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वरीसवीं सदी के दो महान कवियो त्रेष्ट ओर लोका की स्मृति को समर्पित)

(1998-त्रष्ट ओर लोकौ का जन्मशती वर्प)

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वीसवीं सदी कं दा महान कवियां त्रष्ट ओर लोकां की स्मृति का समर्पित)

(1998-त्रेष्ट ओर लोकौ का जन्मशती वर्ष)

सदी के अत मे कविता

उद्भावना कविताक वर्प 14 अके 47-48 (अक्ट्यर 47 -मार्य, 98)

अतिधि सपादक विजय कुमार्‌

सपादक अजेय वुमार्‌

सलाहकार मेडत भाष्म साहनी असगर वजाहत ढा एजकुमार शर्मा केवल गास्यामी, डा प्रजनाध गर्ग

संपदक मंडल हरियश राय सतप चौवे सौतापम अग्रवाल, रनयार सिह परमार

सहयोग मपाल कटवालया

कारू सलाहकार अरविन्द जैन

सपादकीय प्ता 'एच-55 सक्टर 23 एजनगर पोस्ट-कवि नगर, गाजियावाद उप्र

प्रयधकीय प्त ए-21 क्लिलमिल इडद्टिएल एरिया जी टी रोड, शाहदर दित्ली-95 फोन 2282647 2119770

सयोग राशि 40 00 रूपये

सभी मनीआईण्यैकःङापट “उद्‌भावना नई दिल्ली" के नाम से ही भेजे सभौ पत्र-व्यवहार प्रयधकोय पतै परही करे

सपादन एव सचालन पूर्णतया अवैतनिक ओर अव्यवसायिक

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हमारी सदी मं (कविता) सपादकीय चद्‌ वात्‌

}! कुवरनारायण

2 अशक वाजपयौ

3 लीलाधर जगूडौ

4 चद्रकात देवताले $ विष्णुखे

फेडेरिक गार्सिया लोकां बोरिसं पास्तरनाक

मलय प्रयाग शुक्तं प्रभति त्रिपाठी वेणु गांपाल 10 आग्नय

11 भगवत शवत

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2

12 इन्वार रन्वी

आसिप मादलस्ताम इयुजेनिया माताले

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अनुक्रम 4 = ८.2), चै (५

विस्लावा शिम्वोस्का सत्यपाल सहगल

चद्रगुप्त सौर्यबरवार/जो बच रहा

अगर चक्त मिला हत्तषटुनिया का मतलब! दुनिया कुछ ठीकं सी^ कोड कबीर नही! धुधलो तस्वीर

धर को एतिहासिक याद/मुख्य चिता/ एक! रात को जिदगो/कोडा प्रसग

मणे से नहीं डरता/14 अगस्त 96

अपने आप ओर बेकारस्वर्णं जयतां वर्षमे एक स्मृति 1

कुछ स्मृतियों कुछ अनुभव लोग ओर प्रवृत्तियों

हो पावा समय

छल।जव सोने जाता हूँ इन दिना८दर््या शायद

कविता मर गया कवि/कवि दिल्लौ मे दै शेष जोवन/धका प्रम

एक अभितदन समेट से लौटत हुए/भच्छ यद दै {क ज्यादातर साप पसे नही दै/र्सा कैसी नीद

रती हुई ओरत

कविता का जीवन मास्कोम एक कवि कौ नाट बुक

13

21

29 31

41

46 47 50 43 55 56

60

63 68

12 13 14

15

16

17

18

19

20

21

22 23

24 25 26 (1

28

29 3ॐ9

31

ॐ2

अगनाक धन्वा श्ञानद्र पति

४, विनय दुव ~

वशी मादेश्वरौ

आसिम इलाइटिस

मगलेश वरल रतश जाशी उदय प्रकारा अरूण कमल नद्रजैन

पकज सिह रजद्र शर्मा विष्णु नागर

ताद्युश रजेविच जसे द्रीडस्की

कुबेर दत्त

हमन्त राप

अजित चौधते स्प्रपिसे श्रीवास्तव

विनोद कुमार श्रीवास्तव भद्र गौड

लाल्दू

विस्लावा शिम्योस्कं गन्निएला मिस्त्राल

गगन गिल

ग्रोवर

(क.

|

1

1

1

1

1

1

1

स्फ रात गगातन्मित्र मिनन

` ` एक नदी हं पहाद्(यह चा एक एड टै/६श्वर

कवारम माग गयटरी भरी हाता रहता है पथ्या

फटेरिको गार्सिया लार्का

फोन पर हय नेचानशाता हभ तडकाणजा चौततते है

नादम चलने वाला आदमी्रतिध्यनिषटृग्य ओर प्रिव/वित्ता भर राशनी

ओरत/कौए-ओर लेखक का दिल्ली देहात शरीर/कूट/नमस्कार

पणभाग्य विधाता/पुतली ससाय/रत कौ गाधाप्वृथा

नाव/केलकत्त फुटपाल,/सभयत प्रस्तावना यप्रा^आप वातीनीवि

भापाटीन पडावा पन्हीं हालातमें

स्वर्गम सुख

हमारी मौत असली थो(सपना सपना

मनुप्यता के चदचिह्‌ कविता ¶द्य को शब्द कौ कौमत्‌ पहयान ग्र सिखाती दै

तुम्हीं ने कहा धा कहना जरूर

लकडिया घास नही है मकल है लालटेन ऊगने-इूयने कं दिशा/पालतू हाना

एक ओरत कौ रहस्यमय युप्पौ^तर-पुरपौ के लिए

इतजार/कुछ कवायल आसा१ जीवन के लिए हयिनारायण च्यास

जागरण काल/वौस साल बाददिखना जग

मै नरी जानती भकस तर लिखनी दू सडक पयइतेना वह खतरे मे/एक दिन

वह जागेमी “दर प्रम/जति हए अतं की कु ओर कविताएवाक्य^मेरे कवि

75 79 85 8 9

97

101

105

113

116

121 123 125

127 131

134 136 138 140

142 145 1485

151 157

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33

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3ॐ9 40

41 42 43

45

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49 50 51 52 53

58 57

कात्यायनी

चम्पावैद नोतेग रषुवशी भमा कौल वोरा सध्यागुप्ता

फषमीदा रियाज अजरा अव्वास

देवौ प्रसाद मिश्र सजय चतुरवेदौ

कुमार अवुज परिमल कुमार बद्रीनाणयण मदने कश्यप एकान्त श्रीवास्तव सत्यपाल सहगल

उदग्न वाजपेयी प्रमोद कौँसवाल

मिरोस्लाव होतुव

अनिल गर्गलं सुधीर रजन सिह अनूप सेठी सुलतान अहमद प्रतापराव कदम मिधिलेश श्रीवास्तव

आक्तेवियो पाज

मोहन कुमार्‌ खहेरिया हेमत्‌ कुक्ेती

कृष्ण मोहन दा पकेज चतुर्वेद

आलाचक कौ कविता/अन्वेपक कौ कवित, सहिष्णु आदमा कौ कविता/कूपगण्टूक कौ कविता

अधेर मे हौ क्यो ?केवल बसन्त मे सिदूखयात्रा कते पिता

अभूर लिखी चिद्री रह गई शेल्फ पर्‌ काठकाधाडा

एक गैर दुनियादार शस्म कौ मृत्यु पर्‌

एक सक्षिप्त वित्ररण

शायर ओर तारीख लाह्ने क्यो खीचतो हँ

रषटनिर्माण कौ राजनोति।जनगणमन/गठवधन गगा शिशुमायपक्तिवद्व साच-विचार के अलक्षित परिणाम

जजोजैमे मरे ही शहर म/रात

यामिनी कौ (आत्मा) हत्या/एक दृश्य मौत मुकर्र किया गया

आलुलिया/गोलबद स्वयो कौ नज्म

मेधा पाटकणटस्ताभर

सूखी नदियो के पाट/सपन्‌^आ। रात/नवम्बर केपते

फरिर्ते के हाय

आदमी वरह कहीं है/रूपिन ओर सूषिन

कविता पठने की कला

गिडगिडाता हुआ मनुष्य/मदिच्छाए्‌ पुरूप प्रतीक था

दिक्कालसेषो

बाहर निकलने के लिए

मिसे

कईनदोकेवाद

सारकथन

विस्थापन

जिषके पासं अधनी जान दै/दईश्वर का वेतन मुञ्चे मत जलाओ/अभो भो

मरतिएतो

164

167 168 170 171 173

175 180

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190 195 198 199 202 204

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61 62 63

65 66 6 6 6 7 तर 7; 73 74 75 71

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आशुतोष दुमे विनय सौरभ

ज्जं सुरस योर्खेस

जिति श्रीवास्तव विवेक गु 'पवनकरण प्रेमरजन अनिमेष शद रजन शरद कल्लोल चक्रवती नेश चद्रकर हरिओम राजोरिया रामकुमार तिवारौ मनोज शर्मा निरजन श्रोत्रिभ कुमार वीरेन्र गाति

विनीत

शैले दुवे

हरि मृदुल

बातचीत 1 सातचीतं 2 यातचीतं 3 अातचात 4

कवियो का गघ- मगतेश बराल 2 गजेशजोशौ 3 गगन गिल 4 चमनलाल

परिषर्चा सदी के अत मे कचिता

लुप प्रजाति की दुकान^सुना चाहता हं सयव

एसे आती है कविता मञ्च तक

तुम जब चाहो

विस्थापन

चाकू

अपने ताले कं अगि

बरताव

जीवन

हिलना

अधकार

रेरे कर बच्यै^अतुर है समुद्र वेहमाेहकमेरैँ

आग्रह^ईश्वर

उसके नहीं होनै मे/लालदेन/स्थिति अभी हम बहुत दूर है/महकती चाय का गीत अस्पताल का हद

शोर्पकहीन

बनियान/मोजे

विदा करदीकट से रजारावं की बातचीत रघुकार सहाय से महावीर अग्रवाल कौ बातचीत कवरनारोयण से विजयकुमार कौ बातचीत अगििषएुष्प से विभारानी कौ बातचीत

स्वगत (एक बैतरतीव डाय के कुठ अश) कवि की नोटबुक

दिल्तो उनीदि

पाशकेषत्र

केदारनाथ सिह^अशोक वाजपेयी्लीलध जगी चद्रकात देवताते भात क्िएठी्वेगु गोल यजेय जोा^अरुण कमल्द्ुधार रजन तिह

243 245

247

252 254 256 257 २59 261 262 264 266 267 270 271 276 279 281 283

292 299 309

315 323 328 336

विस्लावा शिम्योर्स्का

हमारी सदी मे

आखिरकार हमारा सदी भी बात चली है! इस दूसरी सदियों सै हतर होना था

लेकिन अवते

यहं भी अपने पिने-चुमे साल पर कररहीहै इसकी कमर हलक गरईहे

सास फृलरहाहै।

कित्नीही ची थीं

चिन्ह इस सदी मेहोनाथा $ प्रर नहीं हई

ओर जिन्हे नही होना था

गई

खुशी ओर वसत चैमी चीजो को

ओर करीब आनाथा पहाडो ओर घायियासेउठजानाथा

आतक ओर भय का साया

इससे पहले कि द्युठ ओर मक्कास

हमारे घर को तबाह करते

हमे सच कौ नीव डलदेनीथी #

कुछ समस्याए्‌ थी जिन्हे हल कर लेन था- मसले शृ ओर लडाहयोँ

हमे वेवसो के आसु

ओर सच्चाई जैसी चीजो लिए अपे दिल मे सम्या जगन था लेकिन देसा कुछ हुओ।

आज ये हालातहैकरि

सुख एकं मरीचिका नकर रह गया हे कोई हसता वेवकूफिया एर ओरनदहीफटकरताहै अक्लमदा पर

अवं तौ उम्मीदभी

सोलह साला हसीना कही रहै

हमने सोचाथाकि

आखिरकार खुदा को भी

एक अच्छ ओर ताकतवर इंसान म॑ भरोसा करना हेगा।

लेकिन अफसोस

इस सदी इसान अच्छ आर ताकतवर एक साथ नही हो सका।

""आचिर हम जिए तौ कैसे जिर" किसीनेखतमेपछाथा भी तो उससे यह पना चाहती थी

जैसाकिआपदेखचुकेहे व्हीहीताहै

हर बार व्ही होता हं

सबसे अहम सवाल

सबसे वचकानि ठहर दिये जाते हं!

(अदुकद विजय अहलुवालिया)

संपादकीय

आवतं देखहि बिपय वयारी --

सचरहैकिमैअधेरे समयौमेजीगहूं जबर एक निष्कपट शब्द मूढता है, एक सप्र मस्तक सवेदनहीनता का सकेत जो आदमी हंस रहा है उस तक अभी भयानक खवर गही प्हुंकवी है। ब्रेष्ट शायद इतिहास मे एेसे मुकाम आते है युगात साफ दिखाई देता है सक्रमण कौ रफ्तार अभूतपूर्वं होती है धुधमे कुछ पीछे चट गया, कुछ सामने उभरता सा दिखाई देता है रचनाकार इस बदलाव को किस तरह देखता है? 1938 मे ब्रेट ने जव उपराक्त पनितयां लिखी थीं तव जर्मनी मेँ राष्ट्र, प्रगति ओर वैज्ञानिक तर्कवाद के नये मिथक गढे जा रहे थे। बौसवीं सदी के इन अततम वर्षा मे पता हीं हमारी यह दुनिया किस हद तक विश्वप्राम वन पायी है, पर पूजी देवनोलाजी ओर बाजार्‌ ने यकीनन हमारी रोजमर्य कौ जिदगी को शिकारौ कुत्तो की तरह चप लिया है। लोग-वाग किसी सुनहरे भविष्य को लपकने चीखते-चिल्लाते बदहवास से सरपट भागे चले जा रहे है। सकल्पनाए टूट रही है, प्राथमिकताए्‌ बदल रही है! आभासो ओर अटकलो का बाजार गर्म है। कोई हेडबड दौडता हुआ कहरहाहै किं अनुभवो का इतिहास दोवाग लिखा जा रहा है- आगे कौ तरफ भी ओर पौटठे की तरफ भी किं इस इतिहास मे मनुष्य समाज का नया मनोविज्ञान, नये सकेत ओर नयी स्मृतियो है कि मनुष्य का अनुभव ओर उसकी भाषा मशीन के लिए अब महज एक कच्वा माल है। कवि हतप्रभ है ¡ वह जमीन की पर्त पर कान लगाये आने वाले मौसम को पढना चाहता है। कभी हैरानी ओर कभी परेशानी में वट पिछले समयो कौ आर ताकता है। एक चीज से दूसरो चाज का एक दुनिया सं दूसरी दुनिया को कौन सा धागा जोड रहा है? कवि पूछ रय है! कविता कुछ सटमी हई सौ कुछ विखरी हुई सी इस अधड रेत-पेल ओर आपा-धापी म॑ ल्टम-पस्टम दौडते लागा के वौच खडी उनसे सवाल पूर रही है 1 यद्यपि उसकी बात

कोई सुनता नहीं प्र बह एक जिद कौ तरह अपने सवाल पूरे जा रही है। समय ओर उसमे आदमी के वजूद को लेकर कुछ वहुत पुराने सवाल। युद्धो, यत्रेणा शिविरे, सर्वसत्तावाद मशीनगनो, नफरत तगहाली गैर-यराबगी, रोग भुखमरी जदयलत, सनक, पागलपन सदेह मपुसकता ओर तिजारत के सामनं खडी कविता सवाल पूछ रही है। तसल्ली आराम, इत्मीनान, वैभव भौर अत्मतुष्टि कौ दुनिया मे उसक ये सवाल बार-बार दौहरये जा रहे दै-

ये किसर तहकातमयहै

जव परेड के बरि वात करना लगभग अपराधे

# क्याकि इसका मतेलव इतनी सारी दहशत के समक्ष एक खामाशी है

कविता वीसवीं सदी पर होते हए पटाक्षेप को देख रही है वह देख रही है कि युरोपीय पुनजागरण की तीन सौ साल पुरानी तमाम धारणाए धूल चार रही है। रक्तरजित आकाक्षाआं ओर उन्माद के चौ नये नये शब्द सिद्धान्त ओर प्रतिपादन रोज जन्म ते रहे है, रोज मर्‌ रहे केन्र सरक रहे एष्ट प्रगति विज्ञान पूजी ओर तर्क के पुराने मिथको का पानी उतर रहा है नये मिथक गदे जा रहं रै भविष्यवाद के इन मिथको के पौरे छिपी हिसा, वर्चस्व ओर शोषण कौ शक्लो को कविता पहले से ज्यादा साफ देख रहो है। कविता देख रही है कि सदी के इन अतिम वर्पो ज्ूठ वेशसाफी, पाशविकता ओर उत्यीडन को फैलाने बाते कुछ नयी तरह के खिलौने ईजाद हुए है। घटनाए्‌ घटनाए्‌ नही, हादसे हादसा की तरह नही ह। सबकुछ भीषण रूप से भव्य, लुभावना ओर उन्मादे भरा। विध्वस जुल्मं वेबसी आर क्रूरता येहद हगामाखज दृश्य सयक बेहद तत्कालिक अर क्षणिक। सबकुछ येहद आक्रामक ओर सवदनाविदीन। नृशसताओ का एक नया रोमाच, लाचारियां कौ एक नयी सनसनी ओर इस सच की दिखाने के पीछे एक पूजौ एक बाजार ओर एक नियत्रण भूलक ताकत। कविता पूछती है मनुष्य के इतिदास मे क्या सच कभी इतना निर्वयवितक, इतना निरपेक्ष इतना कल्पनाविहीन इतना पीडा हित इतना आसान था? यह कौन सा सच है जिसे एक सहता है ओर दूस सिर्फ देखता है? यह फौन सा सच है जो सिफं एक दृश्य मना रहता है, अतुभव नटी बनता? जो एक कैसर कौ तरह सवेदा ततुभो सिस्टम पसरता जता है ओर रागग्रस्त आदमी को उसकौ जानकारी त्क नही। वासवी सदौ के इन अतिम वर्पो कविता सभ्यता के इस “स्ता पान" को पहचान है पटना हादसा ओर प्रसगा से ठसाठस सच मे छिपी दयो से प्रवश करती हई तात्कालिकता लम्पट आवरण को भेदती हुई विशङ्ञो के धूल धुतैवा मे मनुष्य के शरस चात्कार ओर उम्माद का निजो स्फीयर रचत हु यात्रिक तर्कवाद के ययटोप मे आदमी को ट्लिने-दुभनं सरकन ओर सास सेने की जगह दती हर अकस्मात्‌ के पाछ ओद्‌ आपि ये- रहस्यमय धागा को दद्यनी हई गनीमत है कि कवि आज भी यह मानता है कि कथिता अथ भै दय ससर यर एक सनन एक मुषि एक ताकत ओौर एक समर्पण है वह 3 दुष्वया का विरस देती टै ओर एक आध्यात्मिक अतुभय यते जाना चलती दै

सह दुनिया को खोलतौ हे ओर एक दूसरी दुनिया वन जाती है, वह आदमी को अकेला करती है ओर उसै दूसये से जोडती है, वह शून्य के प्रति एक प्रार्थना ओर अनुपस्थिति के साथ एक सवाद है, वह यात्राओआ पर्‌ निकल जाने का निमत्रण ओर घर कौ भर लौटने की तडप है, चह अव भी आदमी के अवचेतन की उदादत्ता ओर क्षतिपूर्ति है वह इतिहास के पर-पर से गुजरती हुई इतिहास का अतिक्रमण कर जाना चाहती है, वह एक हौ साथ एक प्रयोग, एक अतरगता ओर एक पराक्ष विचार है वह मजिल का पृ्वाभास ओर एक अथक भटकन भौ एक साथ है पाव्लो नेरूदा ने कहा था "कविता मे अवतरित मनुष्य बोलता है क्रिमे अब भौ एक बचा हुआ अतिम रहस्य हूं"

“उद्भावना" का यह कविताक आपके सामने हे- सदी के अत म॑ कविता। मुञ्ने अन भी पता नहीं कि भाई अजेय कुमार इस अक अतिथि सपादक की जिम्म॑दारी मुद्ध क्या साच कर दी, क्याकि एक ' पहुंव' हए कवि-सपादक का गुरू-गभीरयं आर एक युवा कवि-सपादक की उठा-पटके दोनो ही गुण मेरी क्षमता के बाहर थे। दूसरी भी किसी तरह की कोई मानसिक तैयारी नहीं धी! इसके बावजूद यदि अजेय कुमार जी लगातार आत्मीयतपूर्णं आग्रह कसते रहे तो फिर बचकर निकल भागने का कोई रास्ता नहीं था। मुज्ञ सपादन का कार्यं उन्हाने दिया ओर उसमे भरपूर स्वतव्रता भी मिली इस हेतु मै उनका आभारी हँ। 77 कवियो को चुननं ओर लगभग 120 कविया को लाध जाने के वाद यह सकलन कैसा खन पाया यह तो आप तय केरेगे। चयतकर्तां केवल यह कह सकता है कि तमाम रचनां से गुजरते हुए वह अपनी सौंदर्य रुचि कौ गुजाइश ओर उसकी सीमाओ- दानो से रूबरू हुआ। कई बार यह बात चकित भी करती है कि इतने ज्यादा कठिन समय मे इतने अधिक कवि इतनी अधिक कविताए्‌। या इलाही ये माजरा क्या है किसी ने ठीक ही कहा है कि "पलप" ओर "पोएटरी ' दोना हमारे समय के अतिवादौ सास्कृतिक रेस्पास हे जिनका गधवं विवाह हुआ है। कविता के इते विशाल फलक पर हम अपन क्षरण ओर बचं रहने की अन्दरूनी ताकत दीना कौ समञ्ञ सकते है।

इस अक के लिए जिन कवियों ने रचनाए दीं उनका हार्दिक धन्यवाद ओर जिनकी रचनाए नहीं ना सरक उनके प्रति मेँ क्षमप्राथीहं। `

ओर भत मे आभार सतोप चौबे, जितेद्ध भायिया, विजय अहलूवालिया, अनूप सेठी, अनुराधा महेन्द्र सगीता गुप्ता, अनत साक्तुलकर ओर नद्‌ चादेकर का, जिनका महत्वपूर्ण सहयोग इस अक कौ तैयारी मिला)

विजय कुमार

चद वति

(1 सत्यपाल सहगल

इसम कई शक नहीं है कि आज कौ हिदौ कविता पर विस्तार से बते नही हई है पर सभवत च्‌ समकालीन सहित्य कौ किसी विधा कौ लकर नटं हौ रही दै पाठकौयता के सकट का लेकर ता कुछ हो-ेल्ला हाता रहा है पर साहित्य को ओपनी दुनिया के इस सकर पर शार कौन डति? सच्याई यह है कि यह साहित्य कौ दुनिया से जुडे सभौ लोगो को जिम्मेदारी है इसलिए आयैप बहौ लगा पाएणे जी कुछ करने के लिए आगे अएे। यद्वि यह लेखको कौ वास्तविक चिता है तो फिर उन्ही को वालना आरभ करना चाहिय ओर यदि वं यह समञ्ञतं हे या कहना चाहते हँ कि उनका रचनाए पर्याप्त वक्तव्य हे तौ वै थोडा भूखंता का सुबूत दं रह होगं क्योकि ये उनका अपनो रचनाओं के बरे मे तो उपयुक्त हां सकता है पर उनको रचनाए साहित्य उस संपूण वैचारिकं परिव का स्थानापन नटी हो सकती जिससे किसी समाज की सपूर्ण सहित्यिक सस्कृति निर्मित हाती है ) हा यह हो सकती हैकिवंरा रचनाओं के साथ सामने आए जा इस तरह से विस्फोटक हा कि बाकी लागा कं लिए चुप रहना या प्रतिक्रिया व्यक्त करना असभव हो जाए। शायद यह स्थिति भौ नही है 1 क्याकि पूरं म॑ एेसा देखा गमा है करि एेसी स्थिति मे साहित्य ही नटीं साहित्यकार स्वय भी विस्फोटके हा जातत दै! आताचना केवल सहित्य कौ हौ समीक्षा नहीं करती बल्कि उसके माध्यम से सस्कृति कौ चीर- फाड करत है लेकिन आखिरकार आलोचक भी मनुष्य हैँ ओर साहित्य कौ तरह वै भी श्रीविहीन हो सकत है उको राजौ रोी आएम से चलती है ओर यश-लिप्सा उनक लिए सभवत वस्र आत्यतिक नहीं होती जैसी रचनाकार लिए। इसलिए यदि उन्होने तानकर सोने या मस्त हाधियां को तरह सरमे का फसला किया है तो कोई उसमे क्या कर सकता है? एक तरह से देख पर यह लग सकता है कि हमार समय विचार विमर्श के लिए बहुत ही बोमीद। टै (साहित्य कौ हाशिए की ओर धफेला जा रहा है उसकी सामाजिक पोजोशन हल्की पडी है सामाजिक परिवर्तेन कौ स्पष्टता ओर मिश्ितता अस्पष्टता ओर भनिर्चितता मे तब्दील हुई है चारो ओर एेसी चमक, तेजौ ओर रेव्याशी है ओर उसकै लिए सबको एेसी लपलपाटट है कि साहित्य का जो खाद~ पानी आभ तकर रहा है ओर जिन कारणा से साहित्य को अब्र तक आयश्यकता रही है वह सदेह मे पड़ गयी हमारे चाय ओर कौ दुनिया मे तेजी से परिवततन रह है वि टये बहुत वेनाकौ से मास मे सोघने यान साचतरे कौ स्वाकार यः अस्वाकार करने त्गी आवश्यकता है किन्तु छुटपुट उदाहरणा यो छोडकर स्वातत्योत्तर हिदा चितन एेसी काई लोक हौ मरही है। एक परस्पर-स्वाकृत ससारर्मे आप तकं हमारा बाम चना हुडा धा।ठसके भात्‌ हमने काफी कागज काट किए रै ओर काफी भाषण पिलार है परव हमारे काम आज तरो वित्कुल आने से रहे चूकि हम अगर ददी लिखना या योलनः है तो अतते प्रतिश्रुत उसो बमं से हाना हे जो हिदौ मं पठता या सुनता है। हम लखमो के सदर्भं ता उस्रका विशेम अर्धं हिदौ का बाद्धिक वर्गे हौ हे। आज नई चुनौत्तिया कारण यह वर्ग ही बेहद

सदा केअतमे कतित)

आधारभूत सास्कृतिके सकट नजर आता जिसस्नो ओर कु फुट दग से टौ सहौ आदस्णीय राजद्र यादव का ध्यान जाता हा है जाहिर है इस ददौ यौद्िक वर्ग कौ सास्कृतिक सकट कौ जड व्यापक राजनैतिक जातीय ओर मास्कृत्निक आयाम) तक कती है ।इस प्रकार बहस दिशा टौ बदल जा सक्ती है जहा अपनी अल्पस्ख्यकता का अटसास यार-यार सक्ता तथा जिस वहस के बहुत लवं समय मं यिचनं के वास्तविकं आसार रै। यहं बहुत जटिल मामला भौ है ओर चूकि हिदौ चीजा को जटिल ठग सं हडतत करम कौ बहुत दी क्षौण परपरा है इसलिए कार्य की विशालता देखकर सराय उत्प देन स्वाभाविक है। ओौर इस कार्थं अपेभाकृत अकेल हान कोड सला टफजाई नल हाता। इस तरह साहित्य कौ वात तो पौछ चटी नजर आती है यह एक भयानक परिदश्य है लविन जाहि है इसे अकर्म कमं एक तर्क करूप पश नही किया जा सकता! इससे निष्कं यही निकलता है कि सशय यौच मं भी सावधानी से ही सही बालते रहना चाहिये क्याक्र वर्फ का टूटना एमे हौ आरभ होगा ओर एक सामूहिक आवाज का निर्माण भी एसे होगा। 2 आज क्रौ हिदी कविता पर चात करनं पर पहली अचरज कां बाते यह नजर आता है कि इस पर चात करन की कोई प्रचलित शब्दावली नर्हौँ है। लगभग पिल वौस वर्पो मे यह कविता लिखी रही इन पक्तिया के लेखको कौ जानकारौ विजय कुमार मदन सानी या विष्णु खरे को छोडकर किसी ओर इस कविता पर लगाव के साथ तनिक विस्तृत विचार नहीं किया है इसके अलावा "मई कहानी" छपा नीताभ का लेख तथा "मधुमती ' मं छपा राजेरा जोशी का लेख ध्यान आता है जिसमे इसको विशिष्टता को उजागर कमे की कोशिश है ! कुछ स्थला पर परमानद श्रीवास्तव ललित कार्तिकेय ने भौ कुछ रोशनी डालने वाला टिप्पणिया कौ रँ कम से कम एक काव्यकाल के रूपमे तो इस पर विचार बिल्कुल हा नहीं हुआ है कतिपय कवियां का गहन पाठ तो दागर वात है। यह इसलिए भी हैरान करने वालौ बात है किं इस पूर काल मे बहुत कवित्तालिखी गई है सैकडा कविता~सग्रह छप हागे (उनकी प्रतिय की सख्या एर जाइए) शिमला दिए गए एक भाषण मे प्रयात कटानीकार ज्ञानरजन ने तनिक काव्यात्मक लहजे टौ केह कि उनेके पास टका भरकर कविता आती है वहरहाल इस अरसे कविता खूब छपौ है- एक समय तो पत्रिकाआ के कविताक निकालने कौ होड लगा धा। ओर हा, कविता कौ वापमी का युग भौ तो इसे कहा गया। कविता कौ चापमी कौ अभ्यर्थना आपातकाल कं तुरत वाद पूरवग्रह ने एक वढिया कविता-विशपाक निकाला था। ओर पहत-13 का वह एतिहासिक कविताक। उसके बाद भा कविता विशेथाक ओर महाविशेषाक निकलते रह इधर पिछले वर्पो आधार पकाशन मे युवतर कविया के पहले सेग्रट छापने कौ खुद टी पशकश कर डाता। इधर हालात फिर कुछ कविता-विराधौ नजर अति पर कुल मिताकर यं दो दशक विपुल काय्य कै वर्षं रे! बीच मे तो उसे समकालान हिदी साहित्य कौ ्रष्ठतेण विधा भा चताया जाने लगा धा। बावजूद इमफ़ हम ठोक-ठीक नहीं पता किं यह कविता टै क्या? ओर यह जो कुछ भौ है वैसी क्या है2 आर ष्या उस वैसा टाना चाहिये? है अचरज करा यात? काई कह सकता दै कि यही इम

2 "यके अतमे कविता

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कविता कौ खासियत दै कि यह कविता नामकरण सं परिभाषा सै बची दै ~'प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम दा"-नरि सै बची है दावा आप्रहो से वचो हे, क्याकिं विगत मे इससे कविता को काफी नुकसान उठाना पडा टै 1 खैर यह बहस तलब है कि बाकायदा आदोलन के रूप विकसिते हु प्रमततिवाद नई कचिता कवित या वामकविता को उससे क्या लाभ या हानि हुई है शायद्‌ कुछ लाभ हुए ओर कुछ हानिया। लेकिन कविता बारे यह तथाकथित बदला हुआ दृष्टिकोण कोई नितात मौलिक चीज नहीं था यह इतिहास ओर चेतना कौ उस नई थिष्ट के अनुरूप हौ था जा पिछले वर्पो रष्टय ओर अतररष्टीय स्तर चर उभे ह! दरअसल बहुत अरस से हमारे यहा कुछ मौलिक नह होता दै, सभवत मौलिकता के प्रति यह कथन भी उतना मौलिक नहीं है। इस तरह से कविता के इस अद्यतन युग निर्माण मे कुछ भी अनासा वही है यह भी उसी तरह अपने समय कौ उपज ओर हिस्सा है जैसे पहले काव्य समय रहे इसलिए इस पर किसी को वगते बजाने कौ आवश्यकता है ओर निराश हाने की। मावजुद इसके यह एक कवितायुगं है ओर यदि वह परिभाया सं कतराता है तो वह भी उसकी एक पहचान है ओर बात यही से आरभ कौ जा सकती थी की जा सकती है तेकिने नहीं कौ गई है। कविया कौ तरफ से इतके लिए कोई आग्रह भी नहीं आया है, आश्चर्यं है। स्वय तो चुप रहे ही है सभवत उने सं का अपनो कविता चौ प्रगतिशील या जनवाद कषिता कै नए सस्करणकते रूपम देखे, जोकि वह है भी लेकिन यह नयापन साफ-साफ रिका मे नहीं है इसका बडा नुकसान यह है कि इससे कविता का वह वैचारिकं परिप्ेक्य अवरूद्ध हाता है जो अज्ञात रूप से कविताओं को पृष्ठभूमि कार्यं करता है तथा विशेषकर नई पादौ कं लिए जिसकी उपयागिता बहुत स्पष्ट है क्या यह गद्य लिखने कौ कठिनाई है जोकि कविया मे अब एक बहुत आमफहम वात है अथवा अवधारणात्मक अभिव्यविति की कठिनाई जो कवियो कौ सदा रही है किन्तु, गद्य कं उदय के बाद जिसे हर युग मे, कुछ समर्थं कवि पार पाते आए है या यह आलाचनात्मक जिज्ञासा विवेक ओर प्रतिभा का सामान्य सकट है चाहे कति हो चाहे महामना आलोचक ! यह एक तरह की साहसहीनता भी हो सकती है क्याकि कविता एकं पर्दा भी है जिसके पीछे चहसा छुपाकर नौला जा सकता दै ओर उसे साफ-साफ कहने के मनोवैज्ञानिक नैतिक ओर व्यावहारिक सकट हो सकते है यह भो हो सकता कि अस्पष्टता इतनी हो कि अतमे मुख से यही निक्त कि "एसा लौ तैसा लौ, मँ केहि विधि कदू अनाखार्लो" पर कम से कम इतना तो कहा जाए! यह भौ नर्टौ हुआ है ओर इतने समय के बाद भी नर्तौ हुआ है। यायत भी कहाजा सक्ता है कि सहेव) इसम आधारभूत रूप स॑ कुछ नया है टो नहो कुच नेया क्रक्तिकापै चाहे विचार या शित्प। यह एक खुली दुनिया है जिसमे कुछ भा सकता है कोई चचार कोई दर्शक कोई रचना-विधि पुराना नया ओर तगभग सर्के लिए सहानुभति है। तो इस खुनेषन कौ इसकौ विशेपता कटे ? यह नाम द2 सभवत इस खुलेपन खसे रूप वार पशय दै। तो सशय का नाम दे? सभवत इसक वार भा सशय टै) इसीलिए कुछ के चु रहै? शायद हम लोग एक गलती कर रट टै टम इस काव्यकाल की कोई सामूहिक परिभाषा दूने कौ काशिश करते एह कि जसम एक किस्म की निर्मम तटस्थता ओः वैज्ञानिक दृष्टि की आवर्यक्ता देती है। व्यापक गृहत अध्ययन का भा। जबकि एक किस्य कौ कवित' वो प्रगतिशौल जनवादी

सदा केअत्र मे कविक्ा८3

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ओर दूसरी तट कौ कविता को रूपवादौ कहने का खडित चतन नजर आतता है। सभवत बहुत सेलोगा के लिए यह स्वत स्पष्ट हं कि यह प्रगतिरोल-जनवादी काव्य है ओर अन्य शुद्र काव्य अथवा कुछ ओर किंतु इमसे अतत अपनी पसद कौ कयिता को लेकर एक निजो परिभाषा की समस्या तो हत ठा जाती है पर एक सार्वजनिक टिणणो तैयार नही दयतो।

जिस कार्य कोमाग हम आरभसे कर रहे आमतौर पर उसे करमे का प्रेय आलाचक लना चाहता है विगत मं तो यह हुआ है लगता है वह भौ सशयप्रस्त ओर अस्पष्ट है या कविता कै नए पर्वितना को पूरौ तरह आयत्त कटने असमर्थं है आमतौर पटं हर युग अपने आलोचक भी लेकर आता है इस वार एसा नही हुआ है कारण? खित अनादेश?

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सभवत यह खडित जनादेश हौ इन बरस) कौ सच्याई है। चीजो को तेकर लग एक राय नहीं है ओर क्ड तरह के स्वर सुनाई पड रहे है। कोई माने या माते हम पसदकरेयानके एक उत्तरआधुनिक एजेडा चुपचाप हमारी कविता गया है यहा यह स्पष्ट किया जाए कि हमारी राय मे उत्तर आभुनिकताके नाम एर कुछ हमि यहा कहा किया जा रहा है वह प्राय कैशन है तथा भारत जैसे देरा तो यह पारिभाषिक बहुत हौ अजीब प्रतीत हाता है हम इसे कवल सुविधा के लिए इस्तेमाल कर रहे हैँ! यह महज सयोग नहीं है कि उत्तर आधुनिकता भी वैसी हौ अस्यष्ट ओर परिभाषा विहीन है जैसा हमारा कविता समय। दरसल उत्तर आधुनिकता के कई व्याख्याकार उसकौ परिभाषा काही विरोध करते है क्याकि उसका अभिप्राय होगा उसको एक तार्किक एकमूत्रता देना जिसको वे कई कारणा से तिरुत्साहित करना चाहते हँ

-बहरटान जडो कौ ओर लौटना तथा स्थानीयता जो कि बहुत प्रगल्भ ओर सू्म रूप से इस काव्यकाल कौ कविता कौ पिशेषताए्‌ तथा जिसे सब स्वीकार भी करते है उत्तर आधुनिकता का एेजडा है हसी प्रकार कविता मं ओरत ओर प्रकृति की उपस्थिति भी क्रमश नारीवादौ तथा पर्यावरणवादौ 'एजेडे कौ उपम प्रतीत होतो है जो अतत उत्तर आधुनिक एजडे मेँ शामिल है इसी प्रकार सवेदनागत वैशिष्ट्य पर जोर तथा उस अवधारणात्मक अमूर्तता से मुक्ति पूर्वं कौ कविता पर हावौ रही है उत्तर आधुनिक विचार का महत्वपूर्ण अग है फिर परिदृश्य मे बहुलतावादं प्रवृत्तियो को देखे तथा परिभाषा ओर सैद्वातिकरण की स्थिति से बचतरे के आग्रह को उत्तरआधुनिक एजेडे से मिलाए तो पाएणे कि बहुत समानता है। समानता वी इस पेहरिस्त को बहुत लबा खोचा जा सकता है ओर किंसौ योग्य शोधार्थीं को यह कार्यं करना चाहिये।

यह प्रतनिया हमारो कविता पिछले दो दशको से चल रही है जवकि उत्तरआधुनिकता कौ कुछ चर्चा अभा हाल गै हा शुर हुई हं समे यह स्वत्‌ स्प कि यह काई वैचारिकं प्रवृत्ति का अध्ययन

करके उससे तैयार कौ गई कविता नहीं आधारभूत रूप से यह उस समाजशास्त्र निकली टै जो पिछले बरसा मे रषी ओर अतर्गषटीय स्तर पर बना ₹ई।

लेकिन इते स्वौकार कोई नरी करेगा यानि कि च्यादातर। एक तो उत्तरआधुनिकता के नाम पर

यह प्रचा है कि यह कुछ भदेस बाता का हो नाम है 1 मसलन विचारधारा का अत इतिहास का अत अथवा साहित्य का अत। यह सही नहो है उत्तरआधुनिव ता को छतरी तने एक प्रासगिक सामाजिक राजनैतिक साम्कृतिक एेजडे को रखा जा सक्ता है रखा गया है चाहे उसकै दार्शनिक आधार विवादास्पद है दुसरे हमि बहुत से कविजन अथवा आलोचकगण या तो माव्सवादी सगरठना वे सदस्य

¢ केअतमे कविता

हैया माक्सवादौ राजनीति के पक्षधर है उनके लिए उत्तरआधुनिकता केवल भैर माक्सवादी है बल्कि मावसवाद विरोधी भी है उनके लिए माक्संवाद एक स्थापित वम्तु है जिसमे विरष तव्दौली नरह हे सकती है वे स्वय चह कैसी भी कविता लियै लेकिन परपरागत मव्सवादौ सौदर्यशास््र पर पुमविं चार कौ आवश्यकता महसूस नहो करते! उनको कविता अन्यान्य समविशो हो सकती है पर विचारधारा मरही बहरहाल यह कितना भी सच श्यो हो कि उत्तरभधुनिकवा अथवा उसके एक हिस्से का माक्सवाद से सब्रध विवादास्पद है हम कविता की गवाहां को नहीं बदल सकते। हमं यह स्वाकार कना होगा कि हमारे समय की अधिकतर प्रतिनिधि कविता का सौदर्यबोध उनम वे कवि भौ शामिल है जिनको तारीफ करते हम नहीं अघाते उत्तर आधुनिक एजंडं ने तैयार किया है} इस प्रकार हमारो कथनी ओर करनी मे अतर नजर आता है। इस शिजाप्रनिया से मुक्ति स्वीकृति के साहम सेहो हो सकता है स्वाकृति कं साहस विना रचना मूल माक्संवादौ एंजडे मे भौ नहीं लौय जा सकेगा।

दग्असत हिदी हममे माकर्सवादी सिद्धात चर्चा कं नाम पर लकीर पीट काही कार्यं किया

है ओर उससे जरा सा इधर-उधर हाने पर दर-बदर होने का खतरा मडरते लगता है। कुछ लोगा

लिए मावर्सवाद सनातन धर्म जैसा है जहा ज्यादा टे-पे करने पर नास्तिक करार दिए जाने का अदेशा

दै।

बहरहात इस काव्यकाल के सामान्य विकास पर नजर डाल कर हमं अपने निष्कर्ष प्राप्त करमे हागे क्याकि तथ्या से आच मूदकर हमं क्रिसी का क्या अपना भला भी नहं कर सकते ओर ये निष्कर्थ है

1) कई कुर भी कहे, गलत या सही पिछले दो दशका कौ कविता का रचनात्मक-स्व ससार की गतिक साधरै।

2) हिदी कविता मे आधुनिकता का ेजेडा बुरी तरह शिथिल हुआ है तथा उसको जगह उत्तर आधुनिका के एजेड एक अशम लं ली है जा अपना तरह सं सामाजिक न्याय ओर मानव मुक्ति कौ विवेचना करता है।

3) इसं कविता का सौदर्यशास्वर कमोबेश इस नए जडे से गदा जा रट है यद्यपि यह उतना स्पष्ट नही है।

4) हिद कवि का मावर्सवाद-परेम प्राय भावनात्मक कारण। से है। सभवत वह उस हारा चुनी उत्तरआधुनिकता के दशेनिक आधारो का तथा माकर्सवाद के दाशंनिकं आधारो का अत्तर नही कररता या जानता!

5) हिदी की एचनात्मक प्रतिभा प्राय समाजशास्त्रीयता का दास बनने मे दाक्षित कौ जता है इसलिए उसके पौ या उस्रकै साथ-साथ चलना उसे स्वाभाविक नजर आता है। कविता कै पथ प्रदर्शक नवीन उन्मेष को सभावना फिलहाल धूमिल है 1हिदी कविता का अगला सामान्य परिवर्तन एतिहासिक परिवर्तना कं अनुसार हां होगा।

4 इतना कहना हालात को स्पष्ट करने के लिए धा तरिणय करनं कं लिए नही। हमार चारा ओरं टीस एेतिहासिक परिस्थित्तिया या वैचारिक परिवर्तंनो के नाम पर जो कुछ घट रहा है उस प्र कोई अतिम राय बनाने के लिए सृक्म अवलाकन अध्ययन तथा गहन परिश्रम कौ आवश्यकता दै ! लेकिन यहं कायं अपना सार्थक गति तक तव तक नही पहुवेगा जब तक हम अपने शिजेफरिनिया का सामना

सती केअतमेकवित/5

नहीं करेगे जो अब ज्यादा से ज्यादा नजर अता है इससं मुक्ति का रास्ता कठिन अवय है तकिन उत मीड नहीं जितना मु्तिवोध के लिए वने गया धा या यना दिया गया था। कटारता भी इतनी है कि भात्मस्वोकृवि से हमारे बहुत से पाखड टरो है तथा धरम के बहुत से दर्ं उह जते हे,धिजैकरेनिया से भुक्ति एक सतत सथर्थ है लंक्रिन यहो सर्वाधिक मानवीय न्यायपूर्णं सार्थक आनदपर्ण तथा वास्तविक उत्पादकतापुणं दै जिसका पीठे उल्लेख हुआ था वह मौतिकता भी इसी से आएगो।

5 यह सब आज कौ कविता के "होने" का विश्लंपण था उसकी गुणवत्ता का नह। गुणवत्ता का निर्पय एतिहासिक सगति नहीं हा सकता उसस यह प्रभावित अवश्य हा जाता है। आखिर कोई कविता माए्क कव बनतो है? काफो कठिन प्रन है तेकिन "साच को आय नहीं कौ तरह सरल भी है1 कविता कला-एचना कौ कुछ स्थायी विशपताए है यद्यपि उनका आस्याद सदा एक सा नहीं रहता बहरहात एक मडी कविता अवश्य ही यथार्थं नियमित भर नही होतौ उसे खोजतौ ओर गढती भी है। वह पाड से कोसौ दूर होतो है ओर सच्चे अथो रचनात्मक होती है वह मोहक हाती है ओर उसे पढने के लिए किसी अत्यत स्पष्ट वजह कौ आवरयकता नहो होती उससे दास्ती टौ जाती है। वह आप तक आती आप ठम तक जात यार-वार। एक अच्छी कविता टूर ओर गिरे का सहारा है। वह कल्पना कौ विडकौ खालता है ओर इस तरह मनुष्य को मनुष्य चनाती है 1 वह सपने को सम्मान देती है तथा विकवृत्ति को निरकुश होने शेकती है वहं अजय होतौ हं चहि अमर जहो! देखत चाहे कैसे अनर्गल हो पर उसकै भीतर एक सुसगत तर्क -पद्वति होतो हँ जो उसके सृगनहार का अपना अविष्कार होता है एक भोलापन सदा उसमं रहता है ओर कड वार वह सचमुच स्ये कौ तेरह व्यवहा करतौ है उमम कला का मर्म हाता है ओर उसको अपनी एक कला हती है जो किमी विद्यालय से महीं यल्कि स्वय उसी यौच से प्राप्त को जाती है! अभिजत्य का याना धर्‌ कर भौ वह कभी अभिजात नहँ लेती उसका राजत्रैतिक आशय वहुत महत्वपूर्ण हेता है लेकिन वह उसकौ अततम सैदना से तय होता है उसका एक युग्ीन सद भी हता हे यो उसको उपतब्थि को तिथि करने मे तिणयिक होताहै बहरहाल एक गुणवती कविता को ओर अवधारणाए्‌ भा हैँ किन्तु यदि वहा निहित स्वार्थ कारय नही कररहैहो तौ वे एक दूसरे कौ पूरक हौ होती हम सथके समक्ष यह भली भाति स्पष्ट है। बहुत से लोग शायद यह कहना पद करे कि अच्छी कविता क्या है यह बताते या व्यास्या को वस्तु नहीं है उसका प्ता खुद चल जाता हँ यदि इन दौ दशका की कविता को इस परप्कषय म॑ देख तो पाएणे किं हमारे सामने कुछ बर्हत अच्छौ ओर विलक्षण कविता आई है आधुनिक हिदौ कविता कं इतिहास म॑ बहुत विशिष्ट बहुत विवेकवान मौलिक तथा हदय ओर दिमाग को चीर देने वाली मानवौय हाय के साथ। एसी कविता जिसने ताकत ओर धौस वे- नवीनतम रूपा की आख आख डाल कर बात कौ है। इस कविता हमरे समय च्छौ युवा पीढी का भग्न ससार ओर फिर भी जीविते तुष्य कौ तर्ह व्यवहार करनेको दृढ इच्छा है। एक अनुचितनात्मक सामाजिक मनुष्य इस काव्य कौ उपलब्धि है ¡ यद्यपि यह कविता भो करल मिलाकर अपने समाजशास्त्र से नियमित है वितु काफौ समय बाद यह हअ हैक इसका कुछ हिस्सा उसवै आर-पार जाने कौ कोशिश करता है ओर कुक तात्विक स्थितिया को पनि का उद्यम रचता है इस कविता ने खडी बोली की सभावनाओआ का सभवत सवसरे वेहतर ठपयाग किया

केअतमे कविताः १;

दै ओर उसके बीच से वर्तेमान का वह विव उभार को कोशिश को है जो तोसरी दुनिया ओर उसके आदमी का खारी बिव है! (देखना होगा कि आज यह पारिभाषिक तीसरी दुनिया कितना प्रासगिक है, बहरहाल 1) यह भी इस काव्यकाल कौ उपलब्धि है जिसकी पृष्ठभूमि मे निरिचित हौ तीसरी दुनिया कौ उभरती स्व-चेतना कार्य क्ती रही है हालाकि मौजूदा परिस्थिति ने इस स्व-चेतना के चिकास की अवरुद्ध ही किया है॥ कितु यह सब मुख्यत इस काव्यकाल के पूर्वादधं तक हा सीमित है 1 उत्तरद्ं तक अति-अति एक युवतर पीढी इस काव्यकाल मे शामिल होतो है जिसका स्टारडम तो तनिक सफल नजर आता है लेकिन सुधौ पाठको कौ नजर मे उसका जगह बनतं बनतं विखरगं लगती है पूवाद से चलं आन वाले कवि भी अपने जो कुछ भी ओज कौ उत्तरं विकसित कसते नजर नहीं अति छिटपुट प्रसमो के सिवाए। इस के बरि मे थोडी बहुत चर्चा भी होने लगी है तथा इसमं कविता के स्थान पर काव्याभास की सफलता देखी जा रह इसमं थोडी अतिरजना हो सकती है लेकिन जैसाकि एक वरिष्ठ कवि का निजां बातचात मे कहना कि इसके कवि की गदन फसी हुई नजर नहीं भता है तथा यह अपने सार मे सर्वातुमति को कविता है। इसको लेकर यह एक वास्तविक खतरा है कि यह जितनी तेजी सै आई है उतनी तेजी से लौट जाए। सभवत ज्यादा न्यायपूर्ण यह कहना होगा कि यह उस सास्कृतिक सकट कौ ही शिकार है जो आज चारा ओर तेजी से पसर रहा है। पर क्या यहो उसकी चुनौती नहीं है? हर युग अगे बढते हुए नई कविता के लिए जगह खाली करता है ओर हिदी जैसौ विशत भाषा मे पयाप्त प्रतिभा है कि उस जगह को भरा सफ लंकिन केवल इतना हौ पयाप्त नहँ दै एक गहरं ओर थर हुआ अतर या बाह्य-ददर हौ उसे वह स्प॑स दे मकता है जहा वह सूर्यं कौ तरह चमके। जिदगी के निजी राग-विराग भौ कवित्ता का उर्वर ओर चिरत्न क्षत्र रहे है कितु महत्वपूर्ण कविता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसकौ बीहडता का वहन करे। कविता का अत निश्चित रूप से नहीं होमे जा रहा है लेकिन वह एक सक्रियता भर रह जाए। यही पर समकालीन कविता ओर कवि मे गहर भीतर आताडन की आवश्यकता है जिससे समकालांनता को एक आधारभूत ठग से दा जा स्के! कुछ समस्या उस मूर्तं अमूर्तं साहित्यिक नौकरशाही कौ भो है जिसका चस भी काव्य परिदृश्य कमूर्तरूप का यनाता है जो काव्य-परिदृश्य आज यना है वह आवश्यक नहो कि जो कविता लिखो जा सटी है उपकाः वास्तविक प्रतिनिधित्व कर्ता हो। कुछ येहतः उदाहरणो को छोडकर हिदौ कौ अधिकतर साहित्यिक पत्रकारिता कर्णधार तथा काव्य-चर्चा सुख पाने वाले आलोचक-वृद साहस ओर कल्पना विहन है जिस राख का ढेर वे दिन-रात खडा कर रहे है सभवत उसके नीचै कुछ अगार किप है ! अगर मुक्तियोथ के शब्दा मे कहे त्रो कविता को दुनियां को कुछ मेहतर चाहिए। इतना कहना किसी कौ अवमानना करना नही टै क्याकि यह सय है कि योज येहद उलवावयूर्णं ओर कठिन होतो जा रही है तथा प्रयास लक्ष्या का चोट नहीं कर रह कितु हमं मिरचय हौ उस सआमाजिक-सस्कितिक जडता पर विचार करना है जो स्थितिया को अनुपूरक वौद्धिक-भौतिक क्षमता

को चैदा नौ करती दै तथा जो हमर शषटीय परिदृश्य का विशपकर हदा भाषा का एक आमफ़हमं हिस्सायनी टै

सदा केअतमंकविता^7

इतना कह कर भी बहुत कुछ कहने को रह जाता है इसलिए भी कि जो कहना उसके ओर- छोर जाने कहा-कहा फैले है इसलिए भी कि काफ कहने के बाद भौ कहने कै लिए वहुत कुछ रह जाता है। आचार्यं एमचद्र शुक्न मे वताया था कि "कविता क्या है ' लेकिन एक सवाल जो यहा रपा जा सक्ता है ओर जो बिल्कुल भो मौलिक नरह है कि कविता क्या? हालाकि सवातत का जवाब एक तरह से इस टिप्पणी के बोच आया है पर वह निर्चित रूप से धोढा विरिषट है! एक कविते वर्कशापं कौ स्मृति आ! रही है जहा एक स्कूली लडकी ने पूषा था कवि तोग सरल चीजा कौ जटिल क्या यना दते है जबकि पहले ही बहुत रशन है ।इसका जवाव एक समकालीन कवि संभवत यह देगा कि नही चीज जटिल हैँ ओर वह भौ उनको सरल मनाना चाहा है पर उसम असफल रहता है। सभवत एक मामल म॑ दाना सहमत हाग॒बहुत टशन है ॥इस कथन लडका क} टेशन परशाना ज्ञलक रही है जोकि स्वाभाविक है तथा कविता से भी परेशान ज्ञलक रह है क्याकि उसको नजर यहे सरलता को नष्ट करती तथा टशन को बाती है इस तरह आधुनिक कविता के एक आधारभूत पहलू- उसके ओर टेरान के सवध- प्र इस कथन से अनायास रानी पड़