भी अनेकों धम्म- शाखरके प्रयोजनीय विषय आये ह्‌ ज़िनका प्ष्ठाइ[अनुक्रमणिकामें लिखा हुआ हैं पर मूछमें कहीं मासोके मार्नोमें हेर- फेर हुआ है। हमने उसे अविरोधके पथसे लेजानेकी चेष्टा(की हे फिर भी विवेकी पाठक उसे सुधारकर पढ़ छेंगें यद्यपि शिढायन्त्रोंसे किक्कीही वार मनमानी रीतिसे दूसर दूसर प्रेसॉने इसका प्रकाशन किया था, पर इतने बडे धार्मिक सान्य प्रन्थका पदार्थ विचार एवं धर्मशाखके दूसरे दूसरे मन्थोंको रखकर सेशोधनपूर्वक परिष्कारके साथ किसीने भी इसका प्रकाशन नहीं किया [धमंशाख्रके प्रतिष्ठित ग्रन्थकी यह दुर्दशा देखकर अनेकों माननीय पुरुषोंके मुखसे उच्च- : श्वरसे यही शब्द निकले कि,ऐसा होना चाहिये;इस प्रन्थका सुधारके साथ यथायें रूपमें प्रकाशन हो। हिन्दू संस्क्ृतिके पोषक एव शास्रोंके उद्धारका अनवरत ब्रत रखनेंवाले वेकुण्ठवासी सेठ: श्रीक्षेमराजजीने खाडिछकर आत्मारामजी शास्त्री तथा महाबछ कृष्णशास्त्रीको आमंत्रित करके इसका संशोधन करा, आवश्यक टिप्पणियॉसे मूछका' परिष्कार कराके आजसे ४३ वर्ष पद्दिल़े अपने श्रीवेंकटश्वर प्रेंस बेबईंसे प्रकाशित किया अबतक यहे ग्रन्थ (कितनीही वार उसी रूपमें प्रकाशित हो चुका हैं। हमने हिन्दीटीका छिखते|वार इसकी टिप्पणीपरभी ध्यान दिया है एवम्‌ यथाज्ञान मूल ' और टिप्पणीकाभी संझोधन किया है (तथा उसके दिखाये पाठभेदोंकाभी अथ करते चले हैं,जहाँ कि, हमने उसका अर्थे दिखांतां आवश्यक समझा है [पद्‌ पद्पर इस बातका ध्यान रखा है कि, धर्मशाखमें, हमारी साधारण बुद्धिके दीषसे / कोई उछटा सीधा अथ होंजाय जिससे कि, धार्मिक जनोंके! हृद्योपर कुछका कुछ प्रभाव पडे आदमीके हाथसे ढिखी/हुईं टीकार्मे कोई गलती हो इस बातपर हृदय विश्वास!नहीं करता क्योंकि “भत्य॑स्प चित्तममिसंचरेण्यम!ः भनुष्यके[चेचछ चित्तका क्या ठिकाना है ? आज एक बातका निश्चय करता है तो कछ उसको ;असत्‌ समझकर उसे त्यागनेको छशावढा होता हां, मेरेसे जितनाभी हो सका हे शुद्ध ही संपन्न करनेकी चष्टा की हँ(जो कुछ किया है बह धार्मिक जगत॒की क्षेवा तथा बिद्वानोंके मनोविनोदक भावको' छेकर ही किया है कि, धार्मिक,जन अपने अश्विष श्रतो- स्सबॉका जान अनार [सही प्राप्तकर सकेंगे तथा विज्ञ!7० इसकी सरठतापर [प्रसन्नता प्रकट करेंगे आशा भी यही करता हूँ कि, भारतक सभी सप्रदायोंके सुयोग्य हिन्दू इस (पत्ता कर हमारे परिश्रसको सफछ करेंगे

विदुषां वशवद्‌ :-< प० माधवायार्य्यः

| 0 नी चनों 4]

क्र

व्यय अंक 3 25 कट :

हि ध््मी के क्र हि तल ञञु अशणालंकतः सत्यदय आलश्मीवेछूटश: मंयुण[लकृतः लत्य# पे

पक 7 .#| प्थातऔ 5 पा: पका का के ब-श टाइल ४९-०४५ & ] 7 #] दर (# टू) ्‌ृ शहए जार छ्् फिकक .2 | | ५४॥| विलासी 5 भा | [ 060 हद

री थ्थ डज+9 हि ] ४५९० | ड्रि ह। शक | ्ंतराण 87. दूं + मर कि भा ५० ! ] के | | 8 हि है, 5 हा हि ृा हे के ञ्ि किनाण्व।ज भंजचतराशीः रुप भािगर सु: आय हर

दफन "या पधकको | हि लनिधदि नंशु के नि न्त है मन | [9 सवेषां नस्तनोह अतिदिनशुदये श्रीहरिः शान्‍्तर्मा

हे ।7॥ ५5 | 0 कह 4 हर जगन्निवाश्चस्य हरः परतन्षी जनो भुत्रि 4 अध्याय 5 57 0025 2 4 45९०५ की है अध्क्कलरर * | हि का ॥५ कआ८ के 9 गुल्कु के. नी पक दूध ब्कक्ज हि | है ॥] अस्माभित्रतराजस्य बविश्वनाभकृते: खलु | अनन्‍्यन्व/लयवयेदद 7५ , ४३०१२०१-१ || |] रे मारदेनानवेरि 2 ०28 ही हवा था 4 उपलककल ढेखकाग। पाठकारगों प्रसाद्नानवरस्थितेः | सम्पूछ वायापाव ह्ठा कारंग्रइण वे | श्खै

| य्यं 4६4 /#॥ श्रिः पु स्‍क५ है ह:दह। ने एव 0, १२... *; के 7 डा 5 है सारट्य सावधातु 'ब शांखिलसइडछाम्डयां शा साश।पा। 5, बस्ती) कर 0 ६, है ५५ हक 2७५

धरा यज्ेस जूत ्ध 3 है| हि २>मक्त छ्द्य थे " है ५४ | हे |] ये हे | ताभ्यां महातयज्ञेप सब स्यन्वान्बिछोब्य स्वछे स्थल ६. मीौरि: बहकाय ... '... | २॥॥

]

नह असल कि लक जिस समिकिक:

टि पूर कप प्निः ८90507 0८६२२ ५,४ * देय के | न्‍्थों हर ' खसब।त्सयपय | थे 3 53 | २३४, १97३० | साउग्र अन्य ,3 4 , » ८४ई,६ / | * | | #।|

नंगारिनागधरनीमितीय/एद्ध:7 5: ]) आरोहणेन स्थाविष्य्प ब५,5ब- ०-५: || | परं त्वस्थ च्‌ ग्रन्थस्य कर्मणा स्वेन सूचितः हैगिप्ठ ,८ ५...) मे उध्यवरयय: कक की भोरेश्वरो बापुजीजो5विधायवास मुद्रण अठो सो हटास्मामि: धूजितों ' नेब अदला, !०9॥| इलि तन्नोर॒रीक्ल्ल गथाथ्रत्रि अमुद्रयन तयोड-ताि दावकोरोज्याना मै वजर | ४१ जल्ारूघनीयधीशस्य पुरो वादः प्रब्तित: | तत्र साब्यादिशिनां: विपुरीकारिंद स्रति | १२ ।। न्‍्वायाधीशमुखादेषा निर्गता वे सरस्वती प्रतिधाटिसुदिलोपथ अन्धों बाह्य थे + ॥॥ सब देथं बादिने सत्वरं प्रतिदिन, इलि तन्निंगंतां "दीव.. ७.9. २४ ॥| लक्ष्मी निगमर-्जे वा. कु बेखित पुनः स्वयम्‌ अपीला रू पादशोष अज्लाम्रे :. तत्रापि बत्येतरमौश्मज्या खुविपक्षयणों स्वाशा देशों डा ,पी भाष्टअेमेलज्रेब सत्यः प्रतिवादों रविष्यति 3 2 कूतअ् निश्चयश्ञापि जल्लेन मअथमेन यः | कृत निश्चय: सोपएथ सत्य ख्थान्यथः ने हि॥१८॥ शवमुक्तना बिवादख् स्म्पूणः समकायत फारगुन 2/बक्पक्ष-4 दृशस्थां भौमवास/ ।) * “, ॥| दक्षाधिफा्टाइ झाल्बशतते श्रीश्ञाद्धिबाहन || सत्य ख्रवंत्र जयति सत्ये सर्थ लिपिनम्‌ २० || 'सत्येन बद्धंते कौलिंः खत्येन सुखमभेधते असत्यं सर्वदा धेयमस-येनायशों भवेत्र | ६१ यजप्यसत्येन जीयाश्सो दष्याश्म किम्‌॥ स्रारमित्य विजानन्तु सुध्ियो न्‍्यवट्ारिणः | | “२ ॥| मन्तब्य छदा ग्कन राजसैदिरवत्मनि बय विजयिन: मुज्ञास्तथापि कि अहन || २३ |] बहुद्च्यब्ययों नूनसुभयोरपि जायते तत्रापि किंचिजयिनों रुष्पमित्यभिभायत ॥२४॥| पराजयी तु घुदर्रों इंझ्माजाति स्वतः || तस्मायदि जना! सुज्ास्तदा आणप्वतु भे बच: २५॥। (- बिबादे तु खयुत्पन्न इभयोरपि स्ांत्बनम्‌ | उभ्ाभ्यामेव कऋतेब्ये नान्यस्थन्र निचायताम २६

रे मा] रथ र्क हि ; हब ष्जु पृ के ॥0)॥

शा द्ं कक, 3 गा हि के है. हे शा +५ ४, + 76६ ५६] /* डा

श्र नो कक $

नो न्महादुद॒क्ा स्वाइन्मशंत्वीधि सज्नना: || २७॥।

( सत्दय-. पहिद इसे टिप्पणीके रूप बेब खा शस मुझ टिप्पणीक रूपम प्रकाशित किए पीछे मोरेश्वर बापूजीन अविनारफे वज्ष हो श्रका 0, इन्हें खचके साथ पुस्तक अर्वेकटेश्वर प्रेसकौ देन्ौ पड़ी भी इस्रीका विवरण इन 'होकोमे है!

*- रे ०.7 हित //आरी 2/0७ कि 27570 /5207 82 शणी (07782 // सन 0. दशीकमक 2 शहआ मे हरय कलथे का. 3... (मकर. स्‍धपब «००५ ऋषामाभमपरजाकपंबमाकापरदाा॒बजलक- नद#प्ाजतकक कैश "जे. न्‍लमादपोकपवी॥०+ जानने (% 2. छिपे भर

विषय: पृष्ठाक: लटक परिभाषाप्रकरण भन्नल्ाचरण ला, ग्रन्थकाप्रार्भ्भकाल ' ड़ जतका लक्षण हि ब्रतका समय रा ब्रतका निषिद्काल देश भेदसे निषेष तके आरंभ और समाप्तिकी तिथि ”! अतारंसके बार डे » योग ११ : ध्तके वर्ज्य दिन 2 भद्राका विचार ब्रतके देश १? व्तके अधिकारी . ज्तमें चारों बणोका अधिकार है व्तमें छ्लियोंका अधिकार ११ ब्लेस्छोंका अधिकार ग् ब्ेश्य शाद्वोंके लिये दो रातसे )2 अधिक उपवासका निषेध सघधवाकों पतिकी आज्ञासे अधिकार ?? यज्ञ आदि नहीं करसकती ?? विभवाका अधिकार ? ब्रतके धर्म ' संकल्पकी विधि & पौदेके कृत्य 2? अश'्तकेलिय विशेष बिनालापेहीप्रारंभ ?ः व्रतिथोंके सामान्यघर्म ब्तकी देवबपूजा ११ ब्रतकी देवमूर्ति १?

बतीको ऋतुकालम ल्वृदारगमनकी आज्ञा?!

इसीका दूसरा पत्त

मांससझकत ध्तु गे आरंभमें नानदीमुखश्राद्वका विधान . संकरिप त्तकों करनेका प्रायश्वित्त ??

विशेषपरिर्थितिमें प्र।यश्वित्तका अमात प्रायश्वित्तकरके फिर अती हो

उपबासके धर्म रा उपवापका भ्र्थ उपबासीके गुण ५; उपकासका रूदि अ्रथं ;. १०

उपबास और श्राद्वमं दातुनका निषेध?

(४ हू 4 कं है हा भें छः धर / हम, + है

20260 5/2%:/0:000022 0 /ैअष्यना 23 202 ाथ०४2 22222: कि ४2:789 82 ३5 उधरण्कद्रपर्द ऋजेर भी जपन'. अनारअआकस+काकों अपाफपार) 4िीकल्‍०९७०. “कप बपे४८केपेरप +ल्‍+भक३० कर. ककनतरककॉमिनरको मार्क यमन क. कृपकानात ।पजतोपे-अभमाताइअभपपान्‍कनकी

और व्रतराजस्य विषयानुक़रमणिका

विषय; '

समय पानीपीनेकी आज्ञा... १० ब्रतकी पारणाके नियम १)

ब्रतमें अन्नके स्मरणआदिका निषेध: ११

उबटनआदिका अविधघान है

पतितआदिके दशनादिकोंका न्षिध करनेका प्रायध्ित्त हे

सन्ध्या अब करें .. ?)

सूथ्योद्यके विना दान बतका अभाव १२

आचमनसे शुद्धि १9 ' प्रशवका उपयोग | )१ झ्ियोंको अतकरनेमें सुविधाएँ १? व्रतिनी रजल्वलाकी व्यवस्था... 7! सूतकमें व्य उस्था , त्रतकर्ताके प्रतिनिधि हक... आई काम्यकर्मके प्रतिनिधिका विचर हर किनके प्रतिनिधि नहींहोते १२ व्रतकी दविध्यची ने ? मांसका विवेचन १२ ब्रतकेलिय आजश्य कवस्तुएं १७ पंचपद्षतव ) हे पंचगय्य ?) पंचाम्ृत १६ तीनमघुर अर छः रस. चतु'सम ( चारपराबर ) हा. सर्वेगन्ध 79 यक्षकद्‌म या सर्वोषधी .... ११ सोमाग्याष्टक ?) अशक्षअर्ध्य १) संडलकेलिये पांचरंग १) कोतुकर्सेज्ञ न्‍ 7? सातमृत्तिकाएँ १५७ सात घातुए. ११ सात धान सत्रह धान १? | अठारह धान ; १? शाक्र )) कलश १? उसका परिमाण )9

प्रतिमा और उसके द्रव्यके परिमाण . !! जहां दोमकी संख्या कहद्दी द्वो भृ८

अप्मिमु कर्म झा धानादिकर्म

कै '+लपकटटर/मिकप आपप पिन कम नर काल टन्‍उणज 7५ है सेन 42: 7 कल _टपीरिल्‍ह के 40708 घत सार कमी छत मक+ करती ४३7७ ४० फरआ पर: यह पक 777] उन वि ट् /2॥ थ्ृ के

प्रष्ठाक: धान्यके प्रतिनिधि १८ जहां मंत्र ओर देवता कहें हो वहां ?? मूलमन्त्र बनानेकी विधि १) द्रव्य के अभावमें प्रतिनिधि पवित्र ११ | १९ अ्रमृतधूप १३ दशाडडधूप सुवगमान )) रजतकामान ११ तबेकी तो २० काप्रॉपणका विवेचन !ह धानके बॉँट १५9 होमकी चीज! मान ») इसी का दूसरा मान होम द्व्यके प्रतिनिधि १' आहुति केसे देना ' ( यवादिक्रे प्रतिनिधियोंका अ्रभाव 5३ 'ऋत्विजॉका रण ११ अद्तवच्र + लक्षण ») आच!येआदिक भूषण १! श्रतका आग मधुपके )) ऋत(्विजों की संख्या 75 दक्षिणएविव्रान | ;) सर्वतोभद्रमेडल ११ लिंगतो मदर “क। चतुलिंगतोभद्र 7 द्वादशर्लिंगोद्भव २४ मण्डलों के देवता ओर उनके आवाहन।दिके मन्त्र १$ | लक्ष पूजनकी उद्यापवर्वि(धि २९ आचार्य्यका वरण ११ ऋत्विजोंकी प्राथना ३० दुष्ट परवोकी निष्का तन )9 पंच गव्यसे प्रोत्तण ४) स्व॒स्ति प्राथना १! शग्न्यु तारण ४१ प्राणप्रतिष्ठा ११ क्लशपर देवपूजन २२

पुरुषसूक्तके मंत्रोंस घोड शीपचार पूजन 77

३४ रे

प्रश्नांक: स्विष्टक्त्‌ होम 3८ मुदाओंके लक्षण, और नाम डरे उपचार हड अडतीस उपचार ; षोडश उपचार ११ देश उपचार पु रातिपूजनके अनुपधुक्त उपचार ४० पाद्ाञ्ञ | १) आखचमनाह़ है श्रर्ध्या ड़ है १9 उद्गतंन 79)

स्तान पात्रके द्वव्य उपचारके सब द्वब्यका प्रतिनिधि 2 पूर्ति आदिके स्नानका निशय है. देव पूजनके देय पदाथ 7? शंखके श्भिषेक १! जिम त्तका उद्यापन कहा हो उसमें ?? उद्यापनके कथनपर ९४६ खंडितव्रतकों पूरा करनेकी विधि )9

हू जा ज्णा हुजऊ जयूदणायु जुचू३ह

यमद्वितीयाका निशुय, यमुनाक्षन ... "! इसके कृत्य हे यमद्वितीयाकी रु था, दिनो कटा से तो तन 5

इसीमेंभेयादोज और यमपूजन

ततीयाक गत

सब तरतोंकी सामान्य पूजाविधि._ ४७. चैत्र० शु० तृ० सौभाग्यशयनत्रत.. ८१ ५५ आह सतीदेवी ओर शिवपूजन आदि पर प्रतिपदाक त्रत॥ ., इसीमें गौरीके डोलाका उत्सव ८४ चन्रशक्का प्रतिपदाके संबत्सरके प्रारभकी विधि | इसीसें मनोरथ तृतीयाका अत के इसमें उद्यव्यापिनी तिधिका विधान उसकी कथा हे उथा निणंय ?! इऋन्यतीका बत ८९ महाशान्तिका विधान ? अहन्धतीके पूजनकी विभि हे पूजन 7. अद्न्थती अतकी कथा ९.० चे० शु० आरोग्य प्रतिपदाका अत ५३ | इसबतका उधापन ». ९२ च० शु०विद्या प्रतिपदाका व्रत 4४ | वेशासशुक्तृतीयाकों शत्यतृतीयाका अत ५३ चं० शु८ तिलक अत ? | वैशासस्रान है साधारण ल्लियोंको बेदका अधिकार नहीं५५ | परशुराम भयन्ती ५४ चेंत्र० शु० प्रं० नवरात्रका प्रारंस ५६ अक्षषतृतीयाका नियाय १) चं० शु० प्र० प्याऊका दान और बसे इसकी विधि १? घटका दान ५९ | इसको युगादि कथन ओर कर्तव्य हे श्रावण शु० प्र० रोटक ब्रत )) | कथा १) उसीमे सोमेश्वरके पूजनकी विधि ज्ये० शु० तू० इंभाजत ५६ हे सब त्रतोंकी शिव पूछा ५७ श्रा० झु० तृ० मधु्वावत १) ्ध रोटक ब्रतकी कथा ९८ श्सी को सगणुगोरी ब्रत हे . डैप्रवासकी प्रार्थनाके मन्त्र ५९ | खरणगौरीकी पूजा स्थाषंस ओर पूजन ? | ह्वर्णगोरीकी : दकाप स्वणेगोरीकी कथा ९८ आभ्वित शु७ पतिपद दोहित्र प्रति ; गत | हे | इसमे धमाका भांद किन 320 तेतकी विधि... १०% सामाकें जीतेनी, पितालिकों «१ मुडतकां अम्राव , 2००. $ हि है 3 हा शिशानिती हु धोरद नकतत्रका प्रा 5 5 पी अंभोकी बे भर है | | अंगोषफी पूजा * १०४

4७७४० ७०७७७ आज ससग/&१ ०#१९०॥०५९८ ३३४६

; | विय:

एृष्ठाक: |

नवरात्रशब्दका श्र्थ ६२ | कबा घटस्थापनका समरथ्र, राजिमें निषेध?! | उद्यापन नवरात्रके घटकी हथापना वि 7 | झा० घु० तू बतदूगौरीय। नवरात्रकी दुर्गापूजा ६३ | अगपूछा ६५

| कुमारीपूछा ६६ प्रारंभके पीछे सृतकर्में विशेष ६७ कार्तिकत्ुक्लाप्रतिपत्‌ ५; क्रथां भ्द मे इसीमेंबलिकौपूजा २ससीलींचनाव गोका 25३ | रत अन्नकूटकी कथा तथा विधि गोवधनके भोगके मेंत्र ७५

द्वितीयाके ब्रव |

कार्तिकशुद्धाह० ग्रमद्वितीयाकी अत. ७०५

हे!

भू , ईसकी कथा!

(

->यकयॉटिसानासर्वीिल्‍राकक: के

| नाममंत्रोंसे पूछा

| अगपूजा

| आव णपूआ

पुष्पपूणा है

| एऋसोशआाठनामोंसे पूजा

दर्यागिधापतिजत

मे।+ ह[० इ७ पिति

पूजन भंगपूजा

कथा

महिता तथा इसमे 4-: ::.।: निषेश दोष शास्तिका मंत्र

स्यपन्तकमरा ही कथा

जान हु चेक («६ कप (विनायकका पूजा

आ्राखिनक्ृ० चु७ दरारम्नलिता बत | कपा है

| कार्तिक कुण्सू कूरक बहुर्थीका (५ कथा

का माघ शु» ब० गोौरीमतुर्भीशत

संकटनाशन कथा

अगारकचहुर्थीके अतरी कया

> झका<+ सल-

विषय!

ताथाारकप्रदवतपटेनपंरा।बपवएखखासबा

पश्चमीके ब्रत चैठ हु० प०७ वन्पादिको दोलाका उत्सक ८८ १९१ का० शु० नागरपचमीजत भा० ॥० देमादिका नागपंचपीवत १९३ शआरा« झु० नागदश्बत और कथा ११

माहपद शु०प० ऋषिपंचभी बत_ १५९५ ब्रतकी विधि १९६ ऋषिपुजानिधि ही कृषा ९८ भविष्यपुराणकी कद्दी ऋषिपंचमीकीकथ[२०० उद्यापन २०४ आ*+ झु० उपाश्ललिताजत २०६ . » की पूजा २०७ कथा २१० उद्यापन २१९ मा* शु० वसनन्‍्तपंचमी र्ज्ड २२० षट्ठीक त्रत। भाइपद छु० ललिताषष्ठीका ब्त २२० 5० कपिलाषप्टीका व्रत २२१ ब्रतकी विधि २२२ का० कृ० स्कन्दषष्टोका अत २१३१

भाद्र०वा मार्गशीष हु वम्पाधषण्टी कान्रत 5

निर्धनकीविधि २३६ सप्तमीके ब्रत | बै० शु« गंधाबीकी उत्पत्ति० २२७ भा क० शीतलासप्मी कथा २३८ भा० मुफक्ताभरण्त्त २१४१ उमामहेखरकी पूजा ' 3१ कथा हे २४२ आ० शु० विश्वशास!प्रवेश २४८

» # 'रसस्‍्वतीकी पूजाकी विधि ,,.

माघ कु० रथप्प्तमीका व्रत १४६ ५... कंभा २७५० ». अचलासप्तमी # / २०५३ ७... पुत्रसप्मीजत २५५

. अष्टमीके ब्रत | .चअत्र शु० भवानीकी उत्पत्ति २५६

? ** झा जेककी कलीका प्राशन ,, 7? बुधवारकों बुधाश्मीडा ब्रत ,,

ब्रतकी विधि पूजा २५७ कथा २०५ उशधापन , ६३ आमण दशाफल्तत पूृणाविधि २६५ का . २३६९६

पृष्ठाका

विषय: पष्ठांकः

भाद्र कृ० जन्माष्टमीका व्रत २७० इसका मिश॒ुय कि पारणा ४५३ ब्रतप्रयौग शे७४ पूजाविधि २७५ कथा २७८ शिष्टाचारले प्रापततुई कथा २८४ उद्यापन २८% भाहपद 2० ज्येष्ठातत २९२ ज्येष्टादेबीकी पूजा २९, भविध्यपुराणकी कही अतकी विधि ओर कथा २९४ स्कल्द पु० कही ज्येष्ठाके बृतकी विधि २५५ उद्यापन '. २९६ भा० शु० दूर्भाध्मीका व्रत २९७ निणय $) इसका ल्ियॉको नित्य विधान २९८ ब्रतकी विधि ओर पूजा आदि हे महालक्ष्मी त्रत ३०० पूजन है कथा ३०२ आख्ि० छशु० मद्यश्मी ३१६ ऊ#० अशोकाश्पी मार्गशी> क० कालसैरवकी अश्मी ,, इसका निर्णय ११ कृष्णाएमीकी क्या ३१७ नवभीके ब्रन ! चेतन झु० रामनवसीका वत० ३१६ रामनवमीका निणुय 98 रामकी प्रतिवादानका प्रयोग २३२१ श्रीरामपूजा ३२१ कथा ३२४ रामनामके लिखनेंक|वत ३३० कथा ओर उद्यापन.... हा भ।० शु० अदुःख नवमीका व्रत ३३२ गोरी ओर गणपति शा पूजन कि कथा ३३३ आखश्वि० शु० भद्रकालीका तब्रत ३१८ नवरात्र 5 ३३८ दुगके पूजनकी विधि ३३९ | अरधध्य ओर अध्येके पात्रॉका फलपुष्प ३४१ तथा दूसरी बस्तृओंके समपर्णेका फल ,, आवरणपूणा १४६ चौसठ देवी ओर माताएँ हि | पांच मुख शोर आयुध ३४७

का० झु० अत्मनवसीके अतकी कभा ,)

विषयालक्रमणिका

कक: 4व कप के हि २४२८:

विषय:

पृष्ठीक: 2४७७७॥॥७/७॥एए/ए७७७॥७शएशएशश/श/श/शआशाणााआ“ अयक तुलसीका विवाह ३४७ कथा ३४८ है द्शमीके ब्रत

ब्य० 'झु० दशहराका बत्‌ ३५२ दशहू रानामका गंगास्तोन्न

झोर उप्रके पाठकी रीति ३५३ आपादढ शु० आश्वादशमीका अत १५६ यह मन्वादि हट का ब्रतक्की विधि हा भा० शु० दशाबताएजत ३५८ श्रा० शु० विणयादशमीका व्रत

निणेय एवं यात्राका विधान ३५७९ इसके कृत्य »)

एकादशीके ब्रत

एकादशी निशय ३६१ उम्रमें अ्रुणों दयका स्वरुप ११ वैष्णबका लक्षण ३६२ स्मार्तोक्ा वेष इकादशीके भेद 9$ परेद्रत्र॒त, उपोषण 5 हेमाहिके मतस्ते एकादशीके भेद ३६ विदोष 39 तब्रतके करनेपर प्रायश्चित २६५ दशमीमें त्रतकी विधि हर ग्रतके नाशक ५४ अशतकिमें विशेष विधि ११ ब्रतमें वर्ज्य 93 बज्थकि कियेसे प्रायरिचत

दांतुन निषेष, कियेसेह्ानि, विशेषधिश्ि उपबासके प्रहणकीविधि, एकादशीका सकरक, शावादिकॉको विशेष, रातिका संकल्प जागरण, द्वादशीखें निवेदन- मंत्र, द्वादशीमें बज्ब॑पदार्थ ३६५

विधि सुतकर्मेभीकरे, रजकेदशनमे भी करे, द्वादशीमें उपवास, आठ मह्दा- द्वादशीयों, शुक्लकृष्ण दोनोंका उद्य॒[-

पन, उसकी विधि ३६५ पूजाकी विधि ३७२ पुशणोकी कही दोनों एकादशियोंके

उद्यापनकी विधि 7! आपाद छु० गोपदत्तकी उद्यापनविधि३७५ पूजाविधि १? कथा | ३७६

पुरुषोत्तममास की कमलाएकादशीका

मादष्त्म्य २७२

आ० झु० एकादशीकों वामनका अबतार३ ८५९

उपर मा “४ पक सआकन्म मकइभ कप लक 2 तक कप + ५०२६३ 9४५५८ कर 0 >लज कलम कर परम ०48०८: 2६5:४७३ 72८ ८४5०४, ता 2 ०० ++++०-५९: 34 कपल प्र पसपमभमा मप्र इस मा एके हर. कि

विषयः

कार्तिक० झु० प्रबोधके उत्सवकी विधि३८

१! भीष्मपंचकत्रत ३८३. द्वादशीके ब्रत प्रबोधके मेत्र २८४ | चें० छु० द्वा० दमनोत्सव तुश्सीविवाह डे इसमें दमनपूजनकी अबरब दर्तव्यता

मार्ग० कृ० एकादशीका व्रत