सरस्वती श्रुतिमहती महीयताम्‌

सरस्वती-सम्मेटन करा

चतुथं

वापिक व्रत्तान्त

प्रकाराक सुन्हीराम जज्ञासु मृस्याधिष्ठाता गुस्कुल

सं० १९६८ वि

विषय-सूषि

~> विषयाः पृ प्रथमाधिवेदानम्‌ 8 6 “म द्वितीयाधिवेहानम्‌ 2 “छ तृतीयाधिवेदानम्‌ चतुथा धिवेदरानम्‌ 6 ~“ ` तोरणबन्ध चित्रम्‌ "" “~ २१ अमिभाषणम्‌ श्रीपति ्र्राम प्राचार आर्याणां सम्यता = “~ ` “~ "` ५९२ क्या बुद्धदेव नाम्तिकिथे ? “८ “~ “९४ ब्राह्मणारोचनम्‌ ~ “~ ~ १२४ वेदाथं करने का प्रकार " ““ “१४७

सचना

श्रीमन्तो महाभागाः ! अस्य चतुथं वार्पिकवृत्तस्य प्रकाशने- ऽनिवा्यं कारणवहान्मद्रण दोथिल्याच यो विलम्बः समजायत नून भवद्धिः क्षन्तम्यः सरोधन प्रमादाऽवशिष्टानि स्वलितानिं चऽवदय भवन्तः क्षस्यनत -- . इत्याशास्ते विभश्वमित्रः सादित्यपरिषन्मन्तरी

ओम्‌ सरस्वतीसम्मेन के चतुथं वषं

का संस्षिप्र वृत्तान्त

सरस्वतोसम्मेटन का चतथ-वाषिक अधिवेशम ९९६८ संवत्‌ कौ प्रथम तथा द्वितीय वैशाख ( १३.९४ अगल ९९१९ ) को एक्‌ चार अधिधेशनों मे समाप हुञ्रा।

इस वषे श्रनेक विहूानों ने सम्मेटन की शोभा बढ़ने में साहाय्य दिया परिषह्‌ हादिंक धन्यवाद पूवक उन सध तन्न है ओर विशेष रूप से यह बंगाल के श्रोयुत पं विधुशेखर भटाचाय्य जी, श्रीयुत पं० श्री द्‌० सातवरेकर जी, श्रीयुत स्वा० सत्यानन्द्‌ जी, श्रीयुत पं० शिवशङ्कर जी कात्यतौये रीर भ्रीयुत स० जगन्मोहन वम्मां जी की कृतन्न है जिन्होंने अ- पने उत्तमोत्तम एव विचार पूण भाषशो दवारा विदू उलन समह को असृतस्नात इव कर दिया सायहौ यह परिष स० विष्णुदत्त जी को भी नहीं भूल स- कती जिनो ने अपनी सुमधुर एषं वाद्यमाश्र सहाय

| |

बाणी द्वारा श्रोतारो के कर्णा को आप्यायित किये रक्खा ;

शस वषं के अन्यतम †नवन्धकता श्री० पं० केशव- देव जी शाखी अपनो माता कौ अस्वस्थता के का- रण सम्मेलन के भरबसर पर उपस्थित नहो सके, अतः उन्होने पूणं सष्टानुभूति पूेक क्षमा याचना करते हुए आने मे असमथेता का सूचक तार भेज दिया या। श्री० पं० चनश्यामसिंह जी गुप 7, 50... 1.. ए. नी जो फि परिषद्‌ के सुयोग्य तथा उत्साही सञ्जनों में से एक है अनिवाये कारणव से सम्मेलन फे श्रवसर पर उपस्थित नहो सके, जापने भी परिषट्‌ के साम आगमन के विरोधो कारणों के प्रति शोक मसू- अक तार भेज दियाया।

वैशाख (१३ अपरैर ) प्रातः।

प्रातः काल यज्ञ के अनन्तर सम्मेलन के प्रारम्भ मे श्रो” हास्मा मुन्शोराम जी ( प्रधान साहित्य प- रिषट्‌) ने परिभित एवं सादगभिंत शब्दों मे सध उप- स्थित सज्जनो को परिषट्‌ कौ भ्रोरसे धन्यवाद्‌ देते हए सम्मेलन को आवश्यकतां को हस्तामलकवत्‌ कर दिखाया दस के पश्चात्‌ सम्मेलन का का कायं प्रारम्भ होने को था। उर समय-विभ्नागमं जोमु- द्वित हुआ थां श्री सः जगन्मोहन वसो जी का नास

| ग]

था किन्तु वस्म जी लकसर में गाङो चूक जाने कै कारण नियत समय पर पहु सकेतः चस समय “उख पनिषदो मे द्रत वाद्‌” पर संरूत भें विधार हआ दवेत पक्ष के प्रधान पोषक श्री” पं० आयेस्‌नि ज} ओर अटत पक्षक श्रौ पं” शाखग्रान जी ( गर- कुलाध्यापक ) ये विश्चार यद्यपि शुष्क विषय घर सरीर संस्छत क्नाषामे था तथपि सहस्रां आद्भियों का निरश्चेष्ठ श्ोकर वेटे रहना सम्मेलन की कतरूल्य- ता का पय्योप्र सूचक या! सभापति श्री० पं शिव- शङ्कर जौ काव्यतौधे घे।

मध्यान्छ ( वेराख ) प्रथम अधिवेश्न उसी दिनि सायंकाल बजे से फिर सम्मेखटन की काय्णेवाही पुररम्भ हद्‌ आरम्भ मे ल० विष्णुदत्त जीने कु समय तक अपनी मधुर वाणो द्वारा सब के सनो को भआकषिंत फे रखा

तदनन्तर सष्भयिक पधान श्रौ पं० विधुशैखर भ- हाचाय्येजौी ने अपना पारस्भ्षिक * “' अभिभ्नाषख”) पारम्भ किया यद्यपि अभिभ्नाषर " संस्छत में था तथापि मधुर, भराव पूणे भीर सरल था, शाद्‌ जा से सवथा टूर था। अतः उसके सब गुण भपनं ही ये। अतः हम संस्कृत मे पवेश रखने वारे सब महा-

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# अमिभाकष्ण २९ प्रष्ठ पर मुद्रित हे

[१

शयो से पाथना करते है किवे यदि इसके समक्षम का यन्न करेगे तो अवश्य हौ ससम पांयगे। तथापि कुछ योष्सा अभिपाय हस यहां भी आयेभ्ाषा सें पकट कर देते हे आपने कहा-

"कद्र ! अतग !

सखसे प्रमथ मे आपको, सभापति काञआ्आासनदेकर अत्यन्त नुग्रह करने के कारश अनेकानेक धन्यवाद्‌ देता हं किन्तु सायही मे यह भौ कहना चाहता कि मेरे जैसे अयोग्य पुरूष केसंगसे यह सभापति का आसन निश्चय हौ बहुत कलद्भित हुभाहै आज शस शुभदिन को देखकर बङी प्रसन्नता होती 2) इस शुभ्र अवकूर ( सरस्वताो सम्मेलन ) का लाने वाला गुरुकुल ही है अगज जिधर देखो उधर गुस- कुल के षी गुण गप्ये जाते हं अतः सभ्यगण ! आनौ ्रापको गुरुकुल को विशेषताएं बतलाऊं प्रज कट शस देश मे पाश्चात्य रोति पर अनेक विद्यालय चल रहे हिं पर वे हमारो जावश्यकताजंए को पूरा करने में सर्वंधा असमथे हें, क्योकि पूर्वीय शौर पा- प्रचाल्य सभ्यतामे जमोन आसमान का अन्तर है। पूर्वीय सभ्यता वनो से प्रादुभ्रत होती हि भौर पार्चात्य सभ्यता शहरो से पूर्वीय सभ्यता आ्ाल्मा क्री सेधाः करती है पर पाश्चात्य सभ्यता धमकी

( |

सेधा करती है पूर्वीय सभ्यता श्रमृतत्व ( मोक्ष ) को उपासिका हि जर पाश्चात्य सभ्यता विषयानन्द की इस के लिये आपने अनेक प्राघीन पुस्त कोके प्रमाण दिये।

शस समय की शिक्षा ्रासरो शिक्ताहै, देवशिक्षा नहीं देवशिक्ला बह कलहाती हि जो ब्रह्मचय्ये पूवक हो, जिसमें आत्माका शिक्षणहो ! इससे रहित शिक्षा शिक्षा नहीं कहाती, पेसो शिक्षा आचाय्यं क्त अतिरिक्त कोद नहो दे सकता अतः आ्राचाय्ये कुलं कौ रीति व्रशस्यतनरहै। प्राचोन कार से वतमान काल भिक्ष है। अतः इस समय के गुरुकुलो में प्राचीनो को अपेक्षा कुठ नकुर भेद्‌ अवश्य है जौर वह होना भौ चाहिये यद्यपि प्राचीन समयमे पाश्चात्य विद्याओं को शिक्षानद्‌( जाती यी तथापि श्व खस काकुद कुछ देना आवश्यक हो गया है अन्यथा हमारे ब्रह्म चारा पाश्च।त्य सभ्यता के अच्छ अंशो को ग्रहण करने ओर बुरे अंशोंके त्यागने में समथेनषह्ो सकगे तदनन्तर त्० ब्रह्मदत जी ने अपना “प्राचीनाय्यशां सभ्यता?)+ विषयक संस्छत सें जिबन्ध पठ्ग निबन्ध मे निम्न लिखित बातों पर ` विशेष बल दिया गयाचथाः-

# यदह निबन्ध ९२ पृष्ठ पर मुद्रित दे

9

(९) आयोवतं के निवासी आर वेद्धमाव- लम्बी ही ज्यं पद्‌ वाच्य है, अन्य नहीं अतः पा- इथात्य विद्रानो दारा ("अये") शब्द्‌ का अथै (ङषकः किया जाना सवथा अम मूलक है),

(२) खृष्टिके आरम्भ से पतन्जलि ऋषि तक भारतवषे न्नर में प्रायः संस्कत प्नाषा बोलो जाती थी, स्स की पुष्टि मे आपने महाभाष्य का सूत रौर वय्यारण का विषाद्‌ प्रमारूप से पेश किया)

(३) प्राचीन समयमे जाति गुण कमानुशषार सानी जाती यी खीर इसी व्यवस्थासे संसार के सारे दुःख दूर किये जा सकते हैँ ग्य सोशखिज्म आदि उपायों से नहो ,

(४) प्राचीन आयं ने केवल आध्यात्मिक उ- ऋति हीन को थौ वरन्‌ प्रारुतिक उक्ति केभौ शिखर सक पहुंच चुके थे एस के लिये निबन्धकती ने रासायण शुक्रनीति आदि के कदे प्रमाण दिये।

(५) अन्त मं निढबन्धकत्ती ने त्र ह्मचय्ये निष्ठ, स्वयंवर विवाह, सिये का सन्नान, प्रजातन्त्र राज्य, चसोपकार दृति, अषिसा दृत्ति रौर व्यापार वृद्धि को हो सच्चो उक्ति फे अंग बतलाते हुए प्रत्येक का भली स्नाति वणन किया आर प्राचीन आयो में इन सब गुणों को विद्यमानता दशाोदै निषन्थ पर समालो-

| |

चमा रौर उस फे उत्तर अनन्तर सभापति मण्ने किर्चत्‌ भेद्‌ भाव को स्वाभाविक बतषछाया ओर निरगेख वद्‌ कौ रोकने कौ समुचित सम्मति दौ।

तद्गन्तर कविरटन श्री अखिलानन्द जी ने निज निसित ““यन्ञशतक, ( १०० श्लोक, यन्न को स्ति के ) पठ कर सुनाया शस का समापि केसाथही सन्ना प्री विसभजित इडे रात्रि | दितीय आधिवेदान क्योकि श्री म० जगन्मोहन वना जौ दुष्टर को श्रागए थे अतः बजे रात्रि को निबभ्ध पठा जाना निश्चत हुश्रा सामयिक सभापति का जासन श्रो० स्वा० सल्या- नन्द्‌ जीमे ग्रहण किया। सभापतिकं कु प्रारम्भिक वाक्यां के अनन्तर श्री? म० जगन्मोहन वसाीजीने ५५+क्या बहुदेव नास्तिक थे” विषय पर आयेभनाषाें अपना निबन्ध पटर इस कै प्रनन्तर समालोचना प्रारम्भ हदे, समा- लो कों ने २-३ ष्टी बातों पर विशेष बल दिया, (९) वेदां में दक्षिणा सूक्त" को जो निषन्ध- कती ने प्रक्षिप्त माना है बह सवधा असमञ्जस 2 # यह “शतक” पृष्ठ पर मुद्रित दे नि # यह निबन्ध ९४ पुष पर मुद्रित हे

1

श्री० पं० श्रो० द्‌० सातवषेकरजोने तो उन्हीं दक्षिणा सूक्त के मन्त्रा.ॐ.ेसे.अच्छ अथे कर दिखाये कि श्जन्त मे निबन्धकतो,.को भी-कहना पडा कि “यदि ठन

मन्ध्रों के येही अथेहितोमे इन को प्रक्षिप्त नहीं मानताःः

(२) यद्यपि ब॒हु भगवान्‌ नास्तिक नये परन्तु नारितिक होना ओर आस्तिकषोना श्नमें बड़ा अन्तर है

पश्चात्‌ निबन्धकन्तौ ने कुछ बातों को शङ्कार किया ओर करका फिर स्पष्टीकरण किया),

तदनन्तर सभापति महोदय ने समालोधकों का साथदेते हए कहा कि यद्यपिवबुदु नारस्तिफन था तथापि पुष्ट प्रमाणें के विना आ्रास्तिक भो नहीं कहा जा सकता; निबन्धकत्तं ने जितने भौ प्रमाण दिये ह, वे बुदु फी आस्तिकता को सिह नहीं करते इस प्रकार ९९ बजे रात्रि के सभ्ना विसित हदे,

वेदहाख (१४ अट) © पूवाह्न अधिवेक्रान प्रातःकाल के समय यश्नादि के पर्घात्‌ सम्मेलन क्यो काथेवाहय भ्रारस्भ हश! सामयिक-सभ्नापति का आसन श्री पण शिवशंकर जोने रहण क्या। श्री. पं० ऊेशवदेव जी शाखी का निवन्थ पडा जाने को

[स्च

था। पं०्जी कौ माता अत्यन्त बोसार थी अतः डन के प्राने पर मन्त्री (सा० परिषट्‌) ने उनका ५५५ व्रा- मणालोचनम्‌ संस्कत भाषा का निवन्थ पठुकर सुनाया

निबन्ध की मुख्य बाते ये थौंः-

(९) ब्राह्मण वेदवत्‌ प्रमा नहं हो सकते वधोकि वे मनुष्यों के बनाए इए है,

(२) देवता निमित्तक यपुरोडाशादि का प्रक्षेपही यश्च शद्‌ का अथे है)

(३) (ब्राह्यणा) का सृरूय प्रयोजन वेदार्थो को सुलभ्र करना है

४) ब्राह्यणा मे तत्कालीन सभ्यता का बहो उत्तम रोति से षणेन किया गया है। उस समय खिथेों को अवस्था कुछ प्रशस्य थी

(५) ब्राह्मणों मे अवद्य जीर अनवद्य दोन प्रकार के वाक्यहें। कटे बातें विज्ञान सै टष्कुर खाती है,

(६) वणं-व्यवस्था जन्मसे भो मानी जाती थी

(9) ब्रादणेों के मत में स्वगे ओर नरक प्रदेश विशेष माने जाते है!

व्येाकि निबर्धकल्तो उपस्थित ये, अतः समा- लोचना नहो सको।

# यहं निबन्ध १२४ पृष्ठ पर देखो

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बस के पश्चात्‌ सभापति महोदय श्री पे० शिव- शङ्कर जी ने अपना भाषण प्रारम्भ किया) भाषस की समापि पर श्री पं० गौरोशङ्भुर व्यास ( गुरुकुला- ध्यापक ) जी ने अपनो स्ित्रमयौ + कविता पठ्कर सुना ! कविता समाधि के साथ हौ अधिवेशन की कायेकाहौी भी समाप हृ

बैशाख मध्यान्ह चतुथे अधिवेदान.

सायङ्काल को पुनः बजे से सरस्वती सम्मेखन की का्वाही प्रारम्भ हहे प्रारम्भ मे म० विष्णु- दत्त जी ने गान प्रारम्भ किया ओर सव उपस्थित सच्जनें के चित्ता को सोचे रष्खा

कूसके पश्चात्‌ सामयिक सभापति श्रो, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी ने सभापति का आसन ग्र हश करते हुए कहा कि -

वेद्‌ हौ पेसौ पुरुतक है जस को भारतवषं के प्रत्येक धमे के अनुययौ अपनाने में अपना गौरव समश्रते है अतः हसक इस के अनुशोलन को बडी न्नासी आवश्यकता साच होमे उन पार्चात्य धि- हरे को चन्यवाद्‌ द्ये विना नहीं रह सकता जिन ने अपने अनथक परिश्रम से हमारो- नहो नही सारे

1 का, 1 रै

# यह कविता २९१ पृष्ठ पर म॒ष्रित हे

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संसार की धमपस्तक पर विचार का मागे खोलने मे चेह कौ हि। कुर लोगों कौ उन विद्धानां के ्रति बड़ी चणा को हष्टि है पर मेरो सम्मतिमेवे पा- भ्रचात्य विद्वान्‌ उन रोगो का अपेक्षा जो युद विष- यक्ष मन्त्रों को दुगीपूजा पर टलगाते है ओर बोलले भी वेदों के रक्षक बननेका पहिला अधिकार रखते है क्योकि शकष परमपविन्न कायं को श्रा्यस- साज यथ्शक्ति कर रहा है अतः समाज का अनु- करण तथा साहाय्य हम सबकोभौी करना चाहिये

इसके पश्चात्‌ त्र० इन्द्र जी ने अपना, वेदाथ का प्रकार विषयक आय्येाषा का निबन्ध पड़ा, निबन्ध पष्ट जाने फे समय २॥ सहस्त्र के लगभग म- नुष्य उपस्थित ये ,

निबन्ध पटं जाने पर समालोचकों ने निन लि- खित बातों पर ही विशेष बल दिया:--

(१) वेदाथ करने के लिये खेटिन, ग्रीक, पह. लवी आदि न्षाषाश्रों के ज्ञान कौ प्रावश्यकता अथव! नहीं |

(२) तकं को वेदाथ करनेमे मुख्य भाग रना चाहिये या नीं

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# यह निबन्य पृष्ठ १४७ पर मुद्रित हे

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(३) क्या योगी ही वेदां कर सकते हिं अथवा अन्य अस्मादूश भी (४) वेदाथ करनेमे स्वरे सहायक है अ- यधा नहीं समारोचको को समालोचना के समाप होने पर निबन्ध कत्त ने उन कायुं समाधान किया-

(९) यतः कदे शब्द्‌ जो लौकिक भाषाओ" में एक विशेष अथे के बोधकर परवेद में वेही शब्द्‌ लौकिक अथे के ठीक विपरोत अथं के वाचक है जैसे लोक में “वामः! शब्द्‌ का अथं “उलटा या “वायां है परन्तु वेद्‌ में “वासः शब्द्‌ का अथे “खुन्दर अतः खौकिक भाषायो ( रेटिन, ग्रीक, पषहलवौ आदि) केक्लान को वेदाथेमें कारणता दे

(२) माना शि निरुक्त व्याकरणादि शब्दाथं क्षे बोध कराने मे सहायक्ष हिं पर अनेक अथो में एक का निधौरण करना तो तकंकाषह्ी काम हे,

(३ ) “योगः कमेसु कौशलम्‌, के अनुसार उक्त साधनो से सम्पन्न रूष योगीवत्‌ अथं कर सक्ता हे

(४) स्वरो को वेदाथं करने मे तव सहायक भाग सकते है जन उन कावेदो के समफालौनहोना स्वीङूत हो

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निबन्धकत्तो के प्रत्युत्तर के अनन्तर सभापति महोदय ने जिबन्धकल्ती के निबन्ध से सहमति प्र कट करते हुए कला कि वेदाय ज्ञान उपलब्ध करने सि पूवे पुराणो, तन्त्र ग्रन्थो, ओर आण ग्रन्थो को गम्भोौर ्नुशोलन को आवश्यकता हे त्र ग्रन्थो के विषयमे आपने कहा कति ष्न में अक्षरोको उ- खटा कर देने का एक गियस पाया जाता शै यथा अग्नि का हग इनके सल पठने पर कर विज्ञान सम्बन्धी बातें लक्षो को उलो ही बनी रहतो

प्रस्येक मन्न का विजियोग अथं को देख कर करना चाहिये अन्यथा शब्द्‌ साम्यसे तो हेसा महा- शय को नो 'शहेशावास्य भिद्‌ सवेम्‌"' मन्त्र कै देवता अनने का सौभाग्य प्राप्ठहो जायगा)

सामयिक सभापति ङे भाषश के अनन्तर श्री° महात्ला मुन्शोरास जी ( प्रधान सा० परीषट्‌ ) की ओरसे श्री पभ्रो० रामदेव जीने सब उपस्थित सज्जनो के प्रति हादिंक धन्यवाद तथा कत्ता भकट को विशेष रूपसे बङ्गाल के श्री० पं० विधुशेखर भट्टाचाय्ये जौ श्र श्री० श्री० दा० सालवलेकर जी जिन्होभे दूर देशो से आकर सम्मेलन की शोभा को अनेक गुणं तथा विरजीवी

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करने मे विशेष सहास्य दिया कौ कत्ता के ऋण का वणन किया ओर साथ ही परमात्मा से प्राना की कि यह सरस्वती सस्मेटन भगे से विशेष उनि के सर्गो का छ्नुसरण करता हुआ अपने उद्य मे सफलता प्राप करे

दरस भाषण के साय हौ सरस्वती सम्मेलन का चतुथे वाधिक अधिवेशन भी समाप इभा

विश्वसित्र सन्ती साहित्य परिषद्‌

काविरन-श्रीमदखिखानन्दश्चम्म प्रणीतम्‌ ८८ ¢ यज्ञ वणन शतकम्‌ |

- -------- 105. *~ -

आत्मनि मथचात्म शारीरं

यं वेद्‌ केथमप्यय मात्मा सवविन्यनिल्यः भहातत्मा श्रेयसे भवतु सेव जनानाम्‌ विष्टपोडरणक्रामनया यो योगिराटइधगतं समैव

राम मोक्िकमपास्य जगन्था माप जन्मम्‌ मततार्नु हद्भ्नः ॥२॥ कायेभाय पुम्मे रनर प~

ददनं गुणवस्ादिद शक

वैदिकी नवरसा मधुरा सा। भारती भवतु सवे दुग्बाय

आत्मनि तिष्ठ त्रास्मनोन्तर इति वाक्यमव्ंन्य मगर मेतत्‌ विष्टपं मुबनम्‌ |

सरस्वतीसम्मेलनम्‌

भमदधोरपि विशारद भावं |

याति यत्छःरुणया रुषाया सत्‌ सचगुरो अरण पक मारा- न्मानसि सलु निगेन साम्यस्‌ > खडि मति जिषदुषामिर्‌ यषां म्मगमन परिषल्प्रनि षम्‌ हर्चपृण मनमामपि नयां

स्कागलं भवलु सत्रमसमश्चम्‌ ^ दैखलः परिपद्‌ नियुक्ता,

या सस्ुद्ररस नन्द्‌ खगाङ्कः संगते हारदि सा सिनपश्े खन्द्रिकिव वञ्धे गुणमाजाम्‌

नाच्च कऋथ्िद्पि विस्मग्रललक्ा |

बिषतत यद्पिसिन्त खहाया जरनाद्‌म्गना्विल्यनां

मानसानि परिषष्यनि दषात्‌ जालमेव नियतरनुयागा- दाद्यमेकसधिवेश्ानमस्याः यत्सस॒न्चतिमटन्गुणग भी-

मेकलः स्तुतिपदं ससुपागात्‌

इन्दर द्रा मेत्रीच

यज्ञचणनङयतकम

जन्मनोऽधिमङारश्णुभ्रन यटृगुणन विवुधैरपि मानम्‌

सा भजस्व निद्ामश्र जस्या आावगमेमजरादनिनानम्‌ विनं यिदितभय गन्द

प्राच्‌ यदटमश्च भायाम्‌ वेदवणनपमं नवपदं

ससद्‌न रानकर चिुध्ानाम्‌ १०॥ नालमस्मि कथनाय समर्थो

यस्य यज्ञविषयस्य नसस्मिन्‌ वार्पिंक्रविघ्रु्वयक्रद्म्तर |

साहसेन कथयामि कथंचित्‌ »१॥ हञ्यते जगनि मन मटेशाः

कमणा भवनि वा मदिनानाम्‌ मगतिस्तदयुदान्लिवक-

स्तननिस्क्त भिह्‌ यक्षपदस्य २२॥ धातुपाटपरितायजधातो-

मैडम्ययं भवति करत्स्यविधाने

यज्ञ शाब्द इति के विदुर्ये च्याक्रते रधिगताः परपारम्‌ २२ केवलोपि बहुटखाथेकलां ना-

मति शाब्द हनि यन्न समेति

सरस्वतीसम्मेखनम्‌

मानसर तदिह भावयलारं यज्ञराञ्दमति गृदविक्रारम्‌ २४ |

कामधुग्भवति कारणवर्या-

देक एव किट राञ्द्‌ इतीदम्‌ सत्यमस्ति कयम यदि सस्पक् सप्रयाग सुपयातलि मदर्चः १५ सयैशरा जगनि चारासना मे कोविदटास्लपश्वि सनस; वैदिकस्य विषथस्थ ण्य- प्राथरोऽमरपद्‌ ्लस्रान्ति ५६३ यान्तु नास कथं स्युरभावं।

ले जना जगि यनिंअकीतिः स्थापिता नवनिवंभ्र विरोध -

रच्च निगलविनारदापद्ामा २५ मानन जगति यत्कि नषा संगति लघुनः खसष्टयामा॥ यज्ञमेव मस्ुमैलि निसगा- देलद्‌वयजघातु मदसस्वम्‌ १८ या्लवल्क्यस्निनिमिनवेघे दानमेव बह्वरणिलभेकम्‌ यनिवारयति दुस्तर दुगो-

द्‌च तान्निरसमानववयौन्‌ ।॥ २९

यज्ञवणनरतक्रम

धमकरान्िपरिनिःमनभव्य- स्कंधथाव सखुपयान्ति जगस्याम्‌ यञस्दानपर्नानि किमेल- न्नावलोकि भवतामपि पूर्वैः २० दानमश्च जगलीललमध्ये

नाधुना भवति प्रवचदतत्‌

किः श्न भाति भन्लाभपि उडी पत्ममस्तसतुस्वक्मरणयकम्र्‌ २१ दानतो भवति रतलमध्मे | कीतिंस्त्मतमा मनुजानाम्‌

या नरयति चविनाश्मितपि- प्राथराः पकरतिकाथकर्दवे २२ उत्तमं जगति पाद्चमवप्य-

प्राप्य देङामपि विध्यलुकूलम्‌ कारुमप्थुदितमीश््य यदस्भि- न्दीयतेभवतिनत्सलंसत्‌ २२ गलया परिगातमद्‌ः किम्‌ योभिराज सुग्वनिःखखलया यत्‌ प्रगवर्णिं मयकानिगमज्ञेः

किः गीनमिदमेववदन्तु २४ निधनो भवति कुस्ितपाच संप्रदाय वस्ुदानपरोपि

सरस्वतीसम्पसनम

नावलाोफि फिमिदं बत विज्ञैः | चुक्रनीति बव्वनं बह््ुसारस्‌ २५९ अदयचयेपरिपालनदेलो-

रस्ति यद्गुरुकुःलक्रलमतत्‌ पाच्मस्ति तदल धनणाजा- माय्सुसमधनव्ययभाजाम \) २४ दीनबाखविधवोट्ररणाभं

मे ददत्त्यधिरत वसु लोके मामर्व्तिन नवपय्यद्ानैस्ते-

किं.न संसदि भजतु यशांसि २७ वैदिकाध्वनि भवतु करनेच्छा भूतलेऽच्र गमनाय चिराय नान्यवच्त्मेनि कथंचिदितीच

प्श्य याद्रिलरणं नरणं नन्‌ ।! २८ सवमेलदिदह दानकथान्नः-

पाति कायसुषयाति जगत्याम्‌ यञ्लभेद परतामिति मन्वा यज्ञमेव कुरुलास्मनिविश्ाः | २९.॥ जाह्मणेषु यजनं विधिद्ट

पाजनन्तु मनुना ऽप्याधिटटम्‌॥ यत्समस्वजनदिषटट जनिष्-

ध्वंसि साधयति बैदिकदिश्म्‌ २०

यन्नवणन्तकम्‌

घञ्जरूप मधिपं भवनानां

दैवतानि विवुधास्मनिभानि नायजन्त किमु विस्छलयज्ञे-

रीरक््यलां मिगससस्विधानम्‌ ३१ बाश्जार्मुगमनाय क्रलोध्या

मानवेन विधिमाभकरण

किं बोधयति नेष्वलरः मिरज्यों | वद्वाकमपरिमाजितक्रत्याम्‌ २२॥ ग्रे जना जगति जन्म समेश्य प्राथर्यंत्यविरतं जगदीराम्‌

नै यजतु जगदीषाकरतेऽखं नान्यदस्ति परनः शिवमस्माल ३३

#

भपदासषिरनं मुचि दात

प्राणयपित खवनोदरभाजाम्‌

गे विष्टाय यजनं निजक्ार्भे

नत्पराः पठाव णव बल्डात्त ३४ परमे प्य जगमीनलभाजः |

पडनन पजनंगुणभाजाम नान्यदस्ति परम धनभाजां

साधनं परमः सम्य भाजि | ३५

यत्नेन यज्ञमयजतेति मतर मूदकेपयम्‌

मरस्वतीसम्पगनम्‌

देषपूजनमपास्य जगत्यां

ये प्रदसमिह नैः पवनादि

सुश्जते नरकमेव परस्ता-

चे प्रयांति बह दुःस्वनिवासम्‌ ३६

प्रव्यहं निजक्रतं बत पाप

मेध्यते यदि भवद्भि स्पात्तम्‌ कि लदाम्ति फलमीक्चणयोवो कायमास्रपरिचखारिसुवङः ३७

पाधथिवं जगति साधनमेकं

कीर गस्मद्पकारक्रने तत्‌ केस्रणां भिति कीदशभावं लत्प्रयाति मनुजैस्पसुक्तम्‌ ३८

दिव्यशधवदनेकगुणाहह्यम्‌ वीर्यवत्प्रकृतिपेडालमच्छम्‌

जायते मनुजसंगवलालक्छिम्‌

नैव पूतिफलजातभनेकम्‌ ३० जीन भवति यज्ननिभाजां

जीवन नदपि मामवसंगात्‌ पेयताभिद विददाय समेति

प्रत्य विक्रतिमेव विशाखाम्‌ ४०

[1 ~~~ ~~

जठम्‌

यन्तवणनरतकम्‌

सवथा लयमाच्र मपी स्थातुमदहेति जनो यदभावात्‌ कीटराः सपवनाऽ प्यार जायतेऽसुरमि रंलदवेश्त्यम्‌ 2१ किः किमलन्न गणयामि मदेखा देरासिङम्विलं वस्ुनारप्‌

याति नैव यजनं यहि खोक) जायनेऽनुदिन मुत्तमदन्यैः ४२॥ प्रत्यरं यजन मान्पदाधौ- छुडिदूरकरणाय यभच्छ्म्‌

काये माययु्वै रिनिलोके सिमस्ति निगमेपि म्रम्‌ ।॥ ४२॥ यावदस्मदुपकारकमेहः

भजलादि ममेष्यति श्ुडिम्‌ नैव रांतिरुपथास्यति च्रडि लावद्‌च मनुजेष्वयु विडम्‌ | मंदतासुपगता मसुजानाः

बुद्धिर्न यदि कारणभेकम्‌

दयते जगति तरि पदाथौ- दुदिरेव ससुचेति सखुवुडिम्‌ २५ कभ्यतेपि सुनिभिः परिप

पुस्तक्रे जटधरतान्नाषेद्युखिः

| |

सरस्बतीसम्मेलनम्‌

कारण मनुजसंगलवद-

मभोजेनस्य यदस्ति गेषु !। ४६ कारणादद्धवति कायेमेम्रडि-

भ्रूलैटे भवनि लद्‌ यदि खुम्‌ श्राखमेव सकलं यद्श्ुं

सथैमस्ति जनजालमश्गडम्‌ ४७ || भूलकाल मलुगच्छति कार्य

योक्षलि जगति वुडिखपागात्‌ नाधुनालनजना टितक्रृत्ये

सास्ति शुदखिचविलखयेन किमन्यत्‌ ।॥ ४८ सवथा तदधुना जनवर्-

यज्ञमेव विधिपूवेक मस्मिन्‌ भूलटेऽनवरतं बह्श्राङि नेयमेलदगमागमसिदम्‌ ९. ॥। दष्ठानेषु बहधा किल नस्य प्रधिना ऽथफ रदस्य मुनीरोः कल्पिता नवविधा बह यामां प्लस जयति विस्सनिरुग्रा ।॥ ५० मासिमास्यवभ्रथाणायनपृलं |

यदुग्रं भर्वति भूतलभाजाम्‌ भूल इुख्िमधिगच्छति नन्त- व्सबेदेनि मलत्राक्य मचश््यम्‌ ।॥ ५५

यज्गतरणनस्चतकय ११

नृननान्नसमये नवसस्ये-

रभे वा्षिकमल्टक्रियने यत्‌

सादरं यजनभस्न नदश्ना-

दुद्रा न्यनि नारासरागान्‌ ५२

याषिकरषु यजनषु याचिन््पं ापिनानि मक्रलान्यपि नानि साधनानि जवन्ि गृदषु प्रायराो गतगणाम्यतिगंधेः ५३

दौचमेषु सकटेष्वपि सुख्यं विद्यते यदि तदस्ति यज्ञे ।॥ निष्फटेव सकलापि तदानी गरल्तकायक्रनिम्नलमसंस्या ५४

मंद्‌कुाडभिरनकपनश्चाना-

मच यज्ञविषय परिदिष्रम्‌

सारणं नवनवामिषलोभा-

यन्न करटिचिदुपेति विधानम्‌ ।। ५५ 'भ्वारि पारि यजमान पश्यस्ता. निन्त्थमध्वरविधी बद्वारम्‌ वारयनिगम ण्व विदिसा-

मीक्ष्यतां विकसिनेष्णकंजेः ५६

(क

उरिति विर > उत्तमफटा

१२

सरस्वतीसम्मेखनम्‌

नास्ति यस्य निगमेषुविधानं शिसनस्य कथसमच्र तदस्य

भलर प्रथनमतदिदानी

भावुके मनसि मश्च विचायम्‌ ।॥ ५७ यास्कदेवक्रतकराब्दयनिम्क्त द्हिताऽध्वरपदस्थ निरक्तिः स्पष्टमेव किल या पशुहिसां यारयच्यनुगला निगमाथम्‌ ५८ देवप्रजन विधौ पडुटिसा

चेद्धवे द्वि पद्रकश्चणदष्चम्‌ मन्रविन्यसन मस्तु कथं वा। तचतुष्पदवला मपि शौक ५९. मानवेऽस्ति किट घमनि्वंधे यत्कचिसदनुङ्कलविध्रानम्‌

सवैयैव नदनगेल सुग्र- खाथदश्चमनसै ¦ परिणतम्‌ ३० धमवणनपरं जगत्यां

धरम॑दास्र मचनाङानदश्छम्‌

कुच तद्धचनजात्त भनस्प।

भेदजात भिदमच्र विचाथेम्‌ ६१ सवैदास्तदिद्य आरण मेषां

दूरतो लघु षिधाय वेधिज्नेः

यज्ञवणेनक्तकम्‌ १३

मेच्यनां थञजनमेव जगस्थां यश्दानि मलजणमनल्पम्‌ ६२ निच्यमेव निगमाध्वनि केगा- दातं खघ्वरणो भयनेषु पचयञ्ञविधिपालखनमकं

काये मेष नियमो निगमोक्तः ६२ भे विदाय निगमोरूविधानं सानवीु रचनासर यतन्ते स्पश्टमव नरकेषु निदेरा-

ते पतंति जगलामधिपस्य ।॥ ३४ सैव तिति जनो थदि पब परिचमामपि समति संध्याम्‌ राद्रवत्स निभणविलुदिजकायो- दुरमस्त्विति मुवदनीद्‌ ६५ करुत्यभक मिद्माश्य सनेक- स्वा्भकारि परमाथ समेतम्‌ दरयत्य विरतं करतभीरं सवभुतनिटखयं खघुमत्थोन ६६ सेवनीय सल एष मनुष्ये

भृतटे तदिद्मन्यदलस्नन्‌

प्रत्य नियमतोभिविधानं साधनीय मधिक्रतन्नातिचिसेः ६५

१४

न्सरस्वतीसम्मलनम्‌

पूजनं यदलिथे जेलभोज्य- स्वागतरादिभि ग्पेति तदेव धरमेसध््मगमना दविधिभायं हडदयतां जगति वद्‌ाविधानम्‌ ३८ भागकाः करतगटोदरभाल्या- स्लत्प्रयांति फलमत्र जगत्याम्‌ यन्न यांति रातदहणपि ममनः पामरा विधिषिरीनमनज्ञाः ।॥ ३० | वेभ्वदेव विधिरेष बिरषा

वेषलो वद्‌ति भूललभाजाम्‌ मत्क्रपैव शहारणं मरणं वा नान्यथा गतिरिति दयभिन्ना।॥ ७०॥ सन्ति किक्न मवनेष्विह स्वनाः

पच थाः प्रतिदिन कलयति प्रार्भिनाथन्ामनं चन पापं

स्थेय निरयंगमतापम्‌ ७२ तन्िवारणक्रूते क्रृतिदक्ष- कभ्वदेवविधि रेव मभुक्तः मेव्यता मत इउद्स्थमदेच्छः।

सादरं गुणपयेखु कृतच्छैः ७२ मातुरायजनकस्य यथाव-

स्पूजनं जगनि जीवन भाजः

यज्ञबणनशतकम्‌ १९

पितयश्चसुदिलं निगमज्ञे-

येद्धजश्च मनुजः पतलतीह ७४ सृषटबुधिभि रनगलमच्त्या

जीवना यजनमश्च विदहाय स्वगेलात्मससवसिदि. क्रतेन्न

दीयते जगनि तन्न समेति ५४ यान्तु नामकनस्छानि कथ तान्‌ प्राणिनो जगति ये वपुरत्र

सत्वरं फिट विशाय समेता : कमेभोग भजनाय चु गभम्‌ ७५ लकंविस्ततिबखेन विधेवी सस्प्रमाणनिचयेन समग्रा

सवेधा जगति जीवति पुजा बधय यमपाङास्रपेते ५६ ।। पेचभेनि यजनं निगमो

जना जगति जन्म खसश््य धारयंति कदापि पुनस्ते ¦ सोश्यन्ति नरक नवकण्म्‌ ७७ सललति भवलि धभेमग्ृद्ा

क्षतो भ्रुवि चिच्रमदोपि ट्डयते मरितरामकथा सा मानमच्र महनासपि मान्या ५८

११

सरस्वतीसम्मेलनम्‌

रामभद्रसदरी यदि लोके संभवेदिति ससास्लि मनीषा संतलिस्नदिद वेदमस्र्ट्‌

कायमेय यजनं नियमज्ञेः ५९ गभेतः पथति यात्मसुग्वार्थं संस्क्रति जगति वेदसुखोाक्ता ध्रायेने जनवरै यजनं सा

याति नाच्रकथनं बह्ुशुक्तमभ्‌ ८० सवे ण्व समये समये ते। मानचेस्पनिताः स्वयसय माधयान्ति जगता भनुभच्य | साधनानि परमात्मस्यम्बानि ८२ नाधुना खम्वञ्ुपेति मनष्या-

तैव वषति घनोपि घनाभः सस्यसलतिरषीद्‌ चना मोदयत्यविरतं मयुजानाम्‌ ८२ कारणं वदत कोविद्वयोः

यमेव विषये चेन्मे

चेतमि प्रनिनिकि्टसखदारं देतुमात्मनि नयतु चिराय ८३ मन्मते सकलसीख्यनिद्‌ानं

कारणं नवनवाम्बरुद्षन्तेः

यन्नवणनदतक्रस १७

साद्रं यजनमच्र स्टोर

जायने निगममच्रदातलेन ८४ सस्यगिकवदने विनिविष्म साऽऽद्ुति वरजति स्रय मधस्तात्‌ भालभडल्गता नवमेधा-

नेति वषणक्रते मुनाक्तम्‌ ८५ वण मति ममस्नरम्ताया- मरद्धतानि ष्ल्म्न्दरमयानि साधनानि सखम्बयंति मनुष्या- नडजानन पञछनपि मयान्‌ ८६ ॥। नेच यापयति व्याभ भमास्मन्‌ भ्रनटेऽशित मदा खघु तावन्‌ यावद्चिवदने द्ुतसारा-

द़ाध््यतां सष्टदभः स्वयसनन्‌ ८७ जाञ्य मल्पमपि वादिषि दन्तं पुष्कट्टामटति मिडमिलोवे यल जनवंररध्रुनापि-

प्रायशो जगनि वेदपथन्ञेः ८८ यज्ञलौा भवति माम्तदुडि- वारिदा. रथ भरतलटाडिः खात्मश्ुद्िरपि नाच्च विवाद्‌ स्तजितान्य गणवा चाद्‌ः ।॥

१८ .

सर्म्बनीसम्मेलनम्‌

सबेथास्ति जगलीलल्मध्ये हानिरेव यदिनो यजन लत्‌ पुणेलापि शुख गौरव गभो स्वदाश्न यदि स्यजनं तल्‌ ।॥ २० ॥। ङभ्वरोचकनियमतस्थ जभ्य पाटनाय निगमोच्कणिधे वौ दीयसां पद मयं मम भाषो विच्तेऽच्र कथने ततोन्यः ॥। प्राक्तनेऽच्र समये शुषि यज्ञै- धरपितेषु भवनेषु सकामा वस्तुमायनाभिता भवदारा-

द्वागवी गुणवद्धी क्रमभूनिः ।॥ ९२॥।। नाभवत्किमपि नाहा गें

यव यज्ञकरणाय करलेच्छाः प्राचसन्न सुनयो गलकाले |

का कथान्यमनुजानुगलीनाम्‌ ।। ९३ लत्पभाववदाता हि रोगाः प्राभवन्न भुवने धनङानाः पुञ्रपौश्रपद्ुडीनङ्ुलानां नामसमाच्रमपि नाच्च लदासील ९.३ नारित यदवधे मधि लोकै-

रख देवयजनं गलधीभिः

अवणनजतकम १९

सयथा लद्कधम्पयानं | नारामेव सकलं निजद्धामे ।॥ ९५ नष्टसीख्य भवलोक्य समस्तं भारतोरडरणदखक्ारीरः

सोल भ्डूमिवखय जनिमागा-

दो बभूव विदुषामनिमान्यः ९६ मवथा तदयचक्रल मिदानी- माद्राद्धस्कुे जनवर्भः क्मकायमिि केवलम॑ते | बाच्यमस्ति परं किंमषीद्‌ ।॥ ९७ मादमस्मि कऋथने बदहाक्तः

केवरं भवदसुग्रदषाच्म्‌

मवकोस्मि सकलखायजनानां लजितान्यमतवादपराणाम्‌ ०८ मत्किमप्यनुचित विषम चा।

मेचकेन मयकाच् सुम्चन

वर्णितं भवतु तद्भणमभाजां

क्रामणे विरचितं स्वनिक्च ।॥ ९० पलदेव विनिवेदयलान्ते स्वागतं विदधता नवपथयैः

~~~ = --~ ~ -~-----~ --~

महां दयानन्दः

२० सरंस्वतीसम्मेटनप्‌

स्थीयते परिषदापिंतदेरो भावपुणेमनसा विवुधानाम्‌ १००

| टेनि

श्री गोशदाङ्गर व्यावप्र्ण।तम्‌ तोरणबन्य चिरम्‌

दृशेयं भूरिसन्ता नुते सेदगोरवम्‌ भोगचेन्तासमा हूर तन्नाऽस्ति यत्करति (१) नाग्यी देशस्य ण्डेऽपि सुग म्नजनः

मन्वा धत्तेऽ = सानन्दं परिणा > खिद्यति (२ ) पराव ` ज्ानणीतिं पन्थानं > वजितम्‌

दार जादिषोहान्धा नक्षत वन्ध " म्मुखः (३) नस =" तोऽपि सम्भ्रान्तो मृटूोऽयं कामर वतः

अङ्कः वीक्षतेऽमन्द मक्ररा वहि यथा (४) एष स्युमहाव्याधः करङ्ीच रियम्‌

इह त्यन्तमरोरेऽस्मिन्‌ सम्बन्धकान स्यति ( ) जराय वत॑भानोऽपि परादरतप्णाव नं गतः।

नर दूपयन शश्च विपयेष्वेव "याति (& ) विनि " म्याक्नसंचारं सवनीय < त्तमम्‌।

पके 2 नार्तिहन्तारं हरिं स्मरत्वा विं रे जिरे (७) तद्र नट सान्त तृण त्वं त्यम्न्वा संसार ^ स्तरम्‌

मुक्तिसि दधि दरेःपादं रक्षितं सदि यति (८ ) { <

सरस्वतीसम्मेखनम्‌ २६

अगणितजननक्रमासक्त मुभ्रान्धकारं सदेवापनेतुं मनेदेद्ातः

भपि वितरणाय योऽरंप्रकाशस्य बुदधेगुरोःपाद एषोऽदितेनारयन्‌ अमुदिनभुदयेभजक्नापि साम्यं तस्येति नेद तमः केव संहरन्‌ रषिरमितगुणो यतोनेतरेः रक्ते तीव्रयज्राऽधिष्टे रपि स्पर्धितुम्‌ ॥१॥

क, स,

किमिदममलमम्बुन मानमानन्दहेत निवि प्रतिष्ठायुतमूतले किपृत शरदनेहपि सष्टगाराङ्गयष्टि कराजत्तयं राजहंसो गिरः किमुकलिकिटुषापनोदी प्रवाहशकासदधिवोनिस्नगायाः प्रदेरोऽखिटे निरचिनवमितीवसंशस्यपृथ विवेक्रोपदेरो गुरोः पाट इस्येषकः; ॥२॥

धनुबेन्ध चित्रम्‌

नि श्रादयुन्यं ्रपत्येतन्मानसं भागमभावुं र्म |

` द्राहसमासक्त रोगमेत्यपकर करम्‌ ( » )

भथ > नम्ममःपुष्पं चिप्र सोय + स्पते |

सन्पानु " विदशओ्चापि ग्रहणं = याचन (२)

याया देतस्यबुद्धधाऽभ्य सदागमः

अवरुद्धः > न्यस्य करे ? न्त्यात्मपोरुषम्‌ ( )

केचिदेनेन ते दुगे त्थानकरोधिभिः।

पाशैः स्मेव सि न्दन्तामन्वे रद्रानतामगुः (८)

कोऽपि कमे छख `अ न्त = म्नानन्दमात्मनि

अकि येथास्ति सै न्धन्‌ तोत्साह उद्रतिम्‌ ( )

कथिकापात न्दार पाञ्चा मूजगीषतम्‌

सस्तारब ञ्य छं नेति च्छाया्थ तिमश्नरः ( )

दूरषा हरिं ध्यायन्कानने हि माधित्‌ः।

कोऽपि रसमा षं विस्परन्समर स्थितः ( ,

= दां हरि यन्तु सुखदं पाश्चमोति काः '

म्बालसममोहस्य नोचह्वुद्धघा समाग मः ( ) (९)

¦ उरम्‌

प्रथना

तारय पारमयार ! पहेश्वर दुःखगभीरे संस्रतिनीरे पाठय मापिका नृनपसारे जनससारे पक्षय मापत्िमार ! नयनयुगम्पम कुर मुखकगपमतिविकलन्त्वमुदरार्‌ , तव गुणगाने जगदयमान त्रान पचा गुणसार ' तव महिमा वचसामगपः कृतव नगटूषकार ! लसतु सपाप यर्नसि विनापे गदं दुभसकखाधार ! उद्यति वाणा रविकरमासा हशहिशि परिगताकार तय प्िपाने जगध्समानं कयपरति निधिलत्रिसार ! नभापि मवान्भव ! पहुमुगवानिति पकड जगन्ति पार निखिलजनानपि पाशकरुनानपि सद्यषशेव वभार ! तव गुणपटुजसोरभसङ्गनमोदभृताः सुखसार्‌ ' योगिजना य॑ यान्ति गुणान्तं प्रापय मां तमपार '

ओम्‌ रिद्रार-गुरुकुटे चतुथ सरस्वतीसम्मेखने सभापतः अभिभाषणम्‌

भटा च्रातरः, परीतिवि्रम्भगभाः माधुवरादाः श्रीमद्भ्यः परः सहा; नून- मतिमहान्‌ ग्वन्वथं मानः प्रदरीतः श्रीमद्धिः प्रदायेदं मे समापते- रामनम्‌ उदर माभ्ध्रतं सजनर्परिपदमतामवनोकयतः समुदेति नेनसि यद्‌ धुवपिमात्रं पुपरमन्ना भगवती भवितेत्यना, क्थप- न्यथा सत्सप्यन्मप्‌ विद्यावयाम्यामभाम्यामपि व्द्धकतेषु सुनिश्चतेषु बुश पण्डितप्रफरण्टप, मथव वैम्तभैणे रविरहितोऽप्ययं जन ठहदामप्यामनमधिगच्छेत्‌ ? धवं कटङ्कितमिव मंवृत्तमद्दमासनं मत्म- म्पकरात्‌ यद्धि पूवमामीदलडतं समृद्धामिनं तस्ते्महत्तेमनीषिभिः द्मामन्तः, नाय प्रद्यते विनय, वाप्यनन्िधन भचारः हिषटाना, यत्सत्यं प्रकाम गवन्विदुं जिहत 3 विभेणि चित्त पदमिह प्रमार्यतः मस्यप्यवं मोः पभास्तागमहामागाः, भवतां नियोगो - स्यरमनतिषास्य ३ति कथं कथमपि विनीतन चेतमा तस्ारेपालनाय यथामति प्रवृत्ताऽस्मि भद्र वा श्रातरः) यत्सम्बन्धात्‌ सम्मिलति महती समितिः, गरदभ्युदयार्थं चायं प्रक्रान्तोऽ्र महानुत्सवः, तदिदं गृरुकुरं नामाद्य म्‌

२६ सरस्वतीसम्मेखनम्‌

कस्य खलं मारतीयस्य भारतहितेषिणहव भावुकजनस्य चिन्त नास्यन्तमाकंषति 2 ससकरणीया पद्धतिः शिक्षाया भारतीयानाभिति सवतरनेदनीं जनपदनगरम्रामषट्ीषु श्रुयते चिन्त्यते गीयते सादरानन्दं तश्र तश्र नामधेय गृसुकुस्य नेष प्राचीनं, न्यस्य सम्प्रत्यपि वत्मरद्ाकादधिकं वयः परन्तेतेः स्वल्पिरेव वासरेस्त- येवहि किन्चित्‌ प्रकान्तमननानुष्ठातुं येन कैव कथा नेदीयसा, नन्‌ द्ीयसामपि सह नयनन हृदय पिह समाकरष्यते श्रीमन्तः, प्र सामं वामेत्‌, नि, " म्वाध्विद्‌ तत्‌ स्यादिति |

नद्‌ विदितं व्र सर्वषां यत्‌ साम्प्रतं भारतस्य प्राच्येषु प्रतीच्येषु च, उदीच्येषु अवाय्येषु सर्वेष्वेव जनपदेषु यत्र तत्र बृहतां वा, मध्यमानां वा, क्षद्राणामेव वा नवनवानां बह्मचर्यानुरी- टनप्रयोजनानाम्‌ आाश्रमविदेषाणां नामधयान्याकण्यन्ते अस्ति हि षङ्कषु सुगृहीतन।मधेयस्य श्रीमतो रवीन्द्रनाथस्य ऋह्मचर्याश्रमः, स्वा- मिनर्च श्रीमतः पृणानन्दस्य “"नगत्पुराश्रमः'१, श्रूयेते वाराणस्यां (धविश्वनायन्र्यचर्याश्रमः,'' विद्यत बडोदाराज्ये 'शगङ्गानाथमारती- यस्वविद्याख्यः,'' वत्त अस्य॑व श्रीहर्िरेत्रस्यान्यत्र 'ऋषिकुट' नामाश्रमः) भवति श्ुतिषथातिथिः श्रीह्षीकेराक्षेत्रे कश्चिद्‌ वान- रस्थाश्रमः, सन्ति प्रभवत आयसमानस्य सूर्यखण्डप्रमतिषु ( 11. ७०५५५॥ ) स्थानु पदर विद्याखयाः, इदं चकमेतस्य॑व ब्रृहत्तरं गुरुकं सघ वयमिदानीमपितिषठाम इति रस्यत एव

श्रामन्तःपुनरप्यत्राहं प्रच्छामि-कोऽयमध्यवसाय एषां प्रतिष्ठा- पधितृणां ? कस्तेषामभिप्रायः ? कं खडु ते सिषाधाथिषन््यतेः

सभापतेः अभिभमाषणम्‌ | २७

के नामापूर्यमाणं मनोरथं तं पश्परियितमिच्छन्त्येतेः ? नस नास्ति खल्विदानीं बालानां न: रिलप्रदानापायः 2 विद्यन्ते नाम प्रभू ततैर्दविणसम्मरिः प्रातिष्ठापितास्त तत्र महान्तो विद्छल्याः वा तेषु मारतीयानां माखक्राना सम्पद्यत विद्याधिगमः :

हीद्शानामाश्रमाणां प्षपातिनः) नून वानुप्रदसानिध्थ प्रति्रयुः-न निप्फलो ऽद्ग) जध्यवसायाऽयमस्माकम्‌ अस््येवाश्माकं करिचिद्‌ हदयनिगृहाअनिप्रायः) यो हि निपणतरेव मरवरिचिन्त्याधि- गन्तव्यः नन वयमत्यपादय प्रयाजनाविाषे साधयितमिच्छमः। क्रा नाम ब्रवीति विद्यन्त तारश्च विद्याच्या इति ` यत्पुनरा- हाक्रपे तत्न भारवीयानः बाानां किद्याधिगमा भवति वेति, तदङ्ग, तथव, अवितथमंवदट्‌ यल तच भारतीयानां बायानां किद्याधिगमे। भव- तीति विद्येति हि यत्‌ प्रतिपत्तव्य प्रातिपद्यन्त यारतीयाः, तत्स - धा, साम्प्रतिक्रेषु समपय वा सम्पर्यत वा, मपत्स्सते वा सहस्रेणापि वत्सराणां यदि नाम नतेषु निपुणमतिमिरन्नेयः कदिविद भारतीयो भावः प्रतिषठाप्येत नहि कश्चित्‌ स्वकीय विहाय परकीयं किञ्चिद्‌ आदद्यात्‌, आददानोऽपि वा मम्यगवाप्नयात्‌ फलं समीहितं हयत्तमाङ्गम्‌ उष्णीपमृत्सज्य मज्जीरमामञ्चेत्‌, आमुज्चद्वा यथोचितं रोचेत चक्रमेव सवेां श्रये कर्पते | शिन्विदेव हि कस्याने- दथविषमपपादयद्‌ अन्यस्यानमाय सम्पद्यत मतिमन्त एव तद. वगच्छन्ति, अवगत्य यप श्राप्तषु विषयप्वथमृपादाय दूर॑विजहत्यन- भरम्‌ मन्दमतयस्तु हप्वैव तिमह्यमाना नामामर्थं विवेक्तुं प्रमवन्ति, अकल्याणमपि मास्लरबहिरावरणनिगूटं कल्याणापिति गणयन्ति गृह्णन्ति गृहीतया परिणतं किम्पाकफलमिव सेवमाना निप्र

२८ सरस्वतीसम्मषनय

र्न्धाः प्रकाममदुतप्यन्ते प्रयतन्ते ततः प्रभृस्यप्रमत्ताः सुविचारः यथाथ मेवोपादातुं कस्याणम्‌

वत्तमानेष्वपि परःसहसेषु पारचास्यपद्धतिपीरचाल्तिष पाटल - येषु यत्साम्भतं भारतस्य स्वकीयया पद्धत्या तत्र तत्र॒ केचिन्नूतन तरा पाठागाराः स्थापितादच स्थाप्यन्ते च, चिन्त्यन्ते स्थापयितम तन्मन्ये, प्रबुद्धानीवेदानी चतांपि मारतवर्षीयाणाम्‌, उन्मीटितारि नयनकुवख्यान्येतेषां, अपरता चापो परिणतिविरसा निद्रा, द्रतरमं पक्रान्ता चेषां भरान्िपिदाचिका यया हन्त प्रसह्याक्रान्तास्ते विनिपात मेव प्रयातमुपक्रान्तवन्तः तथेव हिते काशवत्‌ कालान्‌ पार्चात््यभावकु पेण कू्रहेण न्यगृह्य्त, गथा नात्मानमपि स्मत्तमराक्नवन्‌, यथा चयः चायमनयत्‌, तथा तथेव तेऽप्यनृत्यन्‌, तत्तदेव निर्विचारमगृह्ण यद्येष प्राद्रोयत्‌ तेभ्य;

भूयान्‌ खटुं भेदो भारतस्य पाश्चात्यमम्या तथाहि, युत्त मुक्तं कुचित्‌ श्रीमता रवीन्द्रनाथ, पाश्चात्यमुमो किट नगरात्‌ भ्यत्वरक्ष्मीरुपति, भारते तु वनदेव तदुद्धवः, तत्र किट वसनम्‌ धणसमख्ङ्कृता एव गोरवमधिगच्छन्ति, अत्र तु तद्विरहितानां स्वी कृतमिक्षाचर्याणामेव गोरवम्‌; तत्न दि अरण्यमपितिषठम्तः पष्ुभाव मवाप्नुवान्ति, टट तु आरण्यका एव देवीं सम्पदमधिगच्छन्तीति , किल्च तत्र हि विषयाणां मोगमव परमृपादेयं मन्यन्त, इह तु व्याग मेव बाल्यात्‌ प्रभृति रिक्षन्ते; तत्र॒ हि विकंडेष्वपि तेषु, तेष्विन्रि येषु, गल्तिष्वपि दनमकुटेषु, पठितधवटेष्वपि केराकपेषु, शीय द्स्वपि कटेवरसंस्थानेषु तत्प्रतीकारमेव चिन्तयन्ति, चिन्तायेस्वा सभद्धाप्य साधनविरोष पुनस्तमृपाददानाः -

मभापतः अभिभाषणम | २९

“'इृद्मय मया छब्यमिदं भ्राप्स्ये मनोरथम्‌

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनधनम्‌ ॥'' तत्यादि श्रीमद्कगवद्गीतोकन्यायेन : प्रख्यान्तामपारमेयां चिन्ता- मपाश्रिता एतावदेव स्वामिति करतनिर्वयाः कामोपभोगपरमाः नराक्रियमाणा अपि सनि्बन्धं तस्तः शक्तहीनेरिन्धियादिभिभूयो- भृयः संसारमावेप्वव प्रवत्तन्ते, इह पुननियोगोऽयै भगवत इति "न्वानाः नस्वमिमन्दधानाः कामोपभोगम अयुमुय कञ्चित्‌ कालं वास्थ्याश्रमम्‌ अविकटेप्येव तिष्टतु दन्द्रियादिषु सानन्दं सव वहाय पृण्यारण्य समाश्रयन्ति किं बहूना, ते हि पारचात््य- धम्यधिवाक्षिनो व्यवहारतो वाणिभ्यसेग्रामायेः साधनेर्वित्तमेव परं {सुषार्थंगणय॒न्नो दद्यन्ते, तदर्थ कामं वराको न्यायो- ऽन्यायो भवतु, धमश्चाधम तेपां किश्चिच्छि्यते भारतीयास्तु वित्त तृणायेव मन्यमाना अमृतत्वमिति किञ्चित्‌ कामयन्ते

सेयं पार्चाच्यानामापातरमणीया स्वनिप्गसिद्धा संसारसरणिः प्रकारामानापि मोहविखमिताद्वा, कालग्रभावाद्रा, अधन्यत्वाद्वा भवित- -यताया एव॒ तयात्वाद्रा मारतीयेशसक्रदवलोक्यापि दीर्ध काटे पम्यगवनुद्धा इदानीन्तु सुक्रतपरिषाकात्‌ सवमेव दृद्यते बुध्यते + बुदध्वा परकीय पन्थानं परित्यज्य नेसर्गिकः स्वकीय एवो- भादीयते इति कंस्य नाम भारतीयमानिनो मानसं नातितमामानन्द- धनुमवेत्‌ !

श्रीमन्तः, नरि करिचत्‌ प्रकृतिस्थो सतमात्मानं कामयते मरण नाम भीष्मं कष्ठ शरीरिणाम्‌ अतएव हि भारतीया निपुणं

३० मरस्वनीभम्मेदनन

विचार्य अमुतत्वमेव कामयाञ्चकिरे तखपरेषां सम्भावयितुमप्य- हक्य सुपल्स्थं भारतवक्षीयाणाम्‌ फियती मात्रा चेदं वित्त नाम तस्य खछ्वमृतत्वस्याग्र ` तदिदमृ्गातषानः श्रुति्करोवाक्येः

भसा होवाच भत्रेयी यन्त॑ दयं भगाः सर्वा प्रथिवी वित्तिन पृणां स्यात्‌ स्यान्वहं वेनारताहो नेति \"

युक्तश्चातर प्रत्यत्रवीद्‌ याप्नेऽवत्वयः -नद क्तम्‌ *'नविहोवात यान्नवलश्यो यथेवोपकरणवतां जीविनं तणेव नं जीकितं स्यात्‌, अभरन त्वस्य तु नास्ति वित्तेनेति ।'' अथ किमवोचन्मेतरेयी उक्तं तदपि तथेव; -

ध्मा होवाच मत्री, यनाह-नाभनास्यां किमदं नन कुम्‌ ? यदेव मे भगग्रान वेद तदेव वरह्ठीति ।'

बृहदारण्यक. २.४.२९ -२;४.९.३.४.

अतएव भारते ब्राह्मणाः, मनोगताः, आहताश्चेति सवे एवेकम- त्येन तत्तादरौरतिप्रपििमन्धं कामत्यागे ननानामृपदिटिकिुः अय तावद्‌ ब्राह्मणवादः

“यदा सर्वे ममुच्यन्ते कामा खऽस्य हरदिस्थताः

अथ मर्स्योऽमृतो भवत्यत्र रह्म खवश्णुते ॥।''

वृहदारण्यक. ४. ४. |

कथन्चेद्मधिगन्तभ्यमस्रतस्वमिति एव हि क्टषयः पृष्ठा व्या- कुयुः, एव हि तत्र प्रम्बन्ति, एव हि वदधिगतवन्त! | खल्वन्धो मागमुषदेष्टमलम्‌, उपादहन्‌ वा यथपक्षितसुपदिश्षति,

समापतेः भभिभापणम्‌ | 4

शक्रोति वा कश्चित्‌ तदुपदिष्टं मागमदुसरन्‌ अन्यभिचरिण गन्तु गन्लन्यम्‌

यदि नामामतस्वमवः सवतः श्रेष्ठ महिष्ठ मन्येत; तर्ही द्मप्यवदयं मन्तव्यं यत्नेदमनायासेन छखीज्या वा रक्यमधिगन्तु- मिति प्रकृतिरेवेयं श्रष्ठस्य मदिष्ठस्य यत्तदाधेगमाय प्राच्यः प्रयामः, प्रमूतः गदः प्रकृष्ठरेच दुःवामिवानः मोव्यः एतैर द्मधिगतस्य वस्तुनः समेधते माधुर्य, संवधरते मार्यं | किंवहूना, एतदेव हि वस्तुना महिमानपृत्पादयति तदङ्ग, स्परेऽपि कल्पयितव्यं यदस्य सवौतिराथेनोऽमृतत्वस्य पन्था नाम मगमो भवेदिति ददिदमप्युक्तमृषिभिः

श्षुरस्य धारा निशिता दुरत्या | दुगे पथस्तत्‌ कवयो वदन्तीति ॥" कृटापि. 2. ३. १५ |

यतरचाये दुगः पन्थाः तन एवाम्पामिरत्यानत्यं जागर्तव्यं जागग्त्वि कल्मव्याम्त करणीया महामार स्थ ट्‌ दगस्य पथ उपदङहकाः तादगव टि करर्निद्‌य पाणिः. सं महु बहवः श्रोतुमपि तावन्न लभेरन्‌, श्रषन्तोऽपि बहवो ननमवबर- येरन्‌ तथाविधो द्येवाय गम्भीरः पदराधः तथाभूतोऽपि चायमव- श्यमाकेगन्तव्यः श्रेयःपरप्सुभिः पनमीतेन चेतसा परिहियः

अद्यत्वे हहे यः किट कश्चिद्‌ यां काथिदेकां रिल्पवाणिन्या- दिकां टोकिफीौ विद्यामधिैकरर्षति, सोऽपि हन्त फियतो नाम वत्परामतिकहयति अतिषह्यापि कदाचन्‌ समीषिते फर नाप्य-

22 सरस्वतीसम्मेटनम्‌

वाप्नोति | यदि नामेताद्स्यां टधीयस्यामपरस्यामेव विद्यायामेषा गतिः, तर्हिं किमु वक्तव्यमङ्ग, अणेोरप्यणीयसो महतोऽपि मही- यस्तस्य खस्वमृतत्तप्रदूस्य अगतस्य पुरुषस्य प्रापिकायां परस्यां वि- द्रायाम्‌ ? अतोऽयं सवैः स्वीकत्त्यं यत्‌ तत्ने याव-नीवमेव प्रयतनीयमिति बास्यादेव तदथमनकरूटं वत्तदुत्रतमवसयमाचर- णीयमिति

इत्थ सति यस्य किट पस्तुनो वक्ता सीता तेत्युभाव- प्याश्च्यमूतौ, कुराल एव हि जनो यदुपदेष्टंदक्तोपि, कशखदेवा- चाचयाद्‌ रन्धोषदेा आत्मनोऽपि कुदाल्तवमेव सम्पाद्य यतम्रमव- व्यथिगन्त, तम्य खल्वमतरूपस्याधिगमाय पृष्ष्षेण तादश एव ऊट आचाय उपगन्तव्यः, उपगम्य तन तद्रचनस्थितेन स्वकरश- रप्वपिद्धये तदुपदिष्टमेवाचरणीयमित्यरुक्तमपि सुकरमेवावभोद्ध

्वेरपि

ततश्च यै नामाय बाल्ये वयामि वत्तमानोऽगतार्थी अस्रतत्वाथी वा ( अनवनुध्यमानोऽपि तदानीमाप्मनस्तमयुं चरमं पृमथ॑म्‌ ) उप- गच्छति आचायं इत्येष प्रमिद्धः यचाय॑तदपदेशाप्थित आच- रति तऋ्यचयं नाम तत्‌ यिमिश्चाये कांश्चित्‌ कालान्‌ व्तमा- नस्तदाचरति आचार्यकं तत्‌ यः पृनरयं तथा तदाचरति ब्रह्मचरि खल्वेष इत्युच्यते

श्रीमन्तः, य्सत्यमतितरां पावनान्येतानि चत्वारि पदानि चायश्च, आचायरंच) ब्रह्मचारी न, ब्रहमचर्यं॑चेति अ- तिगम्मीरमतिरमणीयं नाथकिदोषं प्रतिपादयन्त्येतानि, प्रकाशयन्ति

सभापतेः अभिभाषणम्‌ ३६

चवेदिककालात कमप्यतिगोरवं महिमानं भारतीयानामार्याणाम्‌ अचिन्ततचरमचिन्तनीय चैतेषां तत्वमम्यत्र॒भारतव्षात्‌ सर्वस्ठ- मिवाप्मिन्‌ पदचतु्ये निहितमेतेषाम्‌ ततश्च विनष्ट एतप्मिन्‌ सरवैमेव विनष्टमिति मन्तव्यम्‌ परीक्षन्तां चेदं प्रे्षावन्त इत्यवश्यमहं नुथाम्‌

श्रीमन्तः, बह्मचयमिति कियती नाम शक्तिशप्रतिपादयिषिता तै्भवद्धिमेदर्षिभिरिति नास्मादरां क्चनेन युक्तमृदाहर्तमिति बाह्म- णतस्तेषामेव पण्यं व्चनमुपन्यस्यते तथाहि रातपयव्राह्मणे ११. व. 1

“प्रह्म हवे मत्ये परजाः भायच्छत्‌

तस्म ब्रह्मचारिणमेव पायच्छत्‌ इति तदेव चोक्तं गोपयथेऽपि पृवै. २. ) -

"ब्रह्म हेष परजा मृत्यवे सम्भयच्छत्‌

बरह्मचारिणमेव सम्परददो इति मू चास्य सहितायामपि दश्यत यथाः-

“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृस्युमुपध्नत इति

अथ, स. ११. ३. ३, १९.

नायमर्थोऽध्वरमीमांप्कानाम्‌ अथवादन्यायेन विष्यथस्तावकतया गृही- त्वा खाघव प्रापणीयः राक्यत हि स्पष्टमेव बह्मचयरूपेण तपसा मृत्युरपटन्तुम्‌ अधिगन्तुं चामृतम्‌ अतिरोंहितश्चायमथं; प्तमनु- रीरितोपनिषदवचनानां परीक्षकाणाम्‌ दश्यते हि प्रायः सर्व तैव ॒श्ुतिहिरोवक्येषु सत्यध्यात्मवियाप्रसङ्धे "४ वस॒ हाच-

४९ सरस्वकीसम्पटेनय्‌ |

येम्‌^ इत्याधुषदेशेन नह्मच्निधिः भन एव हि ते मषवयः मै एव समाचरन्‌ तऋह्मतय समादिराश्च तदनुष्ठानास स्वपर्वसि- भ्यः पुरषेम्यः अतएव मवे भरमभूत्रकाग ॒रएेकमत्येन तस्यारे- परठम्ति अद्यत्वेऽपि, काममस्तु विक्त, तथाप्येतत्‌ समनुसरन्त्येव सन्तः तथा चायं केव करदिचद्‌ यादाच्छकः सामाजिक आचार इति मन्वन्यम्‌ अय मन्येमहि टदोभौग्यमेवास्माकं तदिष्यववुष्ये- महि, खलस्वववुद्धमस्माभिस्तत्तत्वमिति विप्रल्ब्धाःस्म इति रुव महि

केवखमदयात्मदषटयव ब्रह्मचर्यस्ययान्‌