उपाध्याय ग्रन्थमाला, ग्रन्थ संस्या-३

ल्ेजद्यक हा. देवराज उपाध्याय फ्र-ए- पी एच ही. अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, महाराजा कालेज, जयपुर

मंगल प्रकाशन गोविन्द राजियों का रास्ता, जयपुर

अकाशक : मंगल प्रकाशन, गोविन्द राजियों का शब्ता,

जयपुर

पृष्ट सेश्या : २६० ; युल्य : ५) पांच रुपये प्रथम संस्करण ; नवम्बर, १६६०

मुदक : सहकारी आह प्रिन्द्स, जयपुर

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गई जहां माई गई “चाहे कन्यादाता . से अधिक कौन जान

सपरगत

“साहित्य तथा साहित्यकार” मेरी नवीनतम कृति है कृति है, ऐसा कहते हुए भ्रसमंजस सा हो रहा है क्‍योंकि कृतित्व में श्रपनत्व की भावना अधिक रहती है श्रर्थात्‌ कृति शब्द को ऐसी ही रचना के लिए प्रयोग में लाना चाहिए, जिसमें मोलिकता हो भश्रर्थात्‌ जो बात वहां कही गई हो, वह स्वतः-नचितन तथा मनन में से निकली हो, लेखक की प्रपन्ती चीज हो, उसकी प्रपनी कृति हो श्रौर उसमें संग्रहत्व कम हो में ऐसा दावा “साहित्य तथा साहित्यकार” की ओर से उपस्थित नहीं कर सकता ऐसा लगता है कि में पद-पद पर दुसरे विचारकों का ऋणी हूं “बचपन के दो दिन ठीक इसके पूर्व बाली रचना में, ऐसा लगता है, मेरा कृतित्व प्रधिक था। उसका अधिकांश मेरा भ्रपता था पर “साहित्य तथा सांद्वित्यकार” में मैं हूं ही नहीं, ऐसी बात नहीं लिखते-लिखते जब मैं किसी उलभतमंयी परिस्थिति में पड़ गया हूं तो वहां पर मेरे मैं? ने हो सहायता की है। वैसे अपने से घुक्त होना सबके लिए कठिन ही होता है !

यह पुत्तक साहित्य की समस्यात्रों की समझने में कहाँ तक सहायक होगी, में नहीं कह सकता; परन्तु एक बात तो स्पष्ट ही है कि साहित्य की समस्या को यहां एक विशिष्ट ढंग से छेड़ा गया है एक नया प्रश्न छेड़ा गया है कि साहित्य में हम क्या चीज हू'ढते हैं। जब हम किसी पुस्तक को पढ़ते हैं, तो क्यों पढ़ते हैं? रचना के स्थापत्य को देखने के लिए ? उमकफ्रे

भ्र्ड प्‌ ## क््फ कम

भावों में प्रवाहित होने के लिए ? उससे श्रपने ज्ञान-मंडार को समृद्ध करने के लिए ? उसमें अपने को देखने के लिए ? प्रणेता की महान आात्त्मा से (०्रप्रगरांठछ8 करने के लिए ? हम दिल को हू ढते हैं या कातिल को ढूढते हैं | इसी प्रश्न के उत्तर में इस पुस्तक की रचना हो गई है आप तो जानते ही हैं कि प्रश्ंय का भी हाथ उत्तर के स्वरूप पर ही पड़ता है। जैसा प्रश्न, वैसा उत्तर ! उत्तर जो बन पड़ा है, वह यह है कि हम साहित्य जब पढ़ते हैं, तो हमारा उद्द ्य होता है एक दिव्य विभूति-मय आत्मा के सम्पर्क में भ्राना, उसके साथ (/0777प770968 करना , यह देखना कि साहित्य के पीछे जो हृदय बोल रहा है, वह केसा है साहित्य के माध्यम से हम साहित्यकार को देख सकते हैं यद्यपि आझ्राज इस कला को हम भूलते जा रहे हैं पर जब तक हम इस कला को फिर से प्राप्त नहों कर लेते, तब तक, आ्राज के वैज्ञानिक युग में, साहित्य की समस्या सदा खतरे में रहेगी

'साहित्य तथा साहित्यकार! श्राप से यही कहने श्राया है कि भाई, श्राज लेखक मरता जा रहा है, निराहत होता जा रहा है। एकओर साधा- रण मानवता उसे निगलने को तेयार है, तो दूसरी शोर विद्येषज्ञता उसे गिन-गिनकर सब स्थानों से निकाल रही है। उसकी रक्षा करो | देखो कि वह कहां है, केसे है, क्या कर रहा है ? तब देखोगे कि वहु कितना दिव्य है तब उसे श्रापके सामने आ्राने की हिम्मत भी होगी | और जब वह ज्ञान और विज्ञान के रथ पर चढ़ कर ग्रायेगा, तब उसकी आत्मा और भी विराट लगेगी। उसे जरा स्नेह से पुकारों तो ! श्रादमी,- जो मांगता है वह्दी मिलता है | श्राज साहित्य से श्राप मांगते हो 40/07709#07, 7970- 0029०70498 और वह मिलता भी है साहित्य से साहित्यकार को भांगो

# खा प्ू कक छा का कि

तो जरा 'मोहन मांग्यो आपन रूप ।' वह जरूर मिलेगा वह आपसे दूर नहीं है ।जरा सहम कर दुबक गया है क्‍या समभते हो कि कालिदास, होमर, शवसपियर और दांते यों ही कूद पड़े थे, मान मान मैं तेरा मेह- मान ? नहीं, युग ने उन्हें पुकारा था। बिना पुकारे तो भगवान भी गज के पास दोड़े-दौड़े नहीं गये | १६२६, १६३० में कलकत्त से स्व० श्री ईश्वरी प्रसाद जी शर्मा के सम्पादकत्व में एक हिन्दी साप्ताहिक निकलता था “हिन्दू पंच |” उसके मुख-पृष्ट पर लिखा रहता था--

“लज्जा रखने को हिन्दू की, हिन्दू जाति जगाने को आया हिन्दू पंच जगत में, हिन्दू धर्म बचाने को ॥”

मैं कहूं क्या कि “साहित्य तथा साहित्यकार” भी साहित्यकार को पुकारने के लिए, उसके उद्धार के लिए श्राया है !

खेर, क्यों झ्राया है यह जानने के लिए दूसरा साधन क्या है कि वह क्या कर रहा है। खाने पर ही तो भोजन का स्वाद मिलता है सो भोजन करने वाले, भ्रर्थात्‌ इस पुस्तक के पढ़ने वाले ही तो इसका निर्णय कर सकते हैं | लेखक श्रपत्ती श्रोर से क्या कहे “निज कवित्त केहि लाग नीका मैं तो 'मंगलजी” को धन्यवाद दू'गा कि उन्होंने मुझ से यह पुस्तक लिखवा ली शोर दिन रात प्र फ्र रीडिंग में गड़ गड़ कर सजधज के साथ प्रकाशित कर दी। श्रब मचले हैं कि “&7+% ए0०ए०) वाली पुस्तक तैयार कर दू" | देखू' क्या होता है। लिखवा ही लेंगे | इतना ्ौर कहना रह गया कि पुस्तक में संगृहीत लेखों में से कुछ, कल्पना तथा आजकल अंसी पत्रिकाप्रों में प्रकाशित भी हो चुके हैं।

--देवराज उपाध्याय

९,

अनुक्रम

साहित्य की प्रतिक्रिया

साहित्य श्रौर समाजवादी दृष्टिकोश साहित्य का स्वरूप

साहिध्य नहीं, साहित्यकार

साहित्य का विश्लेषण--श्राधार ठमरी साहित्य शरीर स्वप्न

साहित्य श्रौर ऐतिहासिक उपन्यास साहित्य और प्लेटो

साहित्य से साहित्यकार

से १४ १५० ढ़ डेप ७० ७३० प८४ ४५--१००

१०१०१ ३७ १२३८६--१६९६० १६१-२२५ २२६-२५२

साहित्य को प्रतिक्रिया

ईघसी भी रचना के सम्बन्ध में कितने ही तरह के मतभेद हो

कि, हैं परन्तु इससे सभी सहमत होंगे कि पाठक पर उसका प्रभाव पड़ता है, उसमें किसी तरह की प्रतिक्रिया जगती है श्रौर वह एक विशेष ढंग से प्रतिक्रिया-तत्वर होता है तुलली की विवयपत्रिका ने हुदय में प्रेम और भक्ति की मन्दाकिनी प्रवाहित कर दी, सूर के अ्रमरगीत ने पाठक को विरह-रस से श्राद्न कर दिया और बिहारी की श्य गारिक फुहारों ने हृदय को महमह कर दिया, भूषण के उद्गबोधनों ने इबते प्राणों में भी वीर रस का संचार किया तुलसी ने भक्ति-परक कविता की . पाठक ने भक्ति के भाव ग्रहण किये, सुर ने शव गार (विप्नलंभ) का रस-- राजत्व दिखलाया, पाठक को विरह रसास्वादन मिला, बिहारी ने श्वू गार काव्य लिखा, पाठक को श्र गार रस मिला, भूषण ने युद्ध के गीत गाये, पाठक में वीरत्व के भाव जगे।

इन सब उदाहरणणों से हम किस परिणाम पर पहु चत्ते हैं? यही न, कि जिस तरह का वर्षण्य विषय होगा उसमें अपने अनुरूप प्रतिक्रिया जगाने की शक्ति होगी। असमुक भाँति का विषय अम्रुक भाँति की प्रतिक्रिया ठीक उसी तरह से जिस तरह विज्ञान तथा मनोविज्ञान के क्षेत्र में उत्ते जक वस्तु (5४०प्राप8) तथा प्रतिक्रिया ( 83.00786 ) वाला सिद्धान्त काम

करता है बिल्ली ने चूहे को देखा, भपट पड़ी। यहां चूहा उत्त- जक पदार्थ का काम करता है भपठ पड़ना प्रतिक्रिया है, ॥०8]00786 है जो बिल्ली में जागरित होती है कविता को चूहे के स्थान पर रख लीजिये, पाठक को बिल्ली के स्थान पर बस, जिस साहित्यिक प्रति- क्रिया के संदर्भ में हम विचार कर रहे हैं वह बात स्पष्ट हो जायगी

आ्राज का युग यंत्रों का युग है। अधिकांश मानव व्यापार और व्यव- हार यंत्रों के द्वारा परिचालित होते हैं। यंत्र के द्वारा गृह को श्रालोकित किया जाता है, उसे साफसुथरा किया या बुहारा जाता है। हमारा भोजना- च्छादन, ग्रध्ययनाध्यापन, गमनागमन, आदानप्रदान सब कुछ यंत्राधीन है ऐसी परिस्थिति में मनुष्य की बुद्धि श्रथवा मस्तिष्क की प्रक्रिया पर भी यंत्रों का प्रभाव पड़े और वह यंत्रों के संदर्भ में सोचने लगे तो आ्राइचर्य की बात नहीं आपने किसी यंत्र में कपड़े डाल दिये, सिला सिलाया तैयार सूट आपके सामने आा गया; मशीन में श्राप ने लोहे के टुकड़े रखे ग्रोर बना बनाया लोहे का बत॑न तेयार | तब हम' यदि यह सोचने तथा विश्वास करने के लिये तत्पर हो जायें कि युद्ध विरोधी साहित्य श्र्थात्‌ उस साहित्य से जिसमें युद्ध का बड़ा ही भयावह चित्रण किया गया हो युद्ध-विरोधी भावों का “प्रचार होगा, शान्तिपाठ से शांति उत्पन्न हो, क्रांति से क्रान्ति; प्र चित्रण से प्रेम, घृणा से घृणा, तथा ईर्ष्या से ईर्ष्या की उत्पत्ति होगी तो यह श्रस्वाभाविक ही कहा जा सकता है। मनुष्य को मशीन बना देने की तथा उसे यन्त्रवत्‌ प्रतिक्रिया तत्पर होते देखे जाने की प्रक्रिया कई शताब्दियों से चल रही है। उसे हम 50777]08 और 768]00786 की सीमा में देखने लगे हैं

पर वास्तव में प्रश्न यह है कि मानव पर क्या इस सस्ते तथा सरल ढंग

किक.

से विचार करना भी होगा ? क्‍या वह इतने सीधे सादे ढंग से परि- चालित होता है कि बटन दबाया और रोशनी जल गई ? यदि एक क्षण के लिए यह मान भी लें कि वह ऐसा ही सीधा सादा तथा भोलाभाला प्रासी है और व्यावहारिक जगत में वह इसी तरह आचरण करता है तब भी प्रश्न यह उठता है कि साहि्यिक जगत में प्रवेश करने पर भी वह साधारण सांसारिक व्यविंत ही बना रहता है ? क्या साहित्यिक जगत प्रौर साधारण संसार मैं कोई प्रव्तर नहीं ? व्यक्ति श्रौर पाठक एक ही है ? बाजार से सौदा खरीद कर लाने वाले, पेट काट कर एक एक पेसा जोड़ कर बैंक बैलेंस बढाने वशले, ईट का जवाब पत्थर से देने वाले, प्रौर कालिदास का “अभिज्ञानशाकु तलम” पढ़ने वाले में या महादेव वर्मो की कविता पर सर थुन धुच् कर रोने वाले में कोई अच्तर नहीं ?

इस प्रइन की ओर हमारा ध्यान हठात्‌ इसलिये भी प्राकषित होता है कि जब हम विश्व साहित्य की अमर तथा प्रभगवोत्पादक एवं मानव की भाबात्मक सत्ता पर सर्वाधिक अ्रधिकार करने बाली क्ृतियों को देखते हैं ते पाते हैं कि बे दुखान्त हैं, 79280768 है, उनमें नाबक का पत्तन है मानों प्रकाश पर अन्धकार की विजय हो हाँ, सुखात्मक कृतियां भी हैं, (/0770०088 भी हैं जिनमें उल्लास के गीत गस्‍ये गये हैं, प्रशयोच्छुवास की कथायें कही गई हैं, हमें ग्र॒दगुदाने की चेष्टा की गई है, जीवन के सुलमय तथा उज्ज्वल पक्ष का ही चित्रण किया गया है। पर ये प्रभाव की दृष्टि से उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रही हैं श्रौर लोगो के हृदय की गंभीर लृष्ति के साधन बनने का गौरव नहीं प्राप्त कर सकी हैं। यह विरोधा-- भास कैसा ? लोगों को कहते तो यही सुना है 'रोप पेड़ बबूल का, आयाम कहां ते होय' पर हम बबूल का पेड़ रोपते हैं और उसमें श्राम का

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फल लगता है, वह करूणा जो 'भवभूति' से अधिक मूल्य नहीं रखती उसका उत्तर विश्व की विभूति बन जाता है। जीवन की जुगुप्सा साहित्य में प्राकर रस का उद्रे करने वाली किस तरह ही जाती है ?

इस प्रश्न पर इस ढंग से विचार कीजिये हमें युद्ध विरोधी साहित्य का प्रणायन करना है। हम चाहते हैं कि किसी ऐसी कहानी की रचना करें या कविता लिखें जिसे पढ़ कर पाठक में युद्ध के प्रति घृणा उत्पन्न हो और लोग अपनी मनोवृत्तियों को विश्वशान्ति की ओर केन्द्रित करें। हमें क्‍या करना चाहिये ? अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये क्‍या यह ठीक होगा कि युद्ध की विभीषिका का उम्र वर्शन उपस्थित किया जाय ? इसके द्वारा जो जन धन को श्रपार क्षति होती है उसका भयावह चित्रण किया जाय ? हिरोशिमा तथा नागासाकी का जीता जागता चित्र खींचकर रख दिया जाए ? क्या ऐसा करने से हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे ? युद्ध का दूसरा पक्ष भी होता है| युद्ध के कारण हमारे प्रन्दर प्रसुप्त वीरत्व के भाव जाग पड़ते हैं, देश, जाति, राष्ट्र तथा किसी सिद्धान्त के लिये सर्वस्व की श्राहुति कर देने की प्रवृत्ति भी जाग्रत होती है, संगठन में हढ़ता आती है, एकता की भावना बढ़ती है, हम अ्रनुशासन का महत्त्व सीखते हैं। इस रूप को भी अपने वर्रान में स्थान दिया जाय तो क्या पाठक में युद्ध के प्रति श्राकषित होने तथा उसमें युद्धप्रियता के भाव उत्पन्न होने की सम्भावना हें ? युद्ध का मानवीय वर्णन क्या पाठकों में युयुत्सा के भाव उत्पन्न करेगा ?

इसका दो टूक उत्तर देना कठिन है पर यदि कोई यह कहता है क्‍ कि युद्ध के दुर्धध तथा लोमहर्षक वर्शान से युद्ध के प्रति आ्रासक्ति के भाव

जो ऐड -

उत्पन्न हीनेकी झ्राशंका है तो हम उसमें निहित सच्चाई के प्रति उदासीन नहीं हो सकते यह बात युद्ध ही के लिए नहीं, सब तरह के भावों के लिए लागू हो सकती है कम से कम यह तो सही ही है कि किसी भी विषय की भीषणता, कबष्टप्रदायकता तथा पीडोत्पादकता में नैसगिक रूप से तद्विरोधत्व या तद्बाधकत्त रहता हैं इस सिद्धांत को ठीक मानने में कई तरह की ब्रडचनें हो सकती हैं

पहली बात तो यही है कष्ट और पीडायें पाठक के हृदय में वीरता के भावों के लिए आधार प्रस्तुत कर सकती हैं। यह साधारण सी बात है कि वीरगण अपने उदंश की सिद्धि के लिए बड़े से बड़े बलिदान के लिए तेयार रहते हैं, कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं, देश भक्ति के उन्‍्माद में हमने स्वयंसेवकों को पुलिस की संगीनों को हंसते- हंसते छाती पर लेते देखा है प्र्थात्‌ समीकरण यह हुआ कि जितना ही प्रधिक कृष्ट, बलिदान, पीड़ा उतनी ही बड़ी वीरजयमाला। वीर को कष्ट सहना पड़ता है इस सिद्धान्त से जरा सा घिसक कर इस सिद्धांत पर झा जाना कठिन नहीं कि जो कष्ट सहता है वह वीर है। श्रतः वीर कष्ट से डरे क्‍यों ? ठीक है, युद्ध में कृष्ठ उठाना पड़ता है, जन धन संहार होता है, नगर के नगर उजाड़ हो जाते हैं। तो इससे क्या ? इइक में लाखों हजारों बस्तियां फुक जाती हैं, आशिक शायद ही कभी फूलता फलता हो पर इससे क्या वह अपने प्रेमपथ से विचलित होगा ? नहीं

मैं एक सच्ची घटना बताऊ' | मैं बहुत ही कायर व्यक्ति हूं मैं सदा यही सोचता हूं कि यदि विपत्तियां सामने आकर खड़ी हो जाय॑ तो क्या कूद गा ? दुम दबा कर भाग जाऊगा या डढ कर उसका सामना कर गा?

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मैं जब कांग्रेस में काम करता था श्रौर कभी-कभी जब सरकार-विरोधी' भाषरा देता था तो यही सोचता था कि पुलिस गोली चलाने लगे तो क्या होगा ? इसी तरह की दोलायमान चित्तवृति में मैंते अपने एक आ्रार्य- समाजी और काँग्रे सी मित्र से अ्पती बात कही और पुछा कि कृपया बतलाइये, . कि इस परिस्थिति में आ्रापकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? उत्तर में उन्होंने नो कहा वह आ्राज भी मेरे कानों में गू ज॑ रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक विपत्ति नहीं भ्राई रहती है, पुलिस की बन्दूक नहीं उठी रहती है तब तक तो चित्त जरा चंचल रहता है जरूर, पर जब भय की सामग्री सामने प्रा खड़ी होती है तो चित्त स्थिर हो जाता है, उस समय कोई विकल्प नहीं रह जाता | बस, भय के मुख को पकड़ने की ही बात रह जाती है

इन बातों को जब मैं श्राज अपने स्थृति-पठटल पर लाता हूं तो दो कवितायें बरबस याद झा जाती हैं-एक संस्कृत का इलोक और दुसरा उद्ू का एक दीर। संस्कृत का इलोक यों है---

तावदूभयस्य भेतव्य यावद्‌ भयमनागतम्‌ आगतं तु भर्य वीक्ष्य नरः कुयात्‌ यथोचितम

दूसरा उदू का शेर है--

रग-रग तड़प रहा है नया रंग देख कर कातिल भी है, छरी मी है, मेरा गला भी है

बातें तो और भी याद ग्राती हैं जिनमें एक यह भी है कि जब खुदी« राम बोस फांसी के तख्ते पर चढ़ रहे थे तो प्रसन्नता के कारण उनके शरीर के भार में भ्रभिवृद्धि हो गई थी

हैं आओ

इस दृष्टिकोण से प्रस्तुत समस्या पर विचार करें तो क्‍या ऐसा अनु. मान नहीं होता कि मनुष्य में कष्ट सहते की, दुःख से उलभने की, दुख को पछाड़ कर विजय सुखानुभृति प्राप्त करने की नैसगिक श्राकांक्षा होती है भौर वह अपना भोजन मांगती है ? क्या शिवजी हलाहल को प्रसन्नता- पूर्वक नहीं पी जाते हैं, गले में सपों तथा कबन्धों की माला धारण करके प्रातन्दित नहीं होते हैं, श्मशान भूमि में रुण्ड मुण्डों से बगोडा नहीं करते एवं ताण्डव कर प्रलयंकर नहीं बन जाते ? तब हम यह केसे कह सकते हैं कि किसी वस्तु का भयावह चित्रण कर, उसकी विभीषिका दिखला कर, रक्त की नदियां बहा कर हम पाठक के हृदय में भय का संचार कर देंगे, उसके हृदय में घृणा, विराग के भाव उत्पन्न कर देंगे। ऐसा भी मान लेने के लिए पर्याप्त अवसर हैं कि जिस विभीषका को खून में रंग कर हम लाल कर रहे हैं वह इतना चमक उठे कि उसमें रस पड़ जाय और ग्ापको वह श्रपनी ओर खींचने लगे

इस पहलू पर विस्तार पूर्वक तो एक क्षण बाद विचार होगा पर इस दृष्टि से भी क्‍यों सोचें कि किसी विषय काग्रति चित्रण, रसस्य युक्ति : पुनः पुन: मानसिक कुण्ठा भी उत्पन्न कर सकती है, बुद्धि की धार को भोथर भी कर सकती है। मानस की वह दशा कर दे सकती है कि वह वरणित विषय के प्रति उदासीन हो जाय और उसके प्रति किसी प्रकांर का क्रिया-तत्परत्व उसमें थ्रा ही नहीं सके उदाहरण के लिए श्र ग्रेजी के प्रसिद्ध उपन्यासकार टामस हार्ड़ी के प्रसिद्ध उपन्यास 888 ०0 ४06 ॥0! [7/0७०४ए7[68 को लीजिये। टेस पर मानों खुदा की मार है। वह जन्मजात ग्रभागिन है। जहाँ कहीं भी जाती है वहाँ उसका दुर्भाग्य पीछा करता है। ऐसा लगता है कि नियति ने उसे इसीलिए ही निर्मित किया है कि उसके

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साथ दारुण तथा लोमहर्षक खेल-खेला जाय हम एक बार देखते हैं कि बह विपत्तियों का शिकार हुई, हमें उसके साथ सहानुभूति होती है पर जब हम बार बार उसे विपत्तियों में पड़ते देखते हैं, उसने सुवर्शा का स्पर्श . किया नहीं कि मिट्टी बन गया, तब हममें एक मनोवेज्ञानिक औदासीत्य ( 7287070]08709!| (५]पए ) शभ्रा जाता है। हम कहां तक सहानु- भृति दें। यदि वह इसी के लिए बनी है तो हम क्‍या करें ऐसी मनोवृत्ति हो जाती है। एक बार भी भाग्य ने टेस का साथ दिया होता तो बात भी थी

जैनेद्र ने त्याग पत्र किसी की डायरी हाथ लग जाने की बात कही श्रौर विश्वास दिलाया कि उसी डायरी को जरा सम्पादित कर वे प्रकाशित कर रहे हैं तो बात समभ में श्राई आर पाठकों ने उसे सत्य समझ कर उस पर विश्वास भी किया | पर बार बार जब वही बात होने लगी, कल्याणी में भी वही बात, यहां तक कि झ्रागे जयव्रधेल में भी वही बात, तो पाठकों के लिए इस भ्रम के जाल को तोड़ना सहज हो गया और अ्रद्य उनमें इस तरह के कौशल के प्रति उदासीनता शभ्रा गई

मान लीजिये कि कोई कवि एक युद्ध विरोधी श्रथवा पूंजीवाद विरोधी महाक्ाब्य लिख रहा है। यह निश्चित है कि उस्ते बाध्य होकर युद्ध की दारुणता, महानाश, प्रलयंकरता का अतिमात्रिक चित्रणा करना ही पड़ेगा वह इससे पीछा छुडा ही केप्ते सकता है जब वहु इसीके लिए प्रतिश्षत है पूजीवांदी शोषण के भयानक हृश्यों का चित्रण करना ही पड़ेगा लेखक के बावजूद भी उप्तकी कलात्मक प्रतिभा का एक बृहुद भाग दूसरी भ्रोर प्रेरित होगा जब ऐसी बात पझनिवार्य है तो यह

आर

भी सही है कि उस वर्रान में एक शक्ति होगी,. श्राकर्षण होगा, उसमें प्रपील होगी, वह आमन्त्रित करता सा जान पड़ेगा और पाठक के हुदय में वह भाव जगेगा जिसे भयंकरता के प्रति मोह (#9800&#07 07 ए९४!77688) कह सकते हैं। हमने देखा है कि सांप कितने भयंकर होते पर उनके व्यवहार से ऐसा भी लगता है कि उनकी भयंकरता में पक्षियों को सम्मोहित करने की शक्ति भी होती है। दीपक की लौ कितनी गर्म होती है, जला देने वाली होती है पर उसमें सम्मोहन भी होता है जो परवानों को अ्रपनी श्राहुति कर देने के लिए प्रेरित करता है

साहित्य के क्षेत्र में ऐसी घटनायें घटी हों सो भी बात नहीं मिल्टन के पाठकों से यह बात छिपी नहीं है कि वे साहित्य के द्वारा, विशेषतः 7979व88 09 तथा 79/७१88 हि88४ए8व के द्वारा शैतान पर धाम्मिकता की विजय का तिर्धोष करना चाहते थे पर साहित्य में कुछ ऐसी रहस्पमयी क्रिया हुई है कि शैतान अपनी शैतानियत को विकरालता एवं दुर्घघता के साथ, बल्कि उसीके कारण, झ्ाकर्षक बन बेठा है। कौन नहीं जानता कि वॉक्सपियर ने शाइलक को कितना गिराना चाहा है, कितनी गहरी काली स्याही उस पर पोतनी चाही है पर यह जो शाइलक है, वह शैक्सपियर के चंगुल से किसी किसी प्रकार निकल कर पाठक को सहानुभूति पर अधिकार करने लगा है विद्यावियों को जाने कितनी बार इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ा होगा कि 509५9]00 एछ8 77076 छांश्श6ते ब8छांएओ सिक्ष) छाणेणांएर प्र्थात्‌ शाइलक उतना अपराधी नहीं जितना कि उसके विरुद्ध अपराध किया गया है

प्रेमचन्द गोदान में श्रपती सारी सहानुभूति होरी को देना चाहते थे

असामाक , ट्ट्‌ न्‍नाा

पर बात कुछ ऐसी हुई कि मालती का चित्रण श्रधिक सरस हो उठा श्रौर बह चोरी-चोरी दबे पांव आकर पाठक की सहानुभूति की अधिकारिणी हो उठी चूकि साज्ती जिस अधिकार का दावा पेश करती है उसमें एक कौशल है, सफाई है, तर्ज श्रदा है, श्रतः उसमें व्यंग्य या ध्वनि का मज़ा है। होरी में वाच्यार्थ है तो मालती में व्यंग्यार्थ है मालती भ्रपने प्रधिकार को व्यंग्यत्व की दशा तक पहुंचा देती है, होरी में तो ज्यादा गुणी भूत व्यण्य ही है। मालती भ्रधिकार के लिए लड़ती तो है पर हाथ में तलवार नहीं लेती है इसी लिए इसकी सादगी पर मर जाने की इच्छा हो जाती है। होरी तो शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित हो प्रेमचंद के नेतृत्व में सेना लेकर हमारे हृदय की सहानुभूति पर धावा बोलता है

मनुष्य के स्वभाव में ही विरोधाभास रहता है। उसके भीतर सदा ही दो विरोधी प्रवृत्तियों में संघर्ष चला करता है वह जिसे प्यार करता है उसके प्रति घृणा के भाव भी उसमें कहीं कहीं पलते रहते हैं। बह श्रांखों भें श्रांस भर कर हंसता है श्रोर खिल-खिल कर रोता है। इस विरोधाभास को हम एक भूल, गलती, च्रुटि या दोष कह कर हो सनन्‍्तोष नहीं कर ले सकते यह उसकी जैविक श्रनिवार्यता है, 00808) 760688709 है। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जिस तरह से उन्हें निसर्ग से श्रन्य प्रवृत्तियां मिली हैं, उसी तरह यह भी उनमें से एक है

यही देखिये न। प्रकृति ने हमें उन सब साधनों से सम्पन्न किया है जिनसे हम सुरक्षित रह सकें, सर्वप्रयोजनमौलिभूत श्रानन्द को प्राप्त कर सकें, शिशिर ऋतु में भी बिस्तर पर पड़े-पड़े लिहाफ की गरमाई का मजा ले सकें। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ सब हमारे सुखसम्पादन में सहा-

ककया, ड़ ई0... डक

यता देने के लिए प्रस्तुत हैं ये हमारे लिए वरदान-स्वरूप हैं। पर : प्रकारान्त से अभिशाप भी हैं। कारण कि इनका अ्रस्तित्व ही इस बात का प्रमाण है कि इन साधानों के प्रयोग के लिए क्षेत्र चाहिये। इसका प्रथ यह होता है कि इन साधनों के चलते ही, इन्हीं के कारण ही हमारे श्रन्दर एक संघर्ष, युद्ध, छटपट, त्वरा,यह कर,वह्‌ कर सदा चलता रहेगा। जब तक यह हलचल बनी रहेगी तब तक हमें कहाँ शांति, कहाँ चैन की साँस। भूत तो हमारे बस में हो गया है अ्रवश्य और वह ऐसा शक्ति सम्पन्न है कि हमारे मु से कोई श्राज्ञा निकली नहीं कि उसने पुरी कर के दिखला दी पर उसे तो काम्र चाहिये काम नहीं होगा, वह व्यस्त नहीं रहेगा तो व्यक्ति को ही खायेगा अतः कम से कम उसे काम देने की, व्यस्त रखने की ही चिता हमें खाती रहेगी कहाँ हमने भूत को इस- लिए बस में किया था कि हमें सुख होंगा पर वही दुख का कारण हो गया यही मानव है और उसका जीवन विरोधों का पुज ||

हम उत विरोधों में से किसी को भी घृणा की दृष्टि से नहीं देख सकते ये विरोध हमारे जीवन के मूलाधार है, इनमें से हम किसी को छोड़ नहीं सकते श्नौर यदि इन्हें जीवन में नहीं छोड़ सकते तो साहित्य में ही केसे छोड़ सकते हैं, जो जीवन के प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है

तब साहित्यिक क्या करे ? यदि युग के श्यामल, ध्वंशका री, जुग्मप्सा- जनक चित्रण उपस्थित करने से उसके प्रति अनुराग होने तथा पाठक में युद्ध मनोवृत्ति के उत्पन्न होने की सम्भावना है तो क्या यह भी सम्भव है कि युद्ध के प्रति नये हृष्टिकोण रखने श्रर्थात्‌ उसके कोमल चित्र खींचने से, उसके दिव्य तथा उन्नत पहलू दिखलाने से, उसके ग्र॒णानुवाद करने से

2998: हे

युद्ध के प्रति वेराग्य उत्पन्न हो और हमें शांति के उपासक होने में सहायता मिले। यदि युद्ध के मानवीय पक्ष को दिखलाया जाय, युद्ध जन्य परि-- स्थितियों के कारण पारस्परिक संगठन की भावना का बिकास दिखलाया जाय, :कष्टसहिषणुता की श्रभिवृद्धि की बात कही जाय, प्रात्मशक्ति श्रौर पौरुष का चमत्कार दिखलाया जाय तो पाठक पर केसा प्रभाव पड़े ?

जो हो, इतना अवश्य है। ऐसे साहित्य के द्वारा युद्ध जेसे दुद्ध र्ष तथा भयंकर वस्तु के प्रति भी एक शांतिमय दृष्टिकोण से देखते की प्रवृत्ति जगेगी | हम युद्ध को भी सांस्कृतिक हृष्ठि से देखना सीखेंगे इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विवास बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। हम युद्ध के वातावरण में भी शांति को झलक पायेंगे मानों श्र धकार में प्रकाश की . रेखा चमक रही हो | और जब प्र धकार में प्रकाश की रेखा चमकेगी तब वह प्रकाश की बाढ़ में छिप जाने वाली रेखा से कहीं अधिक प्रभावोत्पादक होगी हम में आालोचनात्मक मूल्यांकन के भाव जगेगे और साथ ही हृदय में इस बात की ध्वनि जगेगी कि मानवता की सच्ची सेवा शांति के साधनों से ही होगी युद्ध के उपादानों से नहीं

शांति यदि युद्ध से श्रष्ठ है, उच्चतर है, श्रधिक वांछनीय है तो इसका सब से ग्रधिक प्रामारिक आधार इसी बात से दे सकते हैं कि इस युद्ध के प्रति भी हमारा दृष्टिकोण शांतिपूर्ण है, विद्वे षयुक्त या घुणा ूर्णा नहीं बिच्छू डंक मारता जाय, पर साधु उसकी रक्षा से मुख नहीं मोडेग। इस तरह साधुता को डंका पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। कम से कम साधुता का स्वरूप तो निखर कर सामने आायेगा। यदि बिच्छू के डंक की चोट लगते ही साधु भी बिच्छू के इंक को तोड़ने

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के लिए तत्पर हो जाय तो कहां गई साधुता बिच्छू डंक-हीन होने से भले रह जाय पर साधु की साधुता की भटद्द तो उड़ ही जायेगी |

इस सम्बन्ध में एक विचारक की उक्ति बड़ी हो उपयोगी है 7.० 006 एछ97 08 एप 707ए97व 988 8 2प्रप/क एछए [6, 88 076 00कणणधहों 0 8076 77 छाका 7990776 0080 98 90700फ724ए #प्रशक्ष्य ध्शवे ए0प फवैप०8७ 77 ॥86 76906 506 ईप88 [008870]8 789[00786 60. 997, [0762880ए 8प्द '& 788.00788 88 गगांहए। 0680 684 0088 600 9[07809॥8 6008 [07087906 छ9५8 0 ]069806. अ्रर्यात्‌ श्राप एक काम करें। युद्ध का वर्णन इस ढंग से करें मानों वह हमारे सांस्कृतिक जीवन का अ्रग हो, एक ऐसा व्यापार हो जिसमें मानवीय गुणों का अधिकाधिक विकास करने का श्रवसर मिले परिणाम यह होगा कि मनुष्य में युद्ध के प्रति पूर्ण प्रतिक्रियातत्परत्व जगेगा और वह प्रतिक्रिया ऐसी होगी जो मनुष्य में जोवन के शांति भय उपायों के प्रति श्रभिरुचि जागृत करेगी

- साहित्यिक प्रतिक्रिया के इस पहलू पर विचार करते समय अश्रर्थात्‌ युद्ध या किसी भी विषय पर सांस्कृतिक हृष्टिकोश श्रथवा मानवके नेस- गिक .विरोधाभास की बात करते समय वर्डस्वर्थ के विचार याद हो जाते हैं जो उसने कविता और छुन्द के पारस्परिक सम्बन्ध पर प्रगठ किये हैं। उसका कथन है कि काव्य का ध्येय ऐसी उत्त जना उत्पन्न करना है जिसमें आनन्द का पुट अत्यधिक है। पर उत्तेजना तो मानस की

ग्रसाधारण या विषम अ्रवस्था मानी जाती है। इस ब्रवस्था में विचार प्रौर भाव किसी प्रशस्त मार्ग का अ्रनुसरण नहीं करते यदि उत्तेजना

ज्न्शई *

को उद्दीप्त करने वाले अति सशक्त चित्रों एवं भावों के कारण प्रनुपात से अधिक वेदना का पुट गया तब इस बात का भय है कि उत्ते जना का रूप अ्पती उचित सीमा को लांघ जाय परन्तु यदि वहां कुछ ऐसी चींज का समाधाधिकरणत्व हो जो नियमित्त है, जिससे माोनस की विविध अवस्थायें कम उत्त जना के अ्रवसरों पर परिचित हैं तो इसका ग्रच्छा प्रभाव पड़ेगा | परिशाम यह होगा कि साधारण भावों के मिश्रण के कारण उत्ते जनां से अंसम्पकित भावों के कारण उत्तेजना संयमित होगी, यह निबिवाद सत्य है श्रतः यद्यपि ऊपरी तौर से देखने पर यह विरोधाभांस सा भले ही मालूम पड़े पर इसमें किसी भी तरह की शंका की गु जाइश नहीं कि छुंद के कारण भाषा की वास्तविकता कुछ ग्र में पुड जाती है और सारी रचना के ऊपर वास्तविक सत्ता की भ्रद्ध चेतना छा जाती है तथा अधिक कारुशिक अ्रवस्थायें और भावनायें जिनमें वेदता का भ्रश ज्यादा है वे छन्दोबद्ध विशेषतः तुकान्त काव्य में गठ्य से भ्रधिक सहनीय हो सकती हैं

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साहित्य अ्रीर समाजवादी दृष्टिकोण

दीपाभा444 67/५.3००+००+०#-००:४०५४/4-बनननन जपि++ननिननननन-ननननिननन ननननननन नी नानी न्‍कनी किन तन ननन्‍॑ मी नल ++++-++न लत लिलिललभ तन नली अन+ मम नमन लजल तल जल तन त- 5

ले की विचार गोष्ठी में प्रनेक वक्‍ताओं ने साहित्य श्लौर सामयिकता कर भिन्न भिन्न दृष्टि कोण से भ्पने विचार उपस्थित किये, साहित्य के श्रभेक पहलुश्ों पर अपने मत श्रगट किये विशेषतः, साहित्य को समाजवादी दृष्टिकोण से देखने की चेष्ठा की गई और यह कहा गया कि साहित्य को अपने समय का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, उसकी समस्याग्रों से जूभना चाहिए तथा उन्हें सुलभाने में मानवता की सहायता करनी चाहिए हम उस रचना को साहित्य का गौरव नहीं दे सकते जिसमें समाज को उन्नति-पथ की ओर अग्रसर करने वाले तत्व वक्त मान नहीं हों जो साहित्य हमें श्रपनी समस्याश्रों को ठीक तरह से स्मभने और बूमने की शक्ति नहीं देता है वह अपने कत्त व्य का पालन ठीक तरह से नहों करता। यह समाजवादी दृष्टिकोण है, जिसमें व्यक्ति से अधिक समाज को महत्त्व दिया जाता है। इस दृष्टिकोण के सम्बन्ध में मुझे कुछ कहना नहीं है। इस दृष्टिकोश से भी लोगों ते साहित्य को देखा प्रौर परखा है और बहुत सी महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं

परन्तु मेरी दृष्टि में इस तरह से किसी कलात्मक वस्तु अथवा साहि-

ल्यिक रचना पर विचार करना सभीचीन नहीं है। साहित्य श्रभिव्यक्ति है और अभिव्यक्ति में व्यक्ति की स्वतन्बता की धोषणा होतो है जब जब मनुष्य के प्रन्दर भ्रभिव्यक्ति की प्रेरणा होगी है तब-तब वह सब के ऊपर अपनी ही सत्ता का उद्घोष करता है इसलिए श्रच्तिम विश्लेषण में साहित्य व्यक्ति की ही प्रभिव्यक्ति हो जाता है। यहाँ पर ग्रभिव्यक्ति शब्द प्र ही हमें ध्यान देना चाहिए इसमें “दो शब्द हैं प्रभि और व्यक्ति अ्रभि उपसर्ग का जो भी अ्र्थ हो परन्तु इस पूरे यौगिक शब्द से व्यक्ति की ही प्रधानता निश्चित होती है। श्राप एक श्र कुर की केल्यता कीजिए जो पत्थर की छाती फाड़ कर निकल पड़ता है पत्थर के सामने एक कोमल ञ्रकुर की क्या हस्ती है ? पत्थर चाहे तो एक क्षण में उसे ससल कर चकना- चूर कर दे सकता है लेकित फिर भी श्र कुर निकल कर ही रहता है

इसी तरह मानव शरीर, मस्तिष्क तथा हृदय के किसी कोने में व्यक्तित्व का बीज, सार-तत्व छिपा पड़ा रहता है, सब श्रोर से निराहत। यह कोई श्रावश्यक नहीं कि वह सदा निराहत और उपेक्षित ही हो कभी कभी ऐसा भी होता है कि समाज के द्वारा उसे मान्यता भी आप्त हो यदि ऐसा होता है तो उसी समय एक महात्‌ कला का सृजन होता है परन्तु प्रायः मनुष्य के व्यक्तित्व की निराहत तथा उपेक्षित होने का ही गौरव प्राप्त होता है। इस निरादर और उपेक्षा की ठोकर से एक चिनगारी निकलती है। वही साहित्य का पूर्व रूप है.। साहित्य में साहित्य कार का व्यक्तित्व बोलता है प्रौर वह सारी विध्नवाधाश्रों को ललकारता सा दीख पड़ता है।

खैर, यह बात एक क्षण के लिए अलग श्रलग भी रखी जाय प्रवति

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साहित्य में व्यक्ति की श्रभिव्यक्ति होती है या समाज की इस प्रश्न को फिलहाल स्थगित भी कर दिया जाय तो प्रश्न यह उपस्थित होगा कि जिसे हम उन्नति कहते हैं या पतन कहते हैँ वह क्या चीज है ? उसका सच्चा स्वरूप क्या है ? कौन सी ऐसी कसौटी है जिसके आधार पर कहें कि ग्रमुक पद्धति से अमुक सिद्धाल्तों का प्रतिपादन करने वाला साहित्य उंनन्‍्ता- यक है और इससे विपरीत रहने वाला साहित्य पतन की ओर ले जाने बाला है। कल “किसी ने अपने भाषण के मध्य में कहा कि उपाध्याय जी का दृष्टिकोण तो संतों का है-'रपठट जा जा के लोगों ने लिखा दी जाके थाने में, कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में' पहले तो यही बात विवादास्पद हैं कि हमारे देश के सांस्कृतिक उत्थान में संतों से क्‍या योय दिया ? कबीर ने, तुलसी ने या सर ने मानवता की अधिक सेवा की प्रथवा गांधी, नेहरू या'लेनिन-स्टालिन ने, श्रथवा डांगे ने या सम्बूद्री पाद की सरकार ने ? इसका निर्णाय भविष्य का इतिहास करेगा।

दूसरी बात यह कि जब तक दुनियां का ग्रन्त हो जाय और उसके भ्रन्‍्त होने के बाद नेखा जोखा लेने के लिए कोई बाकी रहे तब तक यह केसे कहा जाय कि श्रमुक विचारक के अम्ुक सिद्धान्त ने विश्व की सर्वाधिक सेवा की है। नैयायिकों ने सिद्धान्त तो,बना दिया कि “यत्र-तत्र धूमः तत्र ततन्न वहि:” और यह लोग मानते भी हैं। फिर भी इस सिद्धान्त में कुछ आशंका की ग्रु॒जाइश है और लोगों ने इसकी सा्वभौमता और सार्वकालिकता में शंका भी प्रकट की है। उनका कहना है कि जब तक संसार के सब स्थानों और सब समयों-भूत भविष्य और वत्त मान-में धूम और अग्नि का साहचर्य देख लिया जाय तब तक धूम से अग्नि का अनुमान केसे सम्भव हैं? और यह बात एक तरह से असम्भव है कि

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आदमी सार्वकालिक और सार्वभौम हो सके उसी तरह किसी साहित्य के द्वारा समाज की उन्नति का बतलाया गया मन्त्र श्रन्त में चल कर समाज के लिए हित कर ही होगा इसका कौन दावा कर सकेगा ?

१८ वीं शताब्दी में वाल्टेयर और रूसो ने समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुता का नारा बुलन्द किया परन्तु इतिहास साक्षी है कि उन नारों से विश्व की कोई विशेष सेवा नहों हो सकी क्रान्त्रि रक्त की धारा में बह गई श्रौर जाकर कोठेशाही में छिप गई

मैं बहुत से ऐसे श्रादभियों को जानता हुं जो जीवन भर लोगों की निन्‍्दा के पात्र रहे, लोगों ने उन्हे समाज का शत्रु समझा और उन्हें भांति भांति की यन्त्रणाओओं के द्वारा पीड़ित करने की चेष्टा की पर श्रन्तिम

समय में मरने के पहले वे ऐसा काम कर गये कि उनके विषय में मनुष्य की भावनाश्रों में भयानक क्रान्ति हुई, लोगों ने श्रकचका कर देखा कि श्ररे

जिसे हमने शत्रु समझा था वह तो हमारा परम मित्र था श्र उसके हृदय में हमारे लिए दूध की धारा ही बहती रहती थी दूसरी ओ्रोर ऐसे आदमियों के भी उदाहरण हैं जो जीवन भर मानवत्ता के हितेषी समझे जाते रहे, समाज सेवियों में उनको गणना होती रही परन्तु मरने के बाद लोगों ने देखा कि वह तो समाज का पक्का शत्रु था। इसलिए कहता हूं कि साहित्य जेसी जटिल वस्तु पर भट से कोई फतवा दे देना ठीक नहीं

साधारणतः लोगों का विचार यह है कि साहित्य में समाज का -तात्कालिक समाज का-प्रतिविम्ब पड़ता है श्ौर नहीं पड़ता है तो पड़ना ही चाहिए। श्रागे बढ़ कर यह दृष्टिकोण यथा्थंवादी हृष्टिकोश से मिल कर एक हो जाता है-वह यथार्थवादी दृष्टिकोश जो साहित्यकार

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के व्यक्तिगत जीवन श्रौर उसकी रचना को एक कर के देखने की सिफारिश करता है। उसका कहना है कि व्यक्ति के जीवन में जो घटना घटती है उसी की ऋलक उसके साहित्य में मिलत्ती है। वे लोग साहित्य पर बहुत सस्ते ढंग से विचार करते हैं वे समस्या को (0४७/-४॥7770॥7%9 करके देखते है। मैं इस तरह के (0४8७४ 879])770%8%07 का सख्त विरोध करता हूं “हम, उन सब किताबों को काबिले जब्ती समभते हैं, जिन्हें पढ़-पढ़ के बेटे बाप को खफ्ती समभते हैं” इसी तरह जो दृष्टिकोण साहित्य को सरमयिकता अथवा यथार्थवादिता या किसी सिद्धान्त के सीधे सादे फाम्रु ला के आधार पर काट-छांट कर रख देता है उसे हम बहुत गौरव नहीं देते

में साहित्य सूजन तथा स्वप्न निर्माण -को एक नहीं समभता दोनों भिन्न-भिन्न कोटि की चीजें हैं। परन्तु दोनों की प्रक्रिया में कुछ समानता अवश्य है। जीबन की वास्तविक घटनाओं के आधार पर ही स्वप्नों का निर्माण होता है और साहित्य में भी लेखक की व्यक्तियत घटनाओं का प्रभाव हो सकता है। परन्तु स्वप्व जिस रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं बह वास्तव से इतना परिवतित हो जाता है कि मूलोदगम से उसका बहुत ही कम सम्बन्ध रह जाता है और उस मूल से वह गणात्मक रूप से परिवर्तित नज़र आता है।

एक उदाहरण लीजिए | एक नवयुचक्त फेरीवाले ने किसी ग्रहिसी को गोभी के सड़े फूल दिये। वह ग्रहिणी इस तरह ठगी जाने के करण बहुत श्रसन्तुष्ट है। श्रब स्वप्न में वह बालक फेरीवाला एक भीमकाय व्यक्ति के रूप में उपस्थित होगा जिसकी लम्बी-लम्बी दाढ़ी और मूछें हों

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यह भी सम्भव है कि इस घटना के कारण उस गृहिणी के मानस का वह तंत्र भंकृत हुआ हो जिसे इल्कट्रा ग्रन्थि कहते हैं यह ठगी हुई नारी स्वप्न में बालिका बन जा सकती है भौर अपने जन्म स्थान पर लौट कर अपने पिता को क्रोधावेश में तकिये से बार-बार मारने लग जा सकती है। अब यह सोचने की बात है कि फेरीवाल के द्वारा ठगी हुई नारी तथा अपने पिता को बार-बार तकिये अथवा भाडू से मारने बाली बालिका में कितना अन्तर है ?

इसी तरह सम्भव है कि किसी साहित्यिक रचना के निर्माण में थोड़ा सा हाथ जीवन की व्यक्तिगत घटनाश्रों का भी हो परन्तु साहित्य में आते श्राते उनके स्वरूप मे इतना क्रांतिकारी परिवतंन हो जाता है कि मूल का पता लगा लेना कठिन है और ऐसा करना खतरे से खाली भी नहीं है प्रेमचन्द ने कह तो दिया कि सूरदास की कल्पना उन्हें एक अन्घे भिखारी को देखकर मिली थी परन्तु इतने मात्र से ही रद्जभूमि की रचना नहीं हो सकती रंगभूमि की रचना के लिए प्र मचन्द की कल्पना, उनकी अनुभूति तथा उनके जीवन के सार तत्व के रसायन को इस तरह सक्रिय होना होगा कि वह घटना अपने सत्स्वरूप का त्याग कर श्रात्म-विसर्जन कर देती है श्नौर शुद्ध काल्पनिक रूप में उपस्थित होती है। श्रतः इस काल्पनिक अनुभूति को ही साहित्य का मूलतत्व समभना चाहिये। आत्मा- नुभूति जब तक साहित्यानुभूति श्रथवा काव्यानुभूति का रूप धारण नहीं कर लेती तब तक साहित्य सजन नहीं हो सकता

हिन्दी साहित्य में तो नहीं परन्तु श्र ग्रजी साहित्य के कथाकार हेनरी जेम्स ने यह दिखलाने का प्रयत्न किया है कि उपन्यासों के बीज

काम र्‌ |

उन्हें कहाँ से मिले और वे बीज किन किन परिस्थितियों में कहाँ कहाँ से रस खींचते हुए उपन्यास रूपी वृक्ष का रूप धारण कर सके। प्रपने उपन्यास 570॥8 06 09709 के मूल उद्गम की उन्होंने बतलाया है कि एक बार वे किसी पार्टी में सम्मिलित हुए वहाँ पर एक मित्र ने चार्तालाप के सिलसिले में एक घटना का उल्लेख किया एक मां है और उसका इकलौता पुत्र है। मां अपने पुत्र को बहुत प्यार करती थी और पुत्र भी माता के प्रति सश्नद्ध है। उसके पिता की मृत्यु सन्निकट है पिता के पास कुछ बहुत ही मृूल्यवान फर्नीचर है अ्रब इसी फर्नीचर के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर मां और पुत्र में इतना वेमनस्थ बढ़ गया है कि श्राज वे एक दूसरे के जानी दुश्मन हैं। बात इतनी सी ही थी पर इसी ने किसी रहस्यमय ढंग से व्यक्तित्व के उस स्तर को छू दिया जहाँ से सृजन की क्रिया प्रारम्भ होती है और एक उपन्यास की रचना हो गयी प्र उस उपन्यास के पाठक जानते हैं कि उपन्यास की शाखाग्रों और प्रशाखागों की जटिल संकुलता में से इस मूलतत्व को पा लेना कठिन हैं उसकी कोई सार्थकता भी नहीं

मैंने कभी एक चित्र देखा था। वह चित्र एक वृक्ष का था उस चित्र के नीचे लिखा था कि इस वृक्ष में एक बन्दर छिपकर बेठा है, खोज निकालिये सच कहता हूं कि मैंने बहुत ही कोशिश की पर उस बन्दर का पता नहीं चल सका। बन्दर वहाँ पर हो, हो, हो, हो, इससे क्या ? हमें तो वृक्ष से काम है और उसका सौंदर्य अ्रपने पूर्ण गौरव से मेरे सामने उप- स्थित था |

साहित्य का काम ! बहुतों ने कहा है, सुधार करता है, हमारा मार्ग

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इर्शन करना है, उसे प्रशस्त करना है। मेरा विचार है कि ऐसा कहना लक्ष्य से ऊपर नीचे या दूर निशाना लगाना है। साहित्य का काम सुधार करना नहीं है, पर व्यक्ति को सुधार करने योग्य बनाना है। कल्पना कीजिये कि लोहे से किसी पात्र का निर्माण करना है। यों लोहा तो बहुत ही कड़ा होता, उसे मोड़ना आसान नहीं है, उसे लाल करना पड़ता है, तब उसे मोड़ कर हथौड़े की चोट से इच्छित वस्तु का निर्माण किया जा सकता है श्रतः सब से प्राथमिक महत्त्व की बात यह है कि लोहे में पात्र के रूप में ढल जाने की योग्यत्ता लाई जाय, उसे लाल किया जाय और उसे लचीला बनाया जाय साहित्य का काम भी यही है। वह लोहे को लचीला बना देता है, यह हृदय के काठिन्य को दूर कर उसे सरल बना देता है। श्रब भ्रावें सुधारक, राजनीतिक नेता, धार्मिक उपदेशक, प्रपना काम करें लोहा लाल है, पाठक का हृदय तरल हो गया है, वह बाहरी छाप को ग्रहण करने के मूड में है, जिस रूप में चाहें उसे मोड़े'

साहित्य ने उनके लिये जमीन तेयार कर दी है। यह सम्भव है कि सृजन और सुधार दोनों साथ हो साथ चलते हों प्रायः ऐसा होता भी है। पर जब ऐसा होता है तो साहित्यकार वहाँ एक पग श्रागे बढ़ कर सुधारक का काम करने लगता है। मलुष्य के व्यक्तित्व की कितनी तहें होती हैं ? मेरे ही कितने रूप है ! मैं पिता हूं, पृत्र हूं, प्रोफेसर हूं और गज यहाँ भाषण भी दे रहा हुं ये सब व्यक्तित्व अलग अलग हैं साथ भी रह सकते हैं। उदाहरणार्थ मैं यहाँ भाषण दे रहा हूं न, सम्भव है उस भाषण-क्र्ता के अन्दर से पिता की भी कलक आरा जाती हो,. पिता की बोली सुनाई पड़ती हो, पर यदि वह नहीं भो सुनाई पड़ती तो भो भाषशणा-कर्त्ता पर कोई आंच नहीं सकती, वह अभ्रपनी जगह पर